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कार्यकारिणी बैठक: अखिलेश सरकार की नाकामियों को गिनाने में लगे रहे भाजपा के नेता

Tue, 14 Jun 2016 01:20 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव/ अमर उजाला, इलाहाबाद
अविनाशी श्रीवास्तव/ अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Tue, 14 Jun 2016 01:20 AM IST
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in national executive meet of bharatiya janata party leaders only attacks on akhilesh government
- फोटो : ब्यूरो/ अमर उजाला, इलाहाबाद
लोकसभा चुनाव से पूर्व हर रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कहना नहीं भूलते थे कि विरोधी दलों ने ही दिल्ली का रास्ता आसान कर दिया है। मोदी-मोदी करके 90 फीसदी प्रचार तो विरोधी खुद कर दे रहे हैं। राजनीतिक रणनीतिकारों ने भी माना कि कांग्रेस तथा अन्य दलों के जरूरत से ज्यादा विरोध ने मोदी को देश का चेहरा बना दिया। वहीं भाजपा विकास के एजेंडे को प्रभावी तरीके से लोगों के बीच ले जाने में सफल रही, जो उनकी बड़ी जीत का कारण बना।
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विश्लेषकों ने इसे भारतीय राजनीति में सकारात्मक बदलाव के रूप में लिया। लेकिन अब युवाओं, बुद्धिजीवियों का मानना है कि  विरोध की सियासत से बेहतर उपलब्धियां गिनाना है। लोग अब विरोधियों पर हमले के बजाय यह जानना चाहते हैं कि बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी जड़ कर चुकी चुनौतियों से निपटने के लिए उनके पास क्या योजनाएं हैं।
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दिल्ली और बिहार में झटका खाने के बावजूद भाजपा के रणनीतिकार अखिलेश सरकार की नाकामियों को लेकर अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता के बीच जाना चाहते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा तथा अन्य दल अपनी योजनाएं बताने के बजाय आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल पर अधिक हमलावर रहे। इसके बाद बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव गठबंधन पर हमला बोलकर चुनाव में बढ़त की रणनीति बनाई लेकिन दोनों ही चुनाव में अप्रत्याशित नतीजे सामने आए।
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इन दोनों चुनाव में हार के बावजूद अब एक बार फिर भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिनी बैठक में यूपी फतह के लिए अखिलेश सरकार की नाकामियों के साथ जनता केबीच जाने का निर्णय लिया गया। बैठक में मथुरा, कैराना जैसी घटनाओं और प्रदेश की लचर कानून-व्यवस्था के एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया गया।

संगम की रेती पर आयोजित परिवर्तन रैली में भी भाजपा नेताओं का संबोधन पार्टी की नीतियों के बजाय अखिलेश सरकार और परिवारवाद पर केंद्रित रहा। उन्होंने भाजपा को सपा और बसपा के विकल्प के रूप में खुद को प्रस्तुत किया। वहीं नीतिश कुमार और केजरीवाल की तरह अखिलेश यादव चार साल में किए गए काम को लेकर अभी से जनता के बीच में हैं।

ऐसे में सियासी हल्के में यह चर्चा आम है कि विपक्षियों के विरोध की रणनीति के चक्रब्यूह में भाजपा खुद न फंस जाएं। यह चिंता भाजपा नेताओं की भी है। उनका मानना है कि विधानसभा चुनाव में प्रदेश सरकार को कोसने के बजाय मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों के साथ विजन-यूपी के एजेंडे के साथ आगे बढ़ा जाए, तभी जीत की राह आसान होगी।

खराब कानून व्यवस्था पर जेटली की अखिलेश को चुनौती

in national executive meet of bharatiya janata party leaders only attacks on akhilesh government
कहा, मुद्दा नहीं है तो करा लें जनमत सर्वेक्षण, इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ ले सपा - फोटो : PTI
उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर होने और महज सियासी वजहों से इसे भाजपा की ओर से मुद्दा बनाए जाने संबंधी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आरोपों पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और  वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पलटवार किया है। उन्होंने प्रदेश की कानून व्यवस्था पर अखिलेश को जनमत सर्वेक्षण कराने और इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली।

वित्त मंत्री ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त मानते हैं तो वह उन्हें इस मुद्दे पर जनमत सर्वेक्षण कराने की चुनौती देते हैं। सपा अगर चाहे तो इसी मुद्दे पर चुनाव भी लड़ा जा सकता है। जेटली ने दावा किया कि जनमत सर्वेक्षण से अखिलेश सरकार को हकीकत का अंदाज हो जाएगा।

पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पारित प्रस्तावों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समापन भाषण से संबंधित जानकारी देने आए जेटली ने दो टूक शब्दों में कहा कि पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव में विकास, सुशासन और सपा सरकार के दौरान कानून व्यवस्था की अराजक स्थिति को मुद्दा बनाएगी। इस दौरान उन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए पार्टी की ओर से फिर से हिंदुत्व के एजेंडे पर चलने संबंधी आरोपों को खारिज कर दिया।

जेटली ने कैराना में कथित तौर पर हिंदुओं के पलायन मामले को तूल देने संबंधी आरोपों को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इसकी जांच के लिए समिति बना दी गई है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी इस मुद्दे पर भावी रणनीति तय करेगी।
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