{"_id":"676305d06a275b373709a38d","slug":"india-conducts-first-ever-ganges-river-dolphin-tagging-in-assam-news-in-hindi-2024-12-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Environment Ministry: भारत ने असम में पहली बार गंगा नदी डॉल्फिन को किया टैग, जानें किस काम आएगा टैगिंग अभ्यास?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Environment Ministry: भारत ने असम में पहली बार गंगा नदी डॉल्फिन को किया टैग, जानें किस काम आएगा टैगिंग अभ्यास?
Wed, 18 Dec 2024 10:56 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 18 Dec 2024 10:56 PM IST
सार
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, टैगिंग अभ्यास डॉल्फिन के मौसमी और प्रवासी पैटर्न, सीमा, वितरण और आवास उपयोग को समझने में मदद करेगा, विशेष रूप से खंडित या अशांत नदी प्रणालियों में। भारत का राष्ट्रीय जलीय जानवर, गंगा नदी डॉल्फिन अपनी पारिस्थितिकी में अद्वितीय है, लगभग अंधा है और अपनी जैविक जरूरतों के लिए इकोलोकेशन पर निर्भर है।
विज्ञापन
असम में गंगा नदी डॉल्फिन की टैगिंग
- फोटो : X / @byadavbjp
विस्तार
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने बुधवार को बताया कि गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदी प्रणाली और उसकी सहायक नदियों में पाई जाने वाली प्रतिष्ठित गंगा नदी डॉल्फिन को पहली बार असम में टैग किया गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने असम वन विभाग और आरण्यक के सहयोग से एक स्वस्थ नर नदी डॉल्फिन को टैग किया और उसे पशु चिकित्सा देखभाल के तहत छोड़ दिया।
इकोलोकेशन पर निर्भर है गंगा नदी डॉल्फिन
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, टैगिंग अभ्यास डॉल्फिन के मौसमी और प्रवासी पैटर्न, सीमा, वितरण और आवास उपयोग को समझने में मदद करेगा, विशेष रूप से खंडित या अशांत नदी प्रणालियों में। भारत का राष्ट्रीय जलीय जानवर, गंगा नदी डॉल्फिन अपनी पारिस्थितिकी में अद्वितीय है, लगभग अंधा है और अपनी जैविक जरूरतों के लिए इकोलोकेशन पर निर्भर है।
एक बार में केवल 5-30 सेकंड के लिए सतह पर आती है डॉल्फिन
इस प्रजाति की लगभग 90 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जो ऐतिहासिक रूप से गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली नदी प्रणालियों में वितरित है। हालांकि, पिछली सदी में इसके वितरण में भारी गिरावट आई है। इसकी विस्तृत श्रृंखला के बावजूद, इसके मायावी व्यवहार के कारण इस प्रजाति के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान अंतराल बना हुआ है। डॉल्फिन एक बार में केवल 5-30 सेकंड के लिए सतह पर आती है, जिससे इसकी पारिस्थितिक आवश्यकताओं को समझने और किसी भी वैज्ञानिक रूप से ठोस संरक्षण हस्तक्षेप के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश होती है।
विज्ञापन
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत, डब्ल्यूआईआई ने संरक्षण कार्य योजना विकसित करने और प्रजातियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए मौजूदा ज्ञान अंतराल को संबोधित करने के लिए व्यापक, व्यापक शोध किया है। यह देखते हुए कि गंगा नदी की डॉल्फ़िन सर्वोच्च शिकारी हैं और नदी प्रणालियों के लिए छत्र प्रजाति के रूप में काम करती हैं, उनकी भलाई सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने एक पर दी जानकारी
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने एक्स पर पोस्ट किया, 'असम में गंगा नदी डॉल्फिन की पहली टैगिंग की खबर साझा करते हुए मुझे खुशी हो रही है - यह इस प्रजाति और भारत के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है! यह MoEFCC और राष्ट्रीय CAMPA की तरफ वित्त पोषित परियोजना, जिसका नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा असम वन विभाग और आरण्यक के सहयोग से किया जा रहा है, हमारे राष्ट्रीय जलीय पशु के संरक्षण के बारे में हमारी समझ को और गहरा करेगी।'
जानें किस काम आएगा टैगिंग अभ्यास?
डब्ल्यूआईआई के निदेशक वीरेंद्र आर तिवारी ने कहा कि नदी डॉल्फिन की टैगिंग साक्ष्य-आधारित संरक्षण रणनीतियों में योगदान देगी, जो इस प्रजाति के लिए तत्काल आवश्यक हैं। परियोजना अन्वेषक विष्णुप्रिया कोलीपकम ने कहा कि यह नदी डॉल्फिन की पारिस्थितिक आवश्यकताओं को समझने में एक महत्वपूर्ण प्रगति है, जो इन विशाल नदी पारिस्थितिकी प्रणालियों के भीतर महत्वपूर्ण आवासों को संरक्षित करने में मदद करेगी। यह न केवल जलीय जैव विविधता के लिए बल्कि इन संसाधनों पर निर्भर हजारों लोगों को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विज्ञापन
इकोलोकेशन पर निर्भर है गंगा नदी डॉल्फिन
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, टैगिंग अभ्यास डॉल्फिन के मौसमी और प्रवासी पैटर्न, सीमा, वितरण और आवास उपयोग को समझने में मदद करेगा, विशेष रूप से खंडित या अशांत नदी प्रणालियों में। भारत का राष्ट्रीय जलीय जानवर, गंगा नदी डॉल्फिन अपनी पारिस्थितिकी में अद्वितीय है, लगभग अंधा है और अपनी जैविक जरूरतों के लिए इकोलोकेशन पर निर्भर है।
विज्ञापन
एक बार में केवल 5-30 सेकंड के लिए सतह पर आती है डॉल्फिन
इस प्रजाति की लगभग 90 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जो ऐतिहासिक रूप से गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली नदी प्रणालियों में वितरित है। हालांकि, पिछली सदी में इसके वितरण में भारी गिरावट आई है। इसकी विस्तृत श्रृंखला के बावजूद, इसके मायावी व्यवहार के कारण इस प्रजाति के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान अंतराल बना हुआ है। डॉल्फिन एक बार में केवल 5-30 सेकंड के लिए सतह पर आती है, जिससे इसकी पारिस्थितिक आवश्यकताओं को समझने और किसी भी वैज्ञानिक रूप से ठोस संरक्षण हस्तक्षेप के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश होती है।
विज्ञापन
प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत, डब्ल्यूआईआई ने संरक्षण कार्य योजना विकसित करने और प्रजातियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए मौजूदा ज्ञान अंतराल को संबोधित करने के लिए व्यापक, व्यापक शोध किया है। यह देखते हुए कि गंगा नदी की डॉल्फ़िन सर्वोच्च शिकारी हैं और नदी प्रणालियों के लिए छत्र प्रजाति के रूप में काम करती हैं, उनकी भलाई सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने एक पर दी जानकारी
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने एक्स पर पोस्ट किया, 'असम में गंगा नदी डॉल्फिन की पहली टैगिंग की खबर साझा करते हुए मुझे खुशी हो रही है - यह इस प्रजाति और भारत के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है! यह MoEFCC और राष्ट्रीय CAMPA की तरफ वित्त पोषित परियोजना, जिसका नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा असम वन विभाग और आरण्यक के सहयोग से किया जा रहा है, हमारे राष्ट्रीय जलीय पशु के संरक्षण के बारे में हमारी समझ को और गहरा करेगी।'
जानें किस काम आएगा टैगिंग अभ्यास?
डब्ल्यूआईआई के निदेशक वीरेंद्र आर तिवारी ने कहा कि नदी डॉल्फिन की टैगिंग साक्ष्य-आधारित संरक्षण रणनीतियों में योगदान देगी, जो इस प्रजाति के लिए तत्काल आवश्यक हैं। परियोजना अन्वेषक विष्णुप्रिया कोलीपकम ने कहा कि यह नदी डॉल्फिन की पारिस्थितिक आवश्यकताओं को समझने में एक महत्वपूर्ण प्रगति है, जो इन विशाल नदी पारिस्थितिकी प्रणालियों के भीतर महत्वपूर्ण आवासों को संरक्षित करने में मदद करेगी। यह न केवल जलीय जैव विविधता के लिए बल्कि इन संसाधनों पर निर्भर हजारों लोगों को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है।