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सेना में महिलाएं : स्थायी कमीशन मिला लेकिन दुनिया से पीछे चल रहा है भारत
Fri, 21 Feb 2020 01:13 AM IST
गौरव पाण्डेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Fri, 21 Feb 2020 01:13 AM IST
सार
नेशनल ज्योग्राफिक के मुताबिक, कम से कम 16 देश ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं को सेना में अग्रणी मोर्चे पर या युद्धक भूमिका में सेवा देने की इजाजत दी गई है। आइए कुछ खास देशों की सेनाओं में महिलाओं की स्थिति पर डालते हैं एक नजर...
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महिला सैन्य अधिकारी
- फोटो : फाइल
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही अपने ऐतिहासिक निर्णय में महिला अधिकारियों को सेना में स्थायी कमीशन और कमांड पोस्टिंग देने का निर्देश दिया हो, लेकिन इससे एक सवाल खड़ा हुआ है कि क्या भारत ऐसा करने वाला इकलौता देश है या वह इस मामले में अन्य देशों से बहुत पीछे है।
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वैश्विक स्तर पर देखें तो सेनाओं में महिलाओं का युद्ध के अग्रणी मोर्चे को संभालना विवादास्पद मुद्दा ही रहा है। नेशनल ज्योग्राफिक के मुताबिक, कम से कम 16 देश ऐसे हैं, जिनमें महिलाओं को सेना में अग्रणी मोर्चे पर या युद्धक भूमिका में सेवा देने की इजाजत दी गई है।
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आइए कुछ खास देशों की सेनाओं में महिलाओं की स्थिति पर डालते हैं एक नजर...
ब्रिटेन : 2018 में ब्रिटिश सेना ने महिलाओं के अग्रणी युद्ध मोर्चे पर सेवा देने पर लगा प्रतिबंध हटाया था। साथ ही उन्हें एलीट स्पेशल फोर्स में काम करने की हरी झंडी दी थी।
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अमेरिका : महिलाएं अमेरिकी सेना में गैरयुद्धक भूमिकाओं में काम करती थीं। लेकिन 2016 में अमेरिकी सरकार ने पेंटागन के प्रतिबंध को खत्म करते हुए महिलाओं को अग्रणी युद्ध मोर्चे पर काम करने की इजाजत दे दी। हालांकि अमेरिकी वायुसेना व नौसेना में इससे कही पहले 1990 के दशक की शुरुआत में ही महिलाओं ने लड़ाकू अभियानों में भूमिका निभानी शुरू कर दी थी। अमेरिकी थल सेना में युद्ध मोर्चे पर जाने की इजाजत मिलने के तीन साल के अंदर यानी 2019 में 2906 महिला सैनिकों को स्थलीय युद्ध में अहम पोजिशन दी जा चुकी थी।
चीन : विश्व की सबसे बड़ी सेना कहलाने वाली पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ग्राउंड फोर्स (पीएलएजीएफ) यानी लाल सेना में महिला अधिकारियों की संख्या 5 फीसदी या उससे भी कम है। इसका मतलब है कि पीएलएजीएफ के 14 लाख सैनिकों में महज 53000 महिलाएं हैं।
पाकिस्तान : इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज (आईआईएसएस) के आकलन के मुताबिक, पड़ोसी देश की सेनाओं में 3400 महिलाएं कार्यरत हैं। इन्हें युद्धक भूमिका देने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कनाडा, इस्राइल व डेनमार्क : इन तीनों ही देशों ने 80 के दशक के मध्य से अंत के बीच अपनी सेनाओं में महिलाओं को लड़ाकू भूमिका में नियुक्ति दे दी थी। कनाडा ने 1989 में, इस्राइल ने 1985 में और डेनमार्क ने 1988 में यह काम शुरू किया था। हालांकि इस्राइल में महिलाओं को सेना में शामिल करने का काम 1948 में उसके गठन के साथ ही शुरू हो गया था। वहां महिलाओं का दो साल मिलिट्री में काम करना अनिवार्य है।
नार्वे : 1980 के मध्य में नार्वे पहला नाटो देश बना था, जिसने महिलाओं को पूरी तरह लड़ाकू भूमिका निभाने की इजाजत दी थी।
रूस : आईआईएसएस के मुताबिक, रूसी सेना में महिलाओं की संख्या 10 फीसदी से भी कम है। इनका भी लड़ाकू भूमिका निभाना स्पष्ट नहीं है।
भारत में क्या है स्थिति
- 1950 में बने आर्मी एक्ट में महिलाओं को सेना की स्थायी सेवा के लिए अयोग्य ठहराया गया था।
- 42 साल बाद सरकार ने महिलाओं को पांच शाखाओं में अधिकारी बनाने की अधिसूचना जारी की।
- 1992 जनवरी में महिलाओं के सेना में अधिकारी बनने का यह ऐतिहासिक पल आया।
- 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के सेना में स्थायी कमीशन पाने का रास्ता साफ किया।
- 03 महीने के अंदर सरकार को सभी सेवारत एसएससी महिला अधिकारियों को देना होगा स्थायी कमीशन।
- 14 साल या 20 साल की सेवा पूरी हो जाने का स्थायी कमीशन देने पर नहीं होगा कोई प्रभाव।