{"_id":"6ac5f29e547219e4c60e2003","slug":"immediate-action-on-court-verdict-gujarat-government-sets-timeline-departmental-accountability-to-be-fixed-2026-10-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोर्ट के फैसले पर तुरंत एक्शन: गुजरात सरकार ने तय की समय-सीमा, विभागों की तय होगी जवाबदेही","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
कोर्ट के फैसले पर तुरंत एक्शन: गुजरात सरकार ने तय की समय-सीमा, विभागों की तय होगी जवाबदेही
Wed, 07 Oct 2026 12:50 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी
न्यूज डेस्क, गांधीनगर
न्यूज डेस्क, गांधीनगर
Published by: अस्मिता त्रिपाठी
Updated Wed, 07 Oct 2026 12:50 PM IST
सार
गुजरात सरकार ने हाईकोर्ट के फैसलों के समयबद्ध अनुपालन के लिए नई एसओपी जारी की है। इसके तहत विभागों को फैसला स्वीकार करने, अपील करने या समय-विस्तार मांगने पर तय प्रक्रिया अपनानी होगी। अपील के दस्तावेज पूरे रखना और समय-सीमा का पालन अनिवार्य होगा, ताकि देरी और अदालती अवमानना से बचा जा सके।
विज्ञापन
अदालत (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
गुजरात सरकार ने हाईकोर्ट के फैसलों के समयबद्ध अनुपालन के संबंध में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट एवं जवाबदेह बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा राज्य के सभी प्रशासनिक विभागों के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) निर्धारित की गई है, जिसके अंतर्गत अदालत का निर्णय आने के बाद विभागों को निर्धारित प्रक्रिया एवं समय-सीमा के अनुसार कार्रवाई करनी होगी। इस एसओपी का मुख्य उद्देश्य फैसलों के क्रियान्वयन में होने वाले अनावश्यक विलंब को रोकना और ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से रोकना है, जिसके कारण कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट यानी अदालती अवमानना की स्थिति आए।
विज्ञापन
इस व्यवस्था में गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले के बाद विभागों के समक्ष उपलब्ध विकल्पों एवं उनकी प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। विधि विभाग के हाल ही में जारी हुए परिपत्र के अनुसार न्यायालय के निर्णय के बाद समय पर कार्रवाई नहीं होने से आदेश के क्रियान्वयन में विलंब हो सकता है। नई एसओपी इस प्रशासनिक विलंब को कम करने के लिए प्रक्रिया को टाइम-बाउंड बनाती है।
विज्ञापन
फैसला स्वीकार्य हो, तो कार्रवाई और अपील करनी हो, तो निर्धारित प्रक्रिया
अगर संबंधित प्रशासनिक विभाग हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार करता है, तो उसे वित्त विभाग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। वहीं विभाग को फैसले के विरुद्ध अपील करना उचित लगता है, तो विभागीय अभिप्राय के साथ विधि विभाग की सलाह लेकर निर्धारित समय-सीमा में लिटिगेशन की कार्रवाई शुरू करनी होगी। इसके साथ ही विधि विभाग द्वारा 29 जून 2024 को जारी किए गए निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक विभाग की होगी। अर्थात फैसला आने के बाद उसे लंबित रखने के बजाय विभाग को समयबद्ध ढंग से यह तय करना होगा कि निर्णय स्वीकार करना है या उसके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया शुरू करनी है।
विज्ञापन
अपील के प्रस्ताव में कागजी प्रक्रिया भी स्पष्ट रहेगी
अपील संबंधी प्रस्ताव तैयार करते समय ई-फाइल में दर्ज नोट के साथ उसमें संदर्भित दस्तावेजों को ई-सरकार प्रणाली में अपलोड करना अनिवार्य होगा। संबंधित दस्तावेजों तथा संदर्भों को स्पष्ट हाइपरलिंक के साथ दर्ज करना होगा तथा प्रस्ताव में आवश्यक विवरण उपलब्ध कराने होंगे। सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर वाली चेकलिस्ट में विलंब के कारणों सहित आवश्यक जानकारी दर्ज करने का प्रावधान भी किया गया है। इससे अपील के प्रस्तावों में दस्तावेजी पूर्णता एवं प्रक्रिया की स्पष्टता सुनिश्चित होगी और अनावश्यक पत्राचार या दस्तावेजों की कमी के कारण होने वाले विलंब को कम करने में सहायता मिलेगी।
समय पर क्रियान्वयन संभव न हो, तो कोर्ट से अतिरिक्त समय मांगा जा सकेगा
हो सकता है कि कुछ मामलों में व्यावहारिक कारणों से हाईकोर्ट के आदेश का निर्धारित अवधि में क्रियान्वयन करना संभव नहीं भी हो। उदाहरण के लिए; रिकॉर्ड उपलब्ध न होना, सेवा संबंधी आवश्यक जानकारी का अभाव या फैसले के अनुसार निर्णय लेने की प्रक्रिया लंबित हो। ऐसी परिस्थिति में संबंधित विभाग को हाईकोर्ट में मिसलेनियस सिविल एप्लीकेशन फॉर टाइम एक्सटेंशन दाखिल करके अतिरिक्त समय मांगने की कार्रवाई करनी होगी। महत्वपूर्ण रूप से अतिरिक्त समय के लिए यह आवेदन हाईकोर्ट द्वारा मूल फैसले में निर्धारित समय-सीमा के भीतर ही दाखिल करना होगा। इसे अंतिम समय तक लंबित रखने के बजाय समय पर कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होगी।
नई एसओपी से हाईकोर्ट के आदेशों के बाद क्रियान्वयन, अपील या समय-विस्तार; इन तीनों परिस्थितियों के लिए स्पष्ट प्रशासनिक मार्ग निर्धारित हुआ है। इससे न्यायिक आदेशों को लागू करने में समयबद्धता बढ़ाने, अनावश्यक विलंब कम करने और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिलेगी।