{"_id":"64c5053435552cd27e0db90c","slug":"how-bjp-can-pass-delhi-ordinance-in-rajya-sabha-despite-congress-backing-aap-2023-07-29","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Delhi Ordinance: दिल्ली अध्यादेश के विरोध में AAP क्यों, इंडिया गठबंधन के बाद राज्यसभा से कैसे पास होगा बिल?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Delhi Ordinance: दिल्ली अध्यादेश के विरोध में AAP क्यों, इंडिया गठबंधन के बाद राज्यसभा से कैसे पास होगा बिल?
Sat, 29 Jul 2023 06:01 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Sat, 29 Jul 2023 06:01 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
दिल्ली अध्यादेश
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
आम आदमी पार्टी और भाजपा दिल्ली अध्यादेश को लेकर पिछले कुछ दिनों से आमने-सामने हैं। अब इसे अगले हफ्ते संसद में पेश किया जा सकता है। पिछले दिनों ही इसे केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। एक ओर जहां आप विरोधी दलों को इसके खिलाफ एकजुट करने की कोशिश में जुटी है वहीं, भाजपा आसानी से इस बिल को पास कराने की तैयारी में जुटी हुई है।आखिर अध्यादेश क्या होता है? दिल्ली अध्यादेश क्या है? इसको लेकर अभी क्या होने वाला है? क्या बिल संसद में पास होगा? आखिर राज्यसभा में संख्या गणित क्या है? आइये जानते हैं…
संविधान
- फोटो :
अमर उजाला
पहले जानते हैं अध्यादेश क्या होता है?
अध्यादेश राष्ट्रपति की तरफ से जारी होते हैं। जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है तब जरूरत पड़ने पर इसी के तहत कानून बनाया जाता है। संसद सत्र चलने के दौरान अध्यादेश नहीं लाया जा सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में अध्यादेश का जिक्र है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति के पास अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। ये अध्यादेश संसद से पारित कानून जितना ही शक्तिशाली होता है। अध्यादेश के साथ एक शर्त जुड़ी होती है। अध्यादेश जारी होने के छह महीने के भीतर इसे संसद से पारित कराना जरूरी होता है। यही कारण है कि केंद्र को इसी सत्र में दिल्ली अध्यादेश लाना होगा क्योंकि शीतकालीन सत्र नवंबर-दिसंबर में होगा तब तक इसकी समय सीमा खत्म हो जाएगी।
अध्यादेश के जरिए बनाए गए कानून को कभी भी वापस लिया जा सकता है। अध्यादेश के जरिए सरकार कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती, जिससे लोगों के मूल अधिकार छीने जाएं।
अध्यादेश राष्ट्रपति की तरफ से जारी होते हैं। जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है तब जरूरत पड़ने पर इसी के तहत कानून बनाया जाता है। संसद सत्र चलने के दौरान अध्यादेश नहीं लाया जा सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 में अध्यादेश का जिक्र है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति के पास अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। ये अध्यादेश संसद से पारित कानून जितना ही शक्तिशाली होता है। अध्यादेश के साथ एक शर्त जुड़ी होती है। अध्यादेश जारी होने के छह महीने के भीतर इसे संसद से पारित कराना जरूरी होता है। यही कारण है कि केंद्र को इसी सत्र में दिल्ली अध्यादेश लाना होगा क्योंकि शीतकालीन सत्र नवंबर-दिसंबर में होगा तब तक इसकी समय सीमा खत्म हो जाएगी।
अध्यादेश के जरिए बनाए गए कानून को कभी भी वापस लिया जा सकता है। अध्यादेश के जरिए सरकार कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती, जिससे लोगों के मूल अधिकार छीने जाएं।
Delhi LG Dr VK saxena and CM Arvind Kejriwal
- फोटो :
Agency (File Photo)
दिल्ली अध्यादेश क्या है?
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 11 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली में जमीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी सारे प्रशासनिक फैसले लेने के लिए दिल्ली की सरकार स्वतंत्र होगी। अधिकारियों और कर्मचारियों का ट्रांसफर-पोस्टिंग भी कर पाएगी।
उपराज्यपाल इन तीन मुद्दों को छोड़कर दिल्ली सरकार के बाकी फैसले मानने के लिए बाध्य हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस मामले में सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। शीर्ष अदालत के 11 मई के फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों के स्थानांतरण और तैनाती उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में थे।
हालांकि, कोर्ट के फैसले के एक हफ्ते बाद 19 मई को केंद्र सरकार एक अध्यादेश ले आई। केंद्र ने 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऑर्डिनेंस, 2023' लाकर प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार वापस उपराज्यपाल को दे दिया। इस अध्यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सर्विसेज अथॉरिटी का गठन किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और गृह सचिव को इसका सदस्य बनाया गया है। मुख्यमंत्री इस अथॉरिटी के अध्यक्ष होंगे और बहुमत के आधार पर यह प्राधिकरण फैसले लेगा। हालांकि, प्राधिकरण के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर दिल्ली के उपराज्यपाल का फैसला अंतिम माना जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 11 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली में जमीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी सारे प्रशासनिक फैसले लेने के लिए दिल्ली की सरकार स्वतंत्र होगी। अधिकारियों और कर्मचारियों का ट्रांसफर-पोस्टिंग भी कर पाएगी।
उपराज्यपाल इन तीन मुद्दों को छोड़कर दिल्ली सरकार के बाकी फैसले मानने के लिए बाध्य हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस मामले में सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। शीर्ष अदालत के 11 मई के फैसले से पहले दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों के स्थानांतरण और तैनाती उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में थे।
हालांकि, कोर्ट के फैसले के एक हफ्ते बाद 19 मई को केंद्र सरकार एक अध्यादेश ले आई। केंद्र ने 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऑर्डिनेंस, 2023' लाकर प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार वापस उपराज्यपाल को दे दिया। इस अध्यादेश के तहत राष्ट्रीय राजधानी सिविल सर्विसेज अथॉरिटी का गठन किया गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और गृह सचिव को इसका सदस्य बनाया गया है। मुख्यमंत्री इस अथॉरिटी के अध्यक्ष होंगे और बहुमत के आधार पर यह प्राधिकरण फैसले लेगा। हालांकि, प्राधिकरण के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर दिल्ली के उपराज्यपाल का फैसला अंतिम माना जाएगा।
पीएम मोदी और अमित शाह
- फोटो :
पीटीआई
केंद्र सरकार अध्यादेश क्यों लाई?
दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, वह केजरीवाल सरकार के पक्ष में था। ऐसे में इसे कानून में संशोधन करके या नया कानून बनाकर ही पलटा जाना संभव था। संसद उस वक्त चल नहीं रही थी, ऐसे में केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून को पलट दिया। अब छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों में इस अध्यादेश को पारित कराना जरूरी है।
दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था, वह केजरीवाल सरकार के पक्ष में था। ऐसे में इसे कानून में संशोधन करके या नया कानून बनाकर ही पलटा जाना संभव था। संसद उस वक्त चल नहीं रही थी, ऐसे में केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून को पलट दिया। अब छह महीने के अंदर संसद के दोनों सदनों में इस अध्यादेश को पारित कराना जरूरी है।
दिल्ली अध्यादेश
- फोटो :
AMAR UJALA
मामला कोर्ट में क्यों पहुंचा?
इसी अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली की आप सरकार ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। दिल्ली सरकार ने इस अध्यादेश के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ बताया है। आप का कहना है कि एक चुनी हुई सरकार की शक्तियां छीनने के लिए केंद्र सरकार यह अध्यादेश लेकर आई है। वहीं, 21 जुलाई को कोर्ट ने इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया। सीजेआई ने कहा कि ऐसे संशोधन करने पर संविधान पीठ विचार करेगी।
इसी अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली की आप सरकार ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। दिल्ली सरकार ने इस अध्यादेश के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ बताया है। आप का कहना है कि एक चुनी हुई सरकार की शक्तियां छीनने के लिए केंद्र सरकार यह अध्यादेश लेकर आई है। वहीं, 21 जुलाई को कोर्ट ने इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया। सीजेआई ने कहा कि ऐसे संशोधन करने पर संविधान पीठ विचार करेगी।
राज्यसभा
- फोटो :
संसद टीवी
इसको लेकर अभी क्या हो रहा है?
केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि दिल्ली अध्यादेश की जगह लेने वाले विधेयक को अगले हफ्ते लोकसभा में पेश किया जाएगा। कोर्ट में विरोध के साथ ही साथ आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर विभिन्न विपक्षी पार्टियों का समर्थन भी जुटा रही है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने अध्यादेश का विरोध करने का एलान किया है।
केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि दिल्ली अध्यादेश की जगह लेने वाले विधेयक को अगले हफ्ते लोकसभा में पेश किया जाएगा। कोर्ट में विरोध के साथ ही साथ आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर विभिन्न विपक्षी पार्टियों का समर्थन भी जुटा रही है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने अध्यादेश का विरोध करने का एलान किया है।
संसद सत्र
- फोटो :
Social Media
क्या बिल संसद में पास होगा?
लोकसभा में भाजपा के पास बहुमत है इसलिए यहां दिल्ली अध्यादेश आसानी से पास हो जाएगा। वहीं, राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद केंद्र सरकार को उच्च सदन में बिल पारित कराने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। राज्यसभा में सांसदों की मौजूदा संख्या को देखते हुए केंद्र इस विधेयक को पारित कराने की अच्छी स्थिति में है, लेकिन बहुत कुछ नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (बीजेडी) और जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों पर निर्भर करेगा। इस बीच, बुधवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली अध्यादेश पर केंद्र को समर्थन देने का एलान कर दिया। पार्टी के नेता वी विजयसाई रेड्डी ने बताया कि उनकी पार्टी दिल्ली अध्यादेश के मुद्दे पर सरकार का समर्थन करेगी। पार्टी के सांसदों को भी इस बारे में जानकारी दे दी गई है। नौ सांसदों वाली बीजू जनता दल भी एनडीए सरकार का समर्थन कर सकती है। हालांकि अभी तक नवीन पटनायक ने अपना रुख साफ नहीं किया है।
लोकसभा में भाजपा के पास बहुमत है इसलिए यहां दिल्ली अध्यादेश आसानी से पास हो जाएगा। वहीं, राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद केंद्र सरकार को उच्च सदन में बिल पारित कराने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। राज्यसभा में सांसदों की मौजूदा संख्या को देखते हुए केंद्र इस विधेयक को पारित कराने की अच्छी स्थिति में है, लेकिन बहुत कुछ नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (बीजेडी) और जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों पर निर्भर करेगा। इस बीच, बुधवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली अध्यादेश पर केंद्र को समर्थन देने का एलान कर दिया। पार्टी के नेता वी विजयसाई रेड्डी ने बताया कि उनकी पार्टी दिल्ली अध्यादेश के मुद्दे पर सरकार का समर्थन करेगी। पार्टी के सांसदों को भी इस बारे में जानकारी दे दी गई है। नौ सांसदों वाली बीजू जनता दल भी एनडीए सरकार का समर्थन कर सकती है। हालांकि अभी तक नवीन पटनायक ने अपना रुख साफ नहीं किया है।
Congress President Mallikarjun Kharge with AAP MP Sanjay Singh
- फोटो :
Agency
राज्यसभा में क्या है संख्या गणित?
राज्यसभा में संख्याबल की बात करें तो, 245 सदस्यीय सदन में सात सीटें खाली होने से मौजूदा संख्या बल 238 है। फिलहाल उच्च सदन में भाजपा के सांसदों की संख्या 93 है। संख्या बल के अनुसार, राज्यसभा में विधेयक को पारित करने के लिए बहुमत का आंकड़ा 120 होगा। फिलहाल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पास राज्यसभा में 105 सदस्य हैं। वहीं, विपक्षी खेमे के पास भी 105 सदस्य हैं। यहीं बीजद और वाईएसआर कांग्रेस की भूमिका सामने आती है क्योंकि दोनों के राज्यसभा में नौ-नौ सदस्य हैं। वाईएसआर कांग्रेस ने केंद्र के समर्थन की घोषणा की है तो ऐसे में केंद्र के समर्थन वाले 114 संसद हो गए। वहीं, सत्तारूढ़ खेमे को पांच मनोनीत और दो निर्दलीय सांसदों का समर्थन मिलने की उम्मीद है।
यदि बीजेडी पार्टी अध्यादेश पर वोटिंग के दौरान वॉकआउट करने का फैसला करती है तो भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को विधेयक पारित करने के लिए अपने पक्ष में 115 वोटों की जरूरत होगी। इस तरह से केंद्र सरकार राज्यसभा में भी दिल्ली अध्यादेश से जुड़ा बिल आसानी से पारित करा सकती है।
राज्यसभा में संख्याबल की बात करें तो, 245 सदस्यीय सदन में सात सीटें खाली होने से मौजूदा संख्या बल 238 है। फिलहाल उच्च सदन में भाजपा के सांसदों की संख्या 93 है। संख्या बल के अनुसार, राज्यसभा में विधेयक को पारित करने के लिए बहुमत का आंकड़ा 120 होगा। फिलहाल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पास राज्यसभा में 105 सदस्य हैं। वहीं, विपक्षी खेमे के पास भी 105 सदस्य हैं। यहीं बीजद और वाईएसआर कांग्रेस की भूमिका सामने आती है क्योंकि दोनों के राज्यसभा में नौ-नौ सदस्य हैं। वाईएसआर कांग्रेस ने केंद्र के समर्थन की घोषणा की है तो ऐसे में केंद्र के समर्थन वाले 114 संसद हो गए। वहीं, सत्तारूढ़ खेमे को पांच मनोनीत और दो निर्दलीय सांसदों का समर्थन मिलने की उम्मीद है।
यदि बीजेडी पार्टी अध्यादेश पर वोटिंग के दौरान वॉकआउट करने का फैसला करती है तो भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को विधेयक पारित करने के लिए अपने पक्ष में 115 वोटों की जरूरत होगी। इस तरह से केंद्र सरकार राज्यसभा में भी दिल्ली अध्यादेश से जुड़ा बिल आसानी से पारित करा सकती है।