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India-China: 'सीमा पर गश्त समझौता का स्वागत', पूर्व विदेश सचिव श्रृंगला बोले- LAC पर तनाव कम होने की संभावना

Tue, 22 Oct 2024 01:38 AM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 22 Oct 2024 01:38 AM IST
सार

भारत और चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 2020 से पहले की तरह गश्त शुरू करने पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर चली कवायद के बाद एलएसी पर गश्त और सैन्य तनाव घटाने पर सहमति बनी है। 

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India-China Border agreement former Foreign Secretary Shringla and other expert hopes for reducing tension
हर्ष वर्धन श्रृंगला, केपी फैबियन, गौतम बंबावले - फोटो : एएनआई

विस्तार

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में 52 महीनों से चल रहा सीमा तनाव सुलझ गया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर चली कवायद के बाद एलएसी पर गश्त और सैन्य तनाव घटाने पर सहमति बनी है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते को लेकर विशेषज्ञों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। पूर्व विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला का कहना है कि पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर गश्त व्यवस्था के समझौते से दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की संभावना है। 

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मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चीनी सेना की कार्रवाई के कारण गतिरोध पैदा होने के समय विदेश सचिव रहे श्रृंगला ने बताया कि बातचीत में मजबूती से संतोषजनक निष्कर्ष निकला है। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि समझौता हमें आगे बढ़ने का एक रास्ता देता है। यह याद किया जाएगा कि जब शत्रुता शुरू हुई थी, तब चीन ने सैनिकों को इकट्ठा किया था और वे सैनिक अभी भी वहां हैं। इसलिए मुझे लगता है कि विघटन के बाद, हमें तनाव कम करने पर विचार करना चाहिए।'

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सीमा गश्त के समझौते पर पूर्व भारतीय राजदूत गौतम बंबावले ने कहा है कि अगर यह समझौता 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन द्वारा सैन्य कार्रवाई से पहले की स्थिति को बहाल करता है, तो यह बहुत स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार को इस मामले में सख्त रुख अपनाने के लिए बधाई दी जानी चाहिए। साढ़े चार साल के भारत-चीन सैन्य गतिरोध के बाद भारत का रुख वाजिब ठहराया गया है। उन्होंने कहा कि अगर यह समझौता वास्तव में पूर्व-गलवान अवधि की स्थिति को बहाल करता है, तो यह एक अच्छा समझौता है और हम इसके आधार पर आगे बढ़ सकते हैं।

पूर्व भारतीय राजदूत बंबवाले ने कहा है कि यह समझौता ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले आया है, जो कुछ दिनों में रूस के कजान में होगा। उनका मानना है कि इससे यह संकेत मिलता है कि चीन भारत-चीन संबंधों को पहले जैसा बनाना चाहता है, खासकर व्यापार, वाणिज्य और निवेश जैसे क्षेत्रों में। हालांकि, दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करने में समय लगेगा, लेकिन यह शुरुआत अच्छी हो सकती है और शायद कजान में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शीर्ष स्तर की बैठक हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस समझौते से भारत-चीन सीमा विवाद में कमी आने की उम्मीद है, जिससे ब्रिक्स समूह को मजबूती मिलेगी।

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बंबावले ने आगे कहा कि मेरा मानना है कि इस समझौते के पीछे रूस का कोई हाथ नहीं है, बल्कि यह भारत और चीन के बीच हुई वार्ता और बातचीत का नतीजा है। इस समझौते को भारत-चीन संबंधों में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल करने की कोशिश की जाएगी। हालांकि, बंबावले ने यह भी कहा कि इस समझौते से दोनों देशों के बीच अचानक से गर्मजोशी नहीं आएगी, बल्कि समय के साथ-साथ संबंधों को बहाल करने की प्रक्रिया चलेगी।

पूर्व राजनयिक केपी फैबियन का मानना है कि यह समझौता बहुत महत्वपूर्ण है, जिसमें दोनों देशों ने एलएसी पर सामान्य गश्त और अलगाव पर सहमति व्यक्त की है। विदेश सचिव का कहना है कि हम अब उस समस्या के समाधान पर विचार कर रहे हैं जो 2020 में उत्पन्न हुई थी। फैबियन ने यह भी कहा कि कुछ साल पहले, प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा से पहले, दोनों देशों के बीच मुद्दों का समाधान हो गया था, लेकिन चीन ने उस समझौते को लागू नहीं किया। उस समझौते में दो चरण थे, जिसमें पहले चरण में भारत को पीछे हटना था, उसके बाद चीन को पीछे हटना था। पहला चरण पूरा हुआ, लेकिन चीन दूसरे चरण में पीछे नहीं हटा और इसके बजाय बहुत सारी चीजें बना दीं। इसलिए, यह कदम स्वागत योग्य है। फैबियन ने यह भी कहा कि हमें 'विश्वास करो, लेकिन सत्यापित करो' की नीति अपनानी चाहिए। उनका मानना है कि चीन पश्चिमी देशों से बढ़ते दबाव के कारण इस समझौते की ओर बढ़ा है। यह समझौता भारत-चीन संबंधों में एक नए दौर की शुरुआत कर सकता है, लेकिन इसके लिए दोनों देशों को एक दूसरे पर भरोसा करना होगा और समझौते को लागू करना होगा।

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