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कैसे हिंदी बनी थी राजभाषा, क्या है इस दिन का महत्व

Mon, 14 Sep 2020 09:26 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Mon, 14 Sep 2020 09:26 AM IST
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Hindi diwas 2020 14 September 1949 Hindi was conferred with the status of official language know about interesting facts
हिंदी दिवस - फोटो : iStock

हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर, 1949 को मिला और संविधान के भाग-17 में इससे संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए। इसी ऐतिहासिक महत्व के कारण 1953 से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' का आयोजन किया जाता है। हिंदी के प्रोत्साहन की दृष्टि से इस दिवस के आयोजन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी अहम बातें...

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हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय की आर्य भाषा है। 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। हिंदी की प्रमुख बोलियों में अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, हरियाणवी, कुमांऊनी, मागधी और मारवाड़ी भाषा शामिल हैं।

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कैसे हिंदी बनी राजभाषा
साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से भारत आजाद हुआ तो उसके सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था। क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। ऐसे में कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये काफी अहम मुद्दा था। काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया। संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिंदी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी।
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विदित हो कि 26 जनवरी, 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवीं सूची में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया था। संविधान के मुताबिक 26 जनवरी, 1965 में हिंदी को अंग्रजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था।

ऐसा आसानी से हो सके इसके लिए संविधान में 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों को बनाने की भी बात कही गई थी। इन आयोगों को हिंदी के विकास के संदर्भ में रिपोर्ट देनी थी और इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति के द्वारा राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें करनी थीं।

लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में रहने वालों को डर था कि हिंदी के लागू हो जाने से वे उत्तर भारतीयों के मुकाबले विभिन्न क्षेत्रों में कमजोर स्थिति में हो जाएंगे। हिंदी को लागू करने और न करने के आंदोलनों के बीच वर्ष 1963 में ‘राजभाषा कानून’ पारित किया गया, जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर इस्तेमाल न करने की पाबंदी को खत्म कर दिया। हालांकि, हिंदी का विरोध करने वाले इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और उन्हें लगता था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद इस कानून में मौजूद कुछ अस्पष्टता फिर से उनके विरुद्ध जा सकती है।


26 जनवरी, 1965 को हिंदी देश की राजभाषा बन गई और इसके साथ ही दक्षिण भारत के राज्यों- खास तौर पर तमिलनाडु (तब का मद्रास) में, आंदोलनों और हिंसा का एक जबरदस्त दौर चला और इसमें कई छात्रों ने आत्मदाह तक कर लिया। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गांधी के प्रयासों से इस समस्या का समाधान ढूंढ़ा गया जिसकी परिणति 1967 में राजभाषा कानून में संशोधन के रूप में हुई। उल्लेखनीय है कि इस संशोधन के जरिए अंग्रेजी को देश की राजभाषा के रूप में तब तक आवश्यक मान लिया गया जब तक कि गैर-हिंदी भाषी राज्य ऐसा चाहते हों; आज तक यही व्यवस्था चली आ रही है।


हिंदी के प्रोत्साहन के लिए दिए जाते हैं पुरस्कार
हिंदी दिवस के मौके पर हिंदी के प्रोत्साहन हेतु कई पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं, जैसे- राजभाषा कीर्ति पुरस्कार और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार। कीर्ति पुरस्कार जहां ऐसे विभाग को दिया जाता है जिसने वर्ष भर हिंदी में कार्य को बढ़ावा दिया हो, वहीं राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार तकनीकी-विज्ञान लेखन हेतु दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिवस के अवसर पर देश भर के विद्यालयों, महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में पुरस्कार वितरण, हिंदी कविता प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगिता, निबंध लेखन आदि का आयोजन किया जाता है। इस प्रकार के कार्यक्रमों से निश्चित ही हिंदी के प्रयोग को नागरिक व प्रशासनिक स्तर पर बढ़ावा मिलता है।

भारत के बहुभाषी होने की वजह से हिंदी को नहीं मिल रहा है बढ़ावा
भारत बहुभाषी देश है जहां अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएंं और बोलियां हैं। उनमें से किसी का भी महत्व हिंदी से कम नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई एक ऐसी भाषा नहीं है, जिसे सभी राज्यों या इलाकों को जोड़ने वाली भाषा का दर्जा प्राप्त हो। हालांकि, अतीत में भाषा को लेकर जिस तरह के विवाद हो चुके हैं, उनके मद्देनजर हिंदी को बढ़ावा देते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि इसकी वजह से दूसरी भाषाओं पर कोई नकारात्मक असर न पड़े।


सरकारी स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत
उत्तर भारत के लगभग सभी हिस्सों में साधारण लोगों की बोलचाल, पढ़ाई-लिखाई से लेकर संस्थागत स्तर तक हिंदी को जगह मिली हुई है। लेकिन, इसके अलावा भी देश के ज्यादातर इलाकों में हिंदी ने जो जगह बनाई है, उसमें इसके विकास और प्रसार की बड़ी संभावनाएं हैं। पर यह तभी संभव हो पाएगा जब सरकार के स्तर पर इसके प्रयोग को बढ़ावा दिया जाएगा और कुछ मामलों में इसे अनिवार्य भी बनाया जाएगा।

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