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Maharashtra: उद्धव के हाथ मशाल, शिंदे को दो तलवार के साथ ढाल, शिवसेना के दोनों धड़ों को कैसे मिला चुनाव निशान?

Tue, 11 Oct 2022 08:53 PM IST
जयदेव सिंह स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 11 Oct 2022 08:53 PM IST
सार

आइये जानते हैं चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को ये नाम और निशान क्यों दिया? शिंदे गुट को एक दिन बाद चुनाव चिह्न क्यों आवंटित हुआ? शिंदे गुट ने कौन से विकल्प चुनाव आयोग को दिए थे?  पहले कब किसी पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर इस तरह का फैसला हुआ था?

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How Election Commission Allots Election Symbol To Eknath Shinde and Uddhav Thackeray Faction
Eknath Shinde, Uddhav Thackeray - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में होने वाले आगामी उप-चुनाव के लिए शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट को चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया है। इससे पहले सोमवार को शिंदे और उद्धव गुट की शिवसेना को अलग-अलग नाम आवंटित किया गया था। इसके साथ ही आयोग ने उद्धव गुट को नया चुनाव चिह्न भी आवंटित कर दिया था। शिंद गुट को दो तलवार और एक ढाल चुनाव चिह्न मिला है। 

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उद्धव गुट को जलती हुई मशाल चुनाव चिह्न के रूप में मिली है।  उद्धव गुट की शिवसेना का नया नाम शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे है। वहीं, शिंदे गुट की शिवसेना को चुनाव आयोग ने बालासाहेबची शिवसेना नाम आवंटित किया है। 

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आइये जानते हैं चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को ये नाम और निशान क्यों दिया? शिंदे गुट को एक दिन बाद चुनाव चिह्न क्यों आवंटित किया गया? शिंदे गुट ने कौन से विकल्प चुनाव आयोग को दिए थे? कौन सा विकल्प किस आधार पर रद्द कर दिया गया? उद्धव गुट को मशाल चुनाव चिह्न क्यों मिला?  इससे पहले कब चुनाव आयोग ने किसी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न को लेकर इस तरह का फैसला लिया?

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How Election Commission Allots Election Symbol To Eknath Shinde and Uddhav Thackeray Faction
एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे - फोटो : सोशल मीडिया

चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को ये नाम और निशान क्यों दिया?

दरअसल, तीन नवंबर को महाराष्ट्र के अंधेरी ईस्ट विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। इस सीट से अब तक शिवसेना के रमेश लटके विधायक थे। रमेश अपने परिवार के साथ दुबई गए थे, जहां दिल का दौरा पड़ने के कारण 12 मई को उनका निधन हो गया। 

चुनाव आयोग ने तीन नवंबर को यहां उपचुनाव कराने का फैसला लिया है। इसके लिए शिंदे गुट और भाजपा ने मिलकर यहां से पूर्व पार्षद मुरजी पटेल को अपना संयुक्त उम्मीदवार बनाया है। पटेल के सामने उद्धव गुट का उम्मीदवार भी होगा। उद्धव गुट को कांग्रेस, एनसीपी का भी समर्थन मिला है। उद्धव ठाकरे के हटने और शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पहला चुनाव है। ऐसे में दोनों गुटों के लिए ये चुनाव किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। इस चुनाव में दोनों गुट आमने सामने होंगे। इसे लेकर दोनों गुटों ने शिवसेना के नाम और चुनाव निशान पर अपना दावा चुनाव आयोग में पेश किया था। इसी को देखते हुए चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों फ्रीज करके दोनों गुटों से तीन-तीन वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न मांगे थे। 

How Election Commission Allots Election Symbol To Eknath Shinde and Uddhav Thackeray Faction
एकनाथ शिंदे - फोटो : ANI

शिंदे गुट को एक दिन बाद चुनाव चिह्न क्यों आवंटित किया गया?
उद्धव गुट को सोमवार को मशाल चुनाव चिह्न मिल गया था। वहीं, मंगलवार को आयोग ने शिंदे गुट को नया चुनाव चिह्न आवंटित किया। चुनाव आयोग ने सोमवार सुबह 10 बजे तक चुनाव चिह्न के लिए तीन विकल्प मांगे थे। शिंदे गुट ने जो तीन विकल्प दिए थे, उनमें से एक भी आयोग ने आवंटित नहीं किए। आवंटित नहीं करने का कारण भी आयोग ने बताए। इसके बाद शिंदे गुट से आयोग ने तीन नए विकल्प मांगे थे। इसके लिए मंगलवार सुबह तक का वक्त दिया गया था। शिंदे गुट की ओर से नए विकल्प देने के बाद उनमें से दो तलवार और एक ढाल विकल्प शिंदे गुट को आवंटित किया गया। 

क्या तलवार और ढाल शिंदे गुट का पहला विकल्प था?
नहीं। शिंदे गुट की ओर से दूसरी बार सौंपे गए तीन विकल्प की सूची में पहला विकल्प सूरज था। आयोग ने इस विकल्प को निरस्त कर दिया। इसके लिए चुनाव आयोग ने तीन कारण बताए। पहला- सूरज, उगता हुआ सूरज जैसे चुनाव निशान पहले से क्षेत्रीय दलों को आवंटित हैं। उगता हुआ सूरज जहां तमिलनाडु की सत्ताधारी द्रमुक का चुनाव चिह्न हैं। वहीं, बिना किरणों के सूरज मिजोरम की जोराम नेशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिह्न है। इसलिए इस तरह का चुनाव चिह्न आवंटित नहीं किया जा सकता है। दूसरा- शिंदे गुट द्वारा मांगा गया चुनाव चिह्न जोराम नेशलिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ, फ्री सिंबल सेब, गोभी और फुटबॉल से मेल खाता है। तीसरा- जो चुनाव निशान मांगा गया है वह फ्री सिंबल की लिस्ट में नहीं है। 

शिंदे गुट की ओर से दूसरे विकल्प के रूप में क्या दिया गया था?
शिंदे गुट ने दूसरे विकल्प के रूप में दो तलवारें और ढाल चुनाव चिह्न के रूप में दिया था। यह चुनाव निशान भी चुनाव आयोग के फ्री सिंबल में नहीं था। 2004 तक मेघालय की पीपुल्स डेमोक्रेटिक मूवमेंट का चुनाव निशान था। 2003 में पार्टी भंग हो गई। 2016 में इस चुनाव चिह्न की डिलिस्ट कर दिया गया। इस वजह से चुनाव आयोग ने यह चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित कर दिया। तीसरे विकल्प के रूप में शिंदे गुट ने ‘पीपल का पेड़' चुनाव चिह्न दिया था। 

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एकनाथ शिंदे - फोटो : ANI

उद्धव गुट को मशाल चुनाव चिह्न क्यों मिला? 
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों से कहा कि वे उपचुनावों के लिए अधिसूचित फ्री सिंबल की लिस्ट से अलग-अलग चुनाव चिह्न चुनें और दस तारीख तक बता दें। इसके बाद उद्धव गुट ने त्रिशूल, उगता सूरज और मशाल चुनाव चिह्न विकल्प के रूप में दिए थे। इनमें से उद्धव गुट को मशाल चुनाव चिह्न मिल गया। उद्धव गुट को 'त्रिशूल' का चिह्न इसलिए नहीं मिला क्योंकि इसका धार्मिक संकेत है। 'उगता सूरज' इसलिए नहीं मिला क्योंकि यह तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक के पास है। 'मशाल' चुनाव चिह्न 2004 तक समता पार्टी के पास था। उसके बाद से यह किसी को आवंटित नहीं था, इसलिए यह चिह्न उद्धव गुट को दिया गया है।

 

शिंदे गुट ने पहले कौन से चुनाव निशान मांगे थे?

शिंदे गुट ने पहले गदा, उगता सूरज और त्रिशूल में से कोई एक चिह्न मांगा था। गदा और त्रिशूल के धार्मिक संकेत होने के चलते दोनों चुनाव निशान शिंदे गुट को नहीं मिले। वहीं, उगता सूरज द्रमुक का चुनाव निशान होने के कारण नहीं मिला। शिंदे गुट को 11 अक्टूबर सुबह 10 बजे तक अपनी पसंद के तीन नए चुनाव चिह्न बताने को कहा गया था। उसी आधार पर यह फैसला हुआ है।  

दोनों गुटों के नाम का क्या?
दोनों गुट ने अपने पहले वैकल्पिक नाम के तौर पर शिवसेना (बालासाहेब ठाकरे) नाम दिया था। इस वजह से यह नाम दोनों ही गुटों को यह नाम नहीं मिला। इसके साथ ही उद्धव गुट के विकल्प में पार्टी के नाम के रूप में दूसरा विकल्प शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नाम था। इसे उद्धव गुट को आवंटित कर दिया गया। इसी तरह शिंदे गुट के विकल्प में दूसरा विकल्प बालासाहेबची शिवसेना नाम शिंदे गुट को आवंटित कर दिया गया। 

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शिवसेना के कार्यकर्ता(फाइल) - फोटो : पीटीआई

दोनों गुटों का पहला वैकल्पिक चुनाव निशान त्रिशूल, किसी को नहीं मिला

दोनों गुटों ने चुनाव निशान के तौर पर पहला विकल्प त्रिशूल को दिया था। चुनाव आयोग ने इसे तीन कारण बताकर निरस्त कर दिया। पहला कारण यह की ये धार्मिक संकेत है। जो 1968 के चुनाव चिह्न आवंटन आदेश के मुताबिक किसी भी पार्टी को आवंटित नहीं किया जा सकता। 

दोनों गुटों ने वैकल्पिक चुनाव चिह्न के रूप में पहला विकल्प त्रिशूल को ही दिया था। इसलिए चुनाव आयोग ने इस चुनाव चिह्न को नहीं आवंटित करने का दूसरा कारण बताया। वहीं, तीसरे कारण के रूप में चुनाव आयोग ने कहा कि यह चुनाव चिह्न चुनाव आयोग की फ्री सिंबल लिस्ट का हिस्सा नहीं है। इसी तरह उगता सूरज दोनों गुटों का दूसरा वैकल्पिक चुनाव चिह्न होने के कारण दोनों ही गुटों को आवंटित नहीं किया गया। 

इससे पहले कब चुनाव आयोग ने किसी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न को लेकर इस तरह का फैसला लिया?

इससे पहले जून 2021 में लोजपा के चुनाव निशान को चुनाव आयोग फ्रीज कर चुका है। तब, चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति पारस के बीच पार्टी पर कब्जे को लेकर जंग हुई थी। पशुपति ने पार्टी के छह में से पांच सांसदों को अपने साथ मिलाकर चिराग से संसदीय दल के पद और पार्टी की कमान दोनों ही छीन ली। पशुपति पारस अब केंद्र में मंत्री हैं। लोजपा का नाम पशुपति पारस गुट को मिला। वहीं, चिराग अब लोजपा (रामविलास) के नेता हैं। वहीं, पार्टी का चुनाव निशान बंगला चुनाव आयोग ने फ्रीज कर दिया।

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