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देखना है कि वर्चस्व की लड़ाई में कितना पार पाती हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

Sun, 16 Jun 2019 04:06 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Sun, 16 Jun 2019 04:06 PM IST
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How West Bengal CM Mamata Banerjee will tackle BJP
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

भाजपा को पश्चिम बंगाल में कमल खिलाना है। राज्य में सरकार बनानी है। पार्टी के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है। इसके लिए पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कमर कसकर तैयार हैं। उनका मार्ग दर्शन भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कर रहे हैं। भाजपा पूरा आंदोलन अपने अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चला रही है। 

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अमित शाह हर लक्ष्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंत्रणा के बाद तय करते हैं। मुकाबले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी हैं। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का नारा बुलंद कर दिया है। जवाब में ममता बनर्जी मां, माटी, मानुष से आगे निकलकर बंगाल की अस्मिता के सहारे हैं।
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दिलीप घोष का कहना है कि पश्चिम बंगाल की सरकार अराजक हो चुकी है। सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हो रहा है और आए दिन भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं, उनकी हत्या हो रही है। घोष कहते हैं लेकिन हम हर कुर्बानी के लिए तैयार हैं। दिलीप घोष राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे। प्रचारक का जीवन जीते रहे हैं।
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इस समय उनके हाथ में पश्चिम बंगाल भाजपा की कमान है। उनमें संगठनात्मक क्षमता कूट-कूट कर भरी है। घोष का कहना है कि राज्य की जनता त्रस्त है। वह विकल्प देख रही है और जनता ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को 40 फीसदी वोट और लोकसभा की 18 सीटें देकर इसे साबित कर दिया है। इससे बनर्जी परेशान हैं।

भाजपा के जवाब में ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस को 22 सीटें मिली, 43 फीसदी वोट खाते में आए। यह कहने में कोई गुरेज नहीं है भाजपा ने ममता बनर्जी के नींव की ईंट हिला दी है। भाजपा के पश्चिम बंगाल में आईटी सेल के प्रमुख दीपक दास ने काफी सक्रियता दिखाई और बताया कि कैसे व्हाट्सएप, फेसबुक, सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक संदेश पहुंचाया जाता है। 

भाजपा ने लोकसभा चुनाव में दलित, आदिवासी और खासकर हिंदुओं पर फोकस किया। मुद्दों के चयन में भी इसको लेकर सावधानी बरती गई। बांग्लादेशी दलित आदिवासियों और झारखंड की सीमा से सटे आदिवासियों को मिलाने में भी कुशलता दिखाई।

छिड़ गई है वर्चस्व की लड़ाई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में घुमावदार मोड़ आया है। तृणमूल कांग्रेस ने सीपीआई (एम) पर काफी दबाव बनाया। नतीजतन सीपीआई (एम) के नेताओं ने तृणमूल को हराने के लिए भाजपा का दामन थाम लिया। इसके कारण 2014 के चुनाव में 30 फीसदी वोट पाने वाली सीपीएम (आई) को 2019 में केवल 6 फीसदी वोट मिले।

हालांकि तृणमूल को 2014 के मुकाबले 4 फीसदी वोट ज्यादा मिले। वह 39 से 43 फीसदी वोट पाने में सफल रही, लेकिन भाजपा के वोटों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ। यहां तक कि भाजपा माल्दा जैसे करीब 52 प्रतिशत वाले मुस्लिम बाहुल इलाके में एक सीट जीत गई और दूसरी केवल 8222 मतों से हारी है। 

यह नतीजा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हजम नहीं हो रहा है। क्योंकि माल्दा में केवल 48 फीसदी वोट हिंदुओं के हैं और भाजपा 36 फीसदी वोट पाने में सफल रही। इस तरह से सांप्रदायिक बंटवारा करके भाजपा ने तृणमूल को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

मुकाबले में ममता बनर्जी बेहद आक्रामक होती जा रही हैं। वह जयश्री राम के नारे से लेकर भगवा रंग तक से परहेज करने लगी हैं। मुख्यमंत्री के इस रुख पर भाजपा ने केंद्र में नई सरकार बनने के बाद चारों तरफ से शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय भी पश्चिम बंगाल को लेकर लगातार संवेदनशील है।

क्या रहेगा पश्चिम बंगाल सरकार का भविष्य

राज्य में केशरी नाथ त्रिपाठी राज्यपाल हैं। कानूनविद् हैं। महामहिम को केंद्र सरकार की शक्तियों और राज्य सरकार की सीमाओं की ढंग से जानकारी है। राज्य में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं में शीर्ष स्तर से लेकर गांव और ब्लाक के स्तर पर टकराव की स्थिति है। 2019 में 26, 2017-18 में 96 राजनीतिक कार्यकर्ता मारे गए। केंद्र ने राज्य सरकार से वहां हिंसा के हालात को लेकर रिपोर्ट मांगी है। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस तरह से राज्य सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू किया है। लेकिन माना जा रहा है कि न तो भाजपा के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय और न ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राज्य सरकार को बर्खास्त करके ममता बनर्जी को कोई सहानुभूति का लाभ देने के पक्ष में हैं। 

इसलिए भविष्य में राज्य सरकार पर केंद्र का लगातार दबाव बना रहेगा, लेकिन सरकार के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने के संकेत कम हैं। 2021 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है और इससे पहले भाजपा वहां पूरी जमीन तैयार कर लेना चाहती है।

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