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Climate: 'भारत की गलती नहीं फिर भी पूरी तत्परता से जलवायु कार्रवाई कर रहा', केंद्रीय पर्यावरण मंत्री का बयान
Fri, 16 May 2025 12:27 PM IST
नितिन गौतम
अतुल मिश्रा/एजेंसी
अतुल मिश्रा/एजेंसी
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 16 May 2025 12:27 PM IST
सार
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'पर्यावरण संकट का सबसे ज्यादा असर हिमालयी पर्वत शृंखला पर पड़ रहा है। भारत के लिए हिमालय क्षेत्र बेहद अहम है और इस पर पड़ रहे असर को भारतीय हिमालयी राज्यों में साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।'
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली ने हिमालयी क्षेत्र में बर्फ के तेजी से पिघलने और पारिस्थितिकी तंत्र के कमजोर होने के बीच शुक्रवार को ‘सागरमाथा संवाद’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया। वह बोले, आज दुनिया एक-दूसरे से ऐसी जुड़ी है कि एक कोने की आग दूसरे कोने का आसमान काला कर देती है। जलवायु परिवर्तन आज मानवता की सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत पूरी तत्परता से जलवायु कार्रवाई में अपना योगदान दे रहा है। उन्होंने कहा कि हालांकि जलवायु संकट में भारत की भूमिका बेहद सीमित है। 'सागरमाथा संबाद' कार्यक्रम के पहले संस्करण में अपने संबोधन में भूपेंद्र यादव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर पर्वतीय क्षेत्रों में पड़ रहा है। उन्होंने विकसित देशों द्वारा कार्बन बजट में कटौती पर भी नाराजगी जाहिर की।
एकजुट होकर कार्रवाई करने की जरूरत
वैश्विक कार्बन बजट, पर्यावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़े जाने के अनुपात में विकसित देशों द्वारा दिया जाने वाला फंड है। यादव ने कहा कि 'विकसित देशों ने जलवायु वित्त, तकनीक और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों में क्षमता निर्माण का वादा किया था, लेकिन अब वे इससे मुकर रहे हैं। इससे जलवायु संकट बढ़ रहा है।' सागरमाथा संबाद को केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'यह सिर्फ संवाद का मंच नहीं है बल्कि अब हमें एकजुट होकर कार्रवाई करने की जरूरत है। भारत, पीएम मोदी के नेतृत्व में जलवायु कार्रवाई में जितनी जरूरत है, उतना पूरी तत्परता योगदान कर रहा है, जबकि भारत की इस संकट में बेहद कम भूमिका है।'
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हिमालय क्षेत्र पर पड़ रहा गंभीर असर
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'पर्यावरण संकट का सबसे ज्यादा असर हिमालयी पर्वत शृंखला पर पड़ रहा है। भारत के लिए हिमालय क्षेत्र बेहद अहम है और इस पर पड़ रहे असर को भारतीय हिमालयी राज्यों में साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।' भूपेंद्र यादव ने कहा कि सभी देशों के एकजुट होकर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिश करनी होगी। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया पूरी दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन का सिर्फ 4 प्रतिशत ही उत्सर्जन करता है, जबकि यहां दुनिया की कुल आबादी की 25 फीसदी आबादी रहती है। उन्होंने कहा कि भारत नेपाल और अन्य हिमालयी देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत देश में 1.42 अरब पेड़ लगे हैं और इनमें से 72 करोड़ पेड़ भारत के हिमालयी क्षेत्र में लगे हैं।
ये भी पढ़ें- Ex-DGMO Anil Bhatt: 'ड्रोन-अंतरिक्ष और साइबरस्पेस सैन्य संघर्षों में नए प्रतिमान', पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट का बयान
नेपाल : शांति, और ज्ञान की भूमि
पीएम ओली ने नेपाल को ‘शांति और जागरण की भूमि’ बताते हुए बुद्ध के देश से आए शांति के संदेश को दोहराया। उन्होंने कहा, सगरमाथा संबाद केवल एक विचार मंच नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। उन्होंने कहा, ‘वादे वादे जायते तत्वबोधः’ यानी संवाद से ही सत्य की प्राप्ति होती है। ओली ने कहा, पहाड़ अक्सर दुनिया के विकसित देशों की गलतियों को पर्यावरण चुनौतियों के रूप में भुगत रहे हैं।
हिमालय झेलता है पर्यावरण संकट
भूपेंद्र यादव ने कहा, यह संवाद सिर्फ चर्चा का मंच नहीं, बल्कि ठोस सामूहिक कार्रवाई का आह्वान है। भारत जलवायु कार्रवाई को लेकर अपनी बात पर अमल कर रहा है, विकास के प्रतिमान स्थापित कर रहा है। हिमालय पर्यावरण संकट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वहन करता है। हम भारत में, अपने महत्वपूर्ण हिमालयी क्षेत्र के साथ, इन प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं।
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भारत के पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत पूरी तत्परता से जलवायु कार्रवाई में अपना योगदान दे रहा है। उन्होंने कहा कि हालांकि जलवायु संकट में भारत की भूमिका बेहद सीमित है। 'सागरमाथा संबाद' कार्यक्रम के पहले संस्करण में अपने संबोधन में भूपेंद्र यादव ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर पर्वतीय क्षेत्रों में पड़ रहा है। उन्होंने विकसित देशों द्वारा कार्बन बजट में कटौती पर भी नाराजगी जाहिर की।
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एकजुट होकर कार्रवाई करने की जरूरत
वैश्विक कार्बन बजट, पर्यावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़े जाने के अनुपात में विकसित देशों द्वारा दिया जाने वाला फंड है। यादव ने कहा कि 'विकसित देशों ने जलवायु वित्त, तकनीक और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों में क्षमता निर्माण का वादा किया था, लेकिन अब वे इससे मुकर रहे हैं। इससे जलवायु संकट बढ़ रहा है।' सागरमाथा संबाद को केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'यह सिर्फ संवाद का मंच नहीं है बल्कि अब हमें एकजुट होकर कार्रवाई करने की जरूरत है। भारत, पीएम मोदी के नेतृत्व में जलवायु कार्रवाई में जितनी जरूरत है, उतना पूरी तत्परता योगदान कर रहा है, जबकि भारत की इस संकट में बेहद कम भूमिका है।'
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हिमालय क्षेत्र पर पड़ रहा गंभीर असर
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 'पर्यावरण संकट का सबसे ज्यादा असर हिमालयी पर्वत शृंखला पर पड़ रहा है। भारत के लिए हिमालय क्षेत्र बेहद अहम है और इस पर पड़ रहे असर को भारतीय हिमालयी राज्यों में साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।' भूपेंद्र यादव ने कहा कि सभी देशों के एकजुट होकर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिश करनी होगी। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया पूरी दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन का सिर्फ 4 प्रतिशत ही उत्सर्जन करता है, जबकि यहां दुनिया की कुल आबादी की 25 फीसदी आबादी रहती है। उन्होंने कहा कि भारत नेपाल और अन्य हिमालयी देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत देश में 1.42 अरब पेड़ लगे हैं और इनमें से 72 करोड़ पेड़ भारत के हिमालयी क्षेत्र में लगे हैं।
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नेपाल : शांति, और ज्ञान की भूमि
पीएम ओली ने नेपाल को ‘शांति और जागरण की भूमि’ बताते हुए बुद्ध के देश से आए शांति के संदेश को दोहराया। उन्होंने कहा, सगरमाथा संबाद केवल एक विचार मंच नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। उन्होंने कहा, ‘वादे वादे जायते तत्वबोधः’ यानी संवाद से ही सत्य की प्राप्ति होती है। ओली ने कहा, पहाड़ अक्सर दुनिया के विकसित देशों की गलतियों को पर्यावरण चुनौतियों के रूप में भुगत रहे हैं।
हिमालय झेलता है पर्यावरण संकट
भूपेंद्र यादव ने कहा, यह संवाद सिर्फ चर्चा का मंच नहीं, बल्कि ठोस सामूहिक कार्रवाई का आह्वान है। भारत जलवायु कार्रवाई को लेकर अपनी बात पर अमल कर रहा है, विकास के प्रतिमान स्थापित कर रहा है। हिमालय पर्यावरण संकट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वहन करता है। हम भारत में, अपने महत्वपूर्ण हिमालयी क्षेत्र के साथ, इन प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं।