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भारत का पहला आम चुनाव: पहले संदेह, फिर हैरानी...आखिर में व्यवस्थित मतदान से दुनिया में वाहवाही
सार
पहले आम चुनाव देशभर में अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 तक चले। 17 फीसदी आबादी दुनिया के सबसे बड़े चुनाव में मतदान कर रही थी। अंग्रेजी साम्राज्य से स्वतंत्र हुए भारत में पहले आम चुनाव के प्रति वहां संदेह था।
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मतदान (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
आज से अपने-अपने जनसेवक चुनने के लिए मतदान शुरू हो रहा है। समाज में समन्वय, समर्थन और सेवा के लिए नई संसद चुनी जाएगी। हमारे मत से अगली संसद के लिए चुने गए जनसेवक फिर जननीति बनाने में जुटेंगे। अपना समाज आम चुनाव को उत्तरदायी उत्सव के रूप में देखता रहा है। स्वतंत्र आस्था से जनसेवक चुनने की आशा समाज में सदा रही। जिस देश में अंग्रेजी संसदीय प्रणाली के वयस्क मतदान की परंपरा नहीं थी उस विशालता के समाज में पहले आम चुनाव सभ्य संस्कारों में संपन्न हुए थे।
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हाल में एक समाचार पत्र में छपा अद्रिजा रॉय चौधरी के लेख में लिखा, कैसे विदेशी प्रेस ने भारत के पहले आम चुनाव को देखा, जानने-समझने लायक है। स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव पर विदेश में छपी खबरों को लेकर लिखा लेख खास महत्व का है। पहले आम चुनाव देशभर में अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 तक चले। 17 फीसदी आबादी दुनिया के सबसे बड़े चुनाव में मतदान कर रही थी। अंग्रेजी साम्राज्य से स्वतंत्र हुए भारत में पहले आम चुनाव के प्रति वहां संदेह था, लेकिन उन्हीं खबरों के हवाले से पता चलता है कि कैसे पहले संदेह, फिर हैरानी, मगर व्यवस्थित समापन पर खूब वाहवाही मिली थी।
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ऐसा उदाहरण दूसरा नहीं
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उन्हीं खबरों के आधार पर माना होगा कि आस्था की जिस विशालता का व्यवहार पहले आम चुनाव में दिखा, उसके समान मानवता के इतिहास में दूसरा ढूंढ़ना मुश्किल होगा। भारत में इंग्लैंड के तब के राजदूत आर्चिबाल्ड ने अपने अफसर को लिखा, आम चुनाव भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिए दीक्षा रही, जिसकी परीक्षा में देश सफल रहा। उनने माना की आम चुनाव असाधारण दक्षता से संपन्न हुए। उनके अनुसार, ज्यादातर अनपढ़ आबादी ने शांत सभ्य व्यवहार दिखाते हुए नई चुनौती के लिए जागरूकता दिखाई। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस गजब करने वाली चुनावी सफलता को जनतंत्र का बेमिसाल प्रयोग कहा था। मैनचेस्टर गार्डियन ने अपनी रिपोर्ट में माना कि अगर किसी देश ने लोक के तंत्र में लंबा डग भरा है तो वो भारत है।
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दुनिया ने उठाए थे ऐसे सवाल
इतिहासकार टेलर शरमन के अनुसार, अंग्रेजी साम्राज्य अपने संशय में मान रहा था की आचार-विचार का विशाल देश स्वराज के लायक नहीं है। इसलिए जनतंत्र के चुनाव भारत के बूते की बात नहीं रहेगी। अंग्रेजी से अनभिज्ञ जनता क्या अपने नेता को चुनने में सक्षम है? वाशिंगटन पोस्ट में छपा लेख अनपढ़, आधे-भूखे लोगों की जमीन पर विभिन्न बोलियों में इलेक्शन के लिए कोई शब्द नहीं होने को असफलता का कारण मान रहा था। उसी अखबार ने बाद में पहले आम चुनाव को भारतीय आस्था का कारज माना। विदेश में भारत के आम चुनाव को चिंता भरे आश्चर्य से देखा जा रहा था। यह भी की यहां आम चुनाव हो सकते हैं।
तब यह थी तस्वीर...
न्यूयॉर्क टाइम्स के ही रॉबर्ट ट्रमबुल ने जो शहर अंबाला में देखा या समझा उसको तो समस्या ही मान लिया। मतदान करने आईं एक दर्जन महिलाओं को मतदान कक्ष में घुसने से पहले सैंडल-चप्पल उतारते देखा। जैसे महिलाओं का मतदान करने आना मंदिर आने जैसा रहा हो। पहले आम चुनाव को 8.5 करोड़ महिला मतदाताओं के कारण आइरिश टाइम्स ने सराहना करते हुए कहा कि भारतीय चुनाव गृहिणी ग्रह कार्य होगा।