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हरियाणा विधानसभा चुनाव : हुड्डा ने तस्वीर तो बनाई लेकिन रंग नहीं भर सके

Fri, 25 Oct 2019 05:33 AM IST
Mohit Mudgal अनूप वाजपेयी, अमर उजाला, नई दिल्ली 
अनूप वाजपेयी, अमर उजाला, नई दिल्ली  Published by: Mohit Mudgal Updated Fri, 25 Oct 2019 05:33 AM IST
सार

  • 17 विधायकों वाली पार्टी 31 तक ले आए हुड्डा
  • टिकट दिलाने में हुड्डा की चली
  • 31 विधायकों में अकेले हुड्डा खेमे के करीब 22 विधायक

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Hooda ran fast but cant reach the crossline 
भूपेंद्र हुड्डा - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथों में चुनाव की कमान सौंपी जरूर लेकिन फैसला लेने में इतनी देर कर दी कि प्रदर्शन सुधरने के बावजूद पार्टी सत्ता के लिए जरूरी आंकड़े तक नही पहुंची। हुड्डा 17 विधायकों वाली पार्टी 31 तक तो ले गए लेकिन जो तस्वीर उन्होंने उकेरी उसमें रंग नहीं भर सके। 

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टिकट दिलाने में हुड्डा की चली 90 में करीब 60 सीटें उनके कहने पर दी गई लेकिन हरियाणा में अध्यक्ष बदलने के बाद भी कांग्रेस में सालों से चली आ रही गुटबाजी अंतिम समय तक हावी रही। राज्य के क्षत्रप अपने-अपने हिसाब से चुनाव लड़ते नजर आए। कांग्रेस के 31 विधायकों में अकेले हुड्डा खेमे के करीब 22 विधायक हैं। हुड्डा को खुद को साबित करने के लिए 45 दिनों का समय मिला। 
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पार्टी ने हुड्डा को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया। पार्टी ऐसा इसलिए भी नहीं करना चाहती थी कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में जाट बनाम नॉन जाट कर सफलता पाई थी। जबकि हरियाणा के जो नतीजे आए हैं उसमें 90 में करीब 25 विधायक जाट हैं।
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राज्य में जाटों के बीच भाजपा को लेकर जबरदस्त नाराजगी थी लिहाजा जो जाट विधायक जीतकर आए हैं उनमें एक ही भाजपा से है। कांग्रेस के पास बेतहर मौका था कि अगर हुड्डा को सीएम का चेहरा होते तो शायद जेजेपी और अन्य जाट विधायक इतनी मजबूती से न उभर पाते।

राज्य में हुड्डा और अशोक तंवर की अदावत करीब तीन सालों से चरम पर थी। पार्टी नेतृत्व हुड्डा की अपेक्षा अशोक तंवर पर अंतिम समय तक भरोसा करती रही लेकिन तंवर ने न सिर्फ पार्टी नेतृत्व का भरोसा तोड़ा बल्कि राज्य में घूमकर हुड्डा और उनके समर्थकों के खिलाफ आवाज बुलंद किए रहे।


पार्टी नेतृत्व तंवर के लिए हुड्डा को लगातार नाराज किए रही लेकिन पार्टी पूरी तरह उन पर भरोसा कर चुनाव लडने को लेकर आश्वस्त नहीं दिखी। कांग्रेस नेतृत्व ने भी हरियाणा चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया। राहुल गांधी मजबूरी में दो रैलियों को संबोधित करने के लिए गए।

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