कांग्रेस में नेतृत्व का संकट, एक नजर आजादी के बाद से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्षों के इतिहास पर
वर्तमान में सत्ता के साथ-साथ नेतृत्व के संकट से भी जूझ रही कांग्रेस भारत की प्रमुख और पहली राजनीतिक पार्टी है जिसने देश की आजादी के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को हुई थी। तब इसमें 65 सदस्य थे। इसकी स्थापना में एक ब्रिटिश अधिकारी एओ ह्यूम, दादाभाई नैरोजी और दिनशा वाचा ने अहम भूमिका निभाई थी।
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विस्तार
साल 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद कांग्रेस भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई। आजादी के बाद से साल 2014 तक हुए 16 आम चुनावों में से छह में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत से जीत हासिस की और चार में गठबंधन कर सरकार चलाई और उसका नेतृत्व किया। कांग्रेस में फिलहाल जो विवाद चल रहा है वह पार्टी नेतृत्व का है। कांग्रेस पर शासन की बागडोर पर नियंत्रण के लिए वंशवाद के इल्जाम भाजपा समेत सभी विपक्षी दल लगाते आए हैं।
साल 2019 में हुए आम चुनाव में भाजपा के हाथों करारी हार मिलने के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं। अब एक बार फिर पार्टी नेतृत्व को लेकर कांग्रेस में आवाज उठी है। सोमवार को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक होनी है। इस बैठक से पहले पार्टी के कई नेताओं और पूर्व मंत्रियों समेत 23 लोगों ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में कई बदलाव करने की मांग की है।
पार्टी के कई नेता राहुल गांधी से दोबारा अध्यक्ष बनने की गुहार लगाते आए हैं। लेकिन, राहुल इससे साफ इनकार कर चुके हैं। इसके बाद पार्टी अध्यक्ष चुनने के लिए चुनाव कराने का भी सुझाव आया था। अध्यक्ष के लिए कांग्रेस क्या फैसला लेती है और किसे पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए तैयार करती है यह तो समय बताएगा। हम यहां आपको बताने जा रहे हैं कि कांग्रेस में अध्यक्ष पद का इतिहास क्या रहा है। आजादी के बाद से किस-किसने पार्टी का नेतृत्व संभाला है...
कांग्रेस अध्यक्ष पद पर गांधी-नेहरू परिवार
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम कांग्रेस के अग्रणी नेताओं में शुमार किया जाता है। आजादी के बाद साल 1951 से 1954 तक वह पार्टी के अध्यक्ष रहे। इससे पहले उन्हें साल 1929, 1930, 1936, 1937 और 1946 में पार्टी अध्यक्ष चुना गया था।
इसके बाद गांधी-नेहरू परिवार से इंदिरा गांधी भी पार्टी अध्यक्ष रहीं। उन्होंने साल 1959, 1978-83, 1983 और 1984 में पार्टी अध्यक्ष की भूमिका निभाई। उनके बाद राजीव गांधी साल 1985-1991 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
राजीव गांधी से बाद सोनिया गांधी 1998-2017 तक पार्टी अध्यक्ष रहीं। उनके बाद राहुल गांधी 2017-2019 तक इस पद पर काबिज रहे। 2019 में राहुल द्वारा इस्तीफा देने के बाद फिलहाल अब तक यह पद सोनिया गांधी के पास है।
गांधी-नेहरू परिवार से इतर कांग्रेस के अध्यक्ष
जेबी कृपलानी
1947 में जब भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली थी तब कांग्रेस के अध्यक्ष जेबी कृपलानी थे। प्रधानमंत्री पद के लिए जब कांग्रेस में मतदान हुआ था तो सरदार पटेल के बाद सबसे ज्यादा वोट भी उन्ही को मिले थे। हालांकि, गांधी जी के कहने पर पटेल और कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया था और पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया था। कृपलानी ने साल 1977 में जनता सरकार के गठन में भी अहम भूमिका निभाई थी।
पट्टाभि सीतारमैया
मध्यप्रदेश के पहले राज्यपाल और गांधीवाद के प्रख्यात आचार्य पट्टाभि सीतारमैया ने 1948 से 1949 तक कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाली थी। आंध्र प्रदेश में जन्मे डॉक्टर सीतारमैया ने साल 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए चिकित्सा कार्य छोड़ दिया था। साल 1939 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव में महात्मा गांधी ने कहा था कि सीतारमैया की हार उनकी हार होगी।
पुरुषोत्तम दास टंडन
पुरुषोत्तम दास टंडन ने 1950 में हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव में जेबी कृपलानी को हराया था। लेकिन, पंडित नेहरू से विवादों के चलते उन्होंने जल्द की इस्तीफा दे दिया था। उत्तर प्रदेश के प्रयाग में जन्मे टंडन का हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करवाने में महत्त्वपूर्ण योगदान था। टंडन हिंदी को देश की आजादी से पहले आजादी प्राप्त करने का साधन मानते रहे और आजादी मिलने के बाद आजादी को बनाए रखने का। उनका राजनीति में प्रवेश भी हिंदी प्रेम की वजह से ही हुआ था।
यूएन ढेबर
यूएन ढेबर को साल 1955 में कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। 1955 से 1959 तक पार्टी अध्यक्ष के चार कार्यकाल उन्होंने पूरे किए। इस दौरान उन्होंने अमृतसर, इंदौर, नागपुर और गुवाहाटी में हुए अधिवेशनों की अध्यक्षता की। 1948-1954 कर सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे ढेबर को साल 1962 में राजकोट से लोकसभा के लिए चुना गया था।
नीलम संजीव रेड्डी
भारत के छठे राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी साल 1960 से 1963 तक कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। आंध्र प्रदेश के किसान परिवार में जन्मे रेड्डी की छवि एक कवि और अनुभवी प्रशासक के रूप में थी। वह भारत के पहले गैर कांग्रेसी राष्ट्रपति थे। अक्तूबर 1956 में वह आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे। साल 1969 में चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था।
के कामराज
मद्रास राज्य (अब तमिलनाडु) के तीसरे मुख्यमंत्री के कामराज साल 1964 से 1967 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के चुनावों में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में बिल्कुल निचले स्तर से अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। 1960 के दशक में कांग्रेस में सुधार के लिए कामराज योजना प्रस्तुत करने के कारण विख्यात हुए थे।
एस निजलिंगप्पा
कर्नाटक में जन्मे एस निजलिंगप्पा साल 1968 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। वह साल 1956 और 1958 के बीच कर्नाटक (तत्कालीन मैसूर राज्य) के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद 1962 से 1968 के बीच वह एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कर्नाटक एकीकरण आंदोलन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी।
जगजीवन राम
बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध जगजीवन राम साल 1970 और 1971 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने खेतिहर मजदूर सभा और भारतीय दलित वर्ग संघ का गठन किया था। साल 1946 में गठित देश की पहली लोकसभा में उन्होंने श्रम मंत्री का कार्यभार संभाला था। श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने कुछ अहन कानूनों को लागू करने का अहम फैसला लिया था। इसके अलावा उन्होंने संचार मंत्री और रेल मंत्री का पद भी संभाला था।
शंकर दयाल शर्मा
देश के नौवें राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा साल 1972-74 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। साल 1940 के दशक में वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली थी। साल 1952 में वह भोपाल के मुख्यमंत्री बने थे। इस पद पर 1956 तक रहे, जब भोपाल का विलय अन्य राज्यों में कर मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ।
देवकांत बरुआ
देवकांत बरुआ असम के प्रमुख नेता थे। वह आपातकाल (1975-77) के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के पद पर थे। बरुआ को अपने 'इंदिरा भारत हैं, भारत इंदिरा है' कथन के लिए जाना जाता है। वह फरवरी 1971 से 1973 तक बिहार के राज्यपाल भी रहे।
कासु ब्रह्मानंद रेड्डी
कासु ब्रह्मानंद रेड्डी को तीन जून 1977 को कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया था। इससे पहले वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे थे। एक सफल अधिवक्ता रहे रेड्डी का जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर में हुआ था।
पीवी नरसिम्हा राव
देश के 10वें प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल साल 1991-1996 तक रहा। 'लाइसेंस राज' की समाप्ति और भारतीय अर्थनीति में खुलापन उनके प्रधानमंत्री रहते हुए ही शुरू हुआ था। वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे थे।
सीताराम केसरी
सीताराम केसरी ने साल 1996-1998 तक कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। वह 13 साल की आयु में ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गए थे। उन्हें साल 1973 में बिहार कांग्रेस समिति का अध्यक्ष और 1980 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा कोषाध्यक्ष चुना गया। वह इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री रहे थे।