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निडर बाप की बेटी हूं, डरना नहीं सीखा, घाटी जाकर पूरा करूंगी पापा का सपना : शीन

Fri, 12 Jun 2020 04:32 AM IST
योगेश साहू हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली।
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 12 Jun 2020 04:32 AM IST
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I am the daughter of a fearless father, learned not to be afraid, will go to kashmir valley and fulfill his dream : Sheen Pandita
सरपंच अजय पंडिता की हत्या - फोटो : सोशल मीडिया

कश्मीर घाटी में आतंकियों की गोली का शिकार बन जान गंवाने वाले इकलौते कश्मीरी पंडित सरपंच अजय पंडिता की बेटी नियंता उर्फ शीन जीवन का सबसे बड़ा दर्द झेलने के बाद भी टूटी नहीं हैं। कहती हैं जहां पिता की हत्या हुई वहीं जाकर उनका सपना पूरा करूंगी। उन्हें पिता को शासन-प्रशासन से सहयोग न मिलने का दुख है, मगर देश के प्रति कुछ कर गुजरने के जज्बे में कमी नहीं आई है। हमारे संवाददाता हिमांशु मिश्र की चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से बीबीए कर रही शीन से बातचीत-

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पिता को खोने का दुख बहुत बड़ा है, अब आगे क्या सोचा है?
शीन:
पापा किसी से नहीं डरते थे। उन्होंने हमें डरना नहीं सिखाया। मैं डंके की चोट पर कहती हूं कि पापा का सपना पूरा करने के लिए जन्मभूमि पर वापस लौटूंगी। यह दिखाने के लिए भी कि मैं उसी पापा की बेटी हूं जो किसी से नहीं डरते थे। यह बता दूंगी कि मैं भारतीय हूं। हां, मुझे इस बात का अफसोस रहेगा कि शासन-प्रशासन ने मेरे पापा की कोई मदद नहीं की।
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क्या आप सुरक्षा नहीं देने की बात कह रही हैं?
शीन:
जी, यह भी घटना का मामूली पक्ष है। सवाल शासन-प्रशासन का ऐसे व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार है, जो देश के लिए जिया और देश के लिए जान दे दी। पापा ने सुरक्षा मांगी तो घाटी के कमिश्नर ने आवेदन डिप्टी कमिश्नर को भेज दिया। डिप्टी कमिश्नर ने कहा, जब आपको पता था कि चुनाव लड़ने में खतरा होगा तो क्यों लड़े? इससे आप समझ सकते हैं, घाटी में शासन-प्रशासन देशभक्त लोगों से कैसा सलूक करता है।

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क्या इससे कश्मीरी पंडितों की वापसी का सपना टूटेगा?

शीन: मेरे पापा इकलौते नहीं थे, जिनके शब्दकोश में डर नाम का शब्द नहीं था। हमारा देश महान है। लाखों लोग देश के लिए जान देने को तैयार रहते हैं। सवाल शासन-प्रशासन के रवैये का है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद अब तक दस सरपंचों की हत्या हो चुकी है। शासन उनकी भी रक्षा नहीं कर पा रहा। सुरक्षा देने की बात तो छोड़िए, गृहमंत्री अमित शाह ने सरपंचों को महज दो लाख रुपये का बीमा कवर देने का वादा भी नहीं निभाया।

मतलब कश्मीरी पंडितों की घर वापसी बेहद मुश्किल है?
शीन:
यह सवाल सरकारों से पूछना चाहिए। पापा ने घाटी लौटने के लिए अनुच्छेद 370 के खात्मे का इंतजार नहीं किया। वह दोनों समुदायों में लोकप्रिय थे। घाटी के एकमात्र निर्वाचित हिंदू सरपंच थे। सरकार ऐसे व्यक्ति की भी रक्षा नहीं कर पाई। बार-बार सुरक्षा मांगने के बावजूद सुरक्षा नहीं दी गई। जिन आतंकियों ने उन्हें मारा वह सीना ठोककर कह रहा है कि हां, मैंने मारा। जब ऐसी स्थिति हो तो आप समझ सकते हैं कि इस सवाल का क्या जवाब होगा।

इसके बावजूद आप घाटी लौटने की बात कह रही हैं?

शीना: मैं निडर बाप की निडर बेटी हूं। हो सकता है मेरा हश्र भी पापा की तरह हो, मगर डरूंगी नहीं। कश्मीर भारत का है। मेरे पिता का भी है। मेरी तरह सोच रखने वालों की कमी नहीं है। मगर सवाल है कि क्या सरकार जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की कोशिश करेगी?

कश्मीर का क्या भविष्य देखती हैं?
शीन:
कश्मीर भारत का ही रहेगा। जरूरत ऐसी सोच-समझ रखने वालों को हौसला देने की है। मगर यह कौन करेगा? शासन-प्रशासन का रवैया अलगाववादियों की रणनीति को अमली जामा पहनाने वाला है। अभी बीबीए कर रही हूं। पापा का सपना पूरा करने की जिम्मेदारी है। मैं जन्मभूमि जाऊंगी। पापा मुझे आईएएस बनाना चाहते थे। मुझे नहीं पता आगे क्या राह होगी, मगर मैं देश की सेवा करूंगी, इसका जरिया कुछ भी हो।

देश के लिए कुछ कहना चाहेंगी?

शीन: क्या कहूं! पापा के हत्यारे को सजा देना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसा नहीं हुआ तो कोई कैसे घाटी में देश का झंडा बुलंद करेगा। कायर हत्यारे जिसने पापा को पीछे से गोली मारी उसे कानून की जद में लाकर देश को संदेश देना होगा।
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