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जस्टिस काटजू ने हिंदी को बताया बंटवारे की भाषा, कुमार विश्वास ने दिया करारा जवाब

Sat, 14 Sep 2019 09:56 PM IST
Gaurav Pandey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Gaurav Pandey Updated Sat, 14 Sep 2019 09:56 PM IST
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Hindi Diwas : Justice Katju said Hindi is not a common language, Kumar Vishwas replied back
जस्टिस मार्कंडेय काटजू और कुमार विश्वास - फोटो : फाइल फोटो

हिंदी दिवस के मौके पर शनिवार को जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने हिंदी को बंटवारे की भाषा बताते हुए उन्होंने लिखा कि हिंदी आम आदमी की भाषा नहीं है, अंग्रेजों ने इसे लोगों को बांटने के लिए बनाया था। अपने इस लेख को काटजू ने न केवल ट्विटर पर शेयर किया बल्कि कुमार विश्वास और पाकिस्तान के मंत्री फवाद चौधरी समेत कई लोगों को टैग भी किया। 

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शुद्ध हिंदी में ट्वीट कर कुमार विश्वास ने दिया जवाब

जस्टिस काटजू के इस बयान पर उन्हें आड़े हाथों लेते हुए कवि कुमार विश्वास ने शुद्ध हिंदी में ट्वीट किया, 'हे चिर मुख अतिसार व्याधि पीड़ित ! अपनी अज्ञानोत्पादित अंखड अहमन्यताओं के इस अविरल मलप्रवाह में मेरे ट्विटर को अकारण टैग करने की इस नव्य निकृष्टता हेतु मैं श्राद्ध के प्रथम दिन आपके इस जन्म में असफल पदार्पण का विधानपूर्वक तर्पण करता हूं, स्वीकार करें।' 

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हिंदी काल्पनिक तौर पर बनाई गई भाषा : जस्टिस काटजू

काटजू ने अपने लेख में लिखा है, 'सच यह है कि हिंदी एक काल्पनिक तौर पर बनाई गई भाषा है। यह आम आदमी की भाषा नहीं है। भारत के तथाकथित हिंदी भाषी बेल्ट में भी आम आदमी हिंदी का इस्तेमाल नहीं करते हैं। हिंदी बेल्ट में आम आदमी हिंदी नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी या खड़ी बोली (बृजभाषा, भोजपुरी, अवधी, मैथिली आदि भाषाएं) बोलते हैं। हिंदुस्तानी और हिंदी भाषा में अंतर है। जैसे हिंदुस्तानी में कहते हैं 'उधर देखिए', जबकि हिंदी में कहा जाएगा 'उधर अवलोकन कीजिए।' आज सामान्य व्यक्ति हिंदुस्तानी का इस्तेमाल करता है।'

काटजू ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को बताया अंग्रेजों का एजेंट

काटजू ने अपना पक्ष रखते हुए लिखा है कि साल 1947 कर भारत में शिक्षित लोगों की भाषा उर्दू थी। उन्होंने लिखा है, '1947 तक भारत के बड़े क्षेत्रों में हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदाय के शिक्षित लोगों की भाषा उर्दू ही थी। हिंदुस्तानी अशिक्षित आम आदमी की भाषा थी। ब्रिटिश सरकार ने हिंदी को काल्पनिक तौर पर बनाया और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे उनके एजेंटों ने इसे भारत भर में फैलाया। भारतेंदु जैसे लोग अंग्रेजों की फूट डालो शासन करो नीति का हिस्सा थे।'

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