सब ठीक है तो लद्दाख में भारत-चीन के तनाव का हल क्या है?
- यह तो सरकार बताएगी
- मेरी नजर में मामला पेंचीदा हो रहा है
- सियाचिन जैसे हालात में लद्दाख में तैनात भारतीय सैनिक
विस्तार
सबकुछ ठीक है तो लद्दाख में भारत-चीन के तनाव का हल क्या है? यह सवाल जितना गंभीर है, पूर्व विदेश सचिव शशांक जैसे कूटनीति के जानकारों के पास इसका उतना ही आसान जवाब है। विदेश और रक्षा मामलों के जानकार रंजीत कुमार भी कहते हैं कि इसका जवाब तो सरकार देगी। वाइस एयर मार्शल (रिटायर) एनबी सिंह का कहना है कि ठंड अब सिर पर आ रही है। लद्दाख में पैंगोंग, गलवां समेत तमाम क्षेत्रों का तापमान-40 डिग्री तक जाता है। मुद्दा गंभीर है, लेकिन समाधान के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
लेफ्टिनेंट जनरल (पूर्व) बलबीर सिंह संधू आर्मी सप्लाई कोर के कमांडर इन चीफ रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल का कहना है कि सेना कोई भी चुनौती स्वीकारने के लिए हमेशा तैयार रहती है, लेकिन जनरल को पता है कि लद्दाख क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर भारतीय सैनिकों की तैनाती, उनके रहने-सहने का इंतजाम कितना खर्चीला, मुश्किलों भरा है। रसद सामग्री, दवा, टेंट, मोजे, जूते, किरासन तेल , सैनिकों को गर्म रखने वाले स्टोव समेत अन्य संसाधनों की आपूर्ति और उसकी एक चेन बनाना किसी पहाड़ सी चुनौती से कम नहीं है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि इसके लिए यूरोप से -40 डिग्री वाली पोशाक, टेंट आदि की आपूर्ति जारी है और इसे लद्दाख के सीमा क्षेत्र में भेजा जा रहा है।
भारत और चीन दोनों की टाल-मटोल की रणनीति
भारत और चीन दोनों की रणनीति पुराने रणनीतिकारों को समझ में नहीं आ रही है। रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री स्तर की बातचीत के बाद भारत और चीन के रणनीतिकार फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास करके एक-दूसरे को थकाने की रणनीति पर चल रहे हैं। सैन्य सूत्र बताते हैं पैंगॉग झील से लेकर क्षेत्र में आवागमन के रास्ते भी बाधित हैं। कई क्षेत्रों में पानी है। कुछ रास्तों को चीन की सेना ने बंद कर दिया है, कुछ को सुरक्षा कारणों से बेहद संकरा कर दिया है। दूसरी तरफ भारतीय सेना ने भी तमाम कदम उठाए हैं।
इस तरह के हालात में सैन्य सूत्रों का अनुमान है कि देश के करीब 50 हजार सैनिकों को इस बार की ठंड का मौसम लद्दाख क्षेत्र में ही गुजारना पड़ सकता है। इसी तरह की स्थिति चीन के साथ भी रहने वाली है। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की माने तो चीन के सैनिकों के सामने चुनौती थोड़ा कम है। जबकि भारतीय सैनिकों की चुनौती बड़ी है। इसका कारण चीन की सेना का ठंड के इलाके में तैनाती के अभ्यस्त होना, दूसरी तरफ सैन्य संसाधनों की प्रचुरता तथा पठारी क्षेत्र में तैनाती बताई जा रही है। जबकि भारतीय सैनिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में तैनात हैं।
संयुक्त राष्ट्र में शांत रहे पीएम
संयुक्तराष्ट्र महासभा की बैठक को बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन को ईशारे में भी कुछ नहीं कहा। आतंकवाद की तरह विस्तारवादी नीतियों पर भी कुछ नहीं बोले। जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर चीन पर हमला बोला। जापान जैसे देश ने निशाना बनाया, लेकिन प्रधानमंत्री ने रणनीतिक रूप से चीन को सीधे परोक्ष रूप से नहीं छेड़ा। प्रधानमंत्री के इस रूख का सैन्य और कूटनीति के जानकार अभी मूल्यांकन कर रहे हैं। कूटनीति के जानकारों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में परोक्ष रूप से चीन को आईना दिखाएंगे, लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा न करके चीन के साथ सैन्य और कूटनीतिक पहल
का संकेत दिया है।
सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत और वर्किंग मैकेनिज्म का प्रयास
करीब डेढ़ महीने से अधिक के अंतराल के बाद दोनों देशों के सैन्य कमांडरों ने छठवें दौर की बातचीत की। सैन्य कमांडरों के साथ दोनों देशों के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भी पहल में हिस्सा लिया। लेकिन समाधान को केंद्र में रखकर बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल पाया है। बातचीत में चीन अब भारत से काला टॉप, हेलमेट टॉप सहित कुछ क्षेत्र पहले खाली करने को का दबाव बना रहा है। चीन के अधिकारी भारत पर स्टेट्स-को बदलने का एकतरफा प्रयास करने तथा बनी सहमति को तोडऩे का आरोप लगा रहे हैं।
पांच मई 2020 के बाद और 29 अगस्त से पहले यह आरोप भारत लगाता था। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चीन की फौज सौकडों (900 वर्ग किमी से अधिक) वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र में पांच मई के बाद से घुसपैठ करके बैठी है। भारत के सैनिकों ने केवल दक्षिणी पैंगोंग, पूर्वी लद्दाख और रेजांग ला पहाड़ी के कुछ सामरिक प्रभाव वाले क्षेत्र पर बढ़त बनाई है। अब चीनी सैन्य अधिकारी, विदेश मंत्रालय के अधिकारी पहले भारत से इन क्षेत्रों को ही खाली करने का दबाव बना रहे हैं। भारतीय क्षेत्र को चीन की फौज द्वारा कब्जाने, उसे खाली करने, पीछे जाने का मुद्दे पर कोई सख्त रुख नहीं बन पा रहा है।
चिंता की बात....घुसपैठ नहीं हुई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संबोधन (मन की बात) में चीन की फौज द्वारा भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ को लेकर अपना वक्तव्य दिया था। रक्षा मंत्रालय की वेब साइट पर भी पांच मई के बाद चीनी घुसपैठ को लेकर तथ्य अपलोड किए गए और बाद में हटा लिए गए। संसद में मानसून सत्र के दौरान इन्हीं दोनों नीतियों पर कायम रहते हुए गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने वक्तव्य भी दे दिया।
गृहराज्य मंत्री ने अपने लिखित जवाब में कहा कि चीन की फौज ने भारतीय सीमा घुसपैठ नहीं की है। सेना मुख्यालय के अफसर इस वक्तव्य के तमाम तकनीकी कारण बताते हैं, लेकिन कूटनीति के जानकार भारत सरकार की इस तरह की सफाई पर भी हैरान हैं। उनका कहना है कि जब घुसपैठ नहीं हुई है, भारत मान रहा है तो फिर हाय तौबा किसलिए? रंजीत कुमार का कहना है कि चीन इसका कूटनीतिक लाभ लेने की पूरी कोशिश कर रहा है।
फिक्सन प्वाइंट क्या है?
दोनों देशों के सैन्य कमांडरों और वर्किंग ग्रुप में एक सहमति बनी है। सहमति के अनुसार दोनों देशों के सैनिक स्टेट्स-को (यथास्थिति) पर कायम रहेंगे। कोई नया सैनिक मूवमेंट नहीं होगा (नए स्थान पर)। दोनों देशों की तरफ से वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति को बदलने का कोई नया और एकतरफा प्रयास नहीं होगा। इसका आशय यह हुआ कि भारत और चीन की सेनाएं जहां, जैसे तैनात हैं, मुद्दे का समाधान होने तक तैनात रहेंगी। इसके समानांतर एक तथ्य और चौकाने वाला है। चीन भी वास्तिविक नियंत्रण रेखा का जिक्र नहीं कर रहा है। वार्ता में फिक्सन प्वाइंट शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। यह भी एक नई कूटनीतिक कोशिश है।
सैन्य तैनाती बढ़ रही है
चीन लद्दाख क्षेत्र में तनाव को केन्द्र में रखकर लगातार फायर पॉवर का प्रदर्शन कर रहा है। सैन्य सूत्र बताते हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के उसपार चीन की सैन्य तैनाती लगातार सुदृढ़ और मजबूत हो रही है। वह टैंक, तोप, मिसाइल लांचर, हेलीकाप्टर, फाइटर जेट, यूएवी समेत इंफैट्री की घातक टुकड़ी को सीमा पर तैनात कर रहा है। चीन की तैनाती को देखते हुए भारत ने अपने सभी अग्रिम पंक्ति के फाइटर जेटों, मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली आकाश, टैंक, तोप, हेलीकाप्टर, फास्ट बोट समेत अन्य की तैनाती कर रखी है। इंफैट्री के फाइटिंग यूनिट ने मोर्चा संभाल रखा है और सेना के विशेष दस्ते हर चुनौती का सामना करने के लिए डटे हैं।
क्या है आगे उम्मीद की किरण
नवंबर में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर नेताओं की बैठक होनी है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित करने के लिए उन्हें फोन किया था। प्रधानमंत्री ने शामिल होने का आश्वासन दे दिया है। अभी यह तय नहीं है कि शिकर बैठक वर्चुअल होगी या प्रधानमंत्री मॉस्को जाएंगे। लेकिन कूटनीतिज्ञों के मुताबिक प्रधानमंत्री के मास्को जाने की स्थिति में उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होना तय है। उससे पहले दोनों देशों के शिखर नेताओं की भेंट का कोई अन्य प्लेटफार्म अभी नहीं है। इसलिए लद्दाख में तनाव का हल शंघाई सहयोग संगठन के शिखर नेताओं की बैठक के दौरान ही निकल सकता है।
शिखर नेताओं से पहले एनएसए की चर्चा के आसार
परंपरा के अनुसार शिखर नेताओं (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग) की भेंट के समय सौदेबाजी नहीं होती। इससे पहले दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी वार्ता करके सहमति वाले मुद्दे तैयार करते हैं और शिखर नेताओं की द्विपक्षीय बैठक में इस पर मुहर लग जाती है। समझा जा रहा है कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए भारत और चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि) या विदेश मंत्रियों के बीच में वार्ता हो सकती है।