अनुच्छेद-370 हटाने को चुनौती देने वाली वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संविधान के अनुच्छेद-370 को हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई बृहस्पतिवार तक के लिए स्थगित कर दी। आईएएस अधिकारी के पद से इस्तीफा देकर राजनीतिज्ञ बने शाह फैसल के वकील राजू रामचंद्रन ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ से कहा कि इस मामले में केवल न्यायिक फैसले से ही बदलाव संभव है। हम परिवर्तन के लिए कोर्ट की ओर देख रहे हैं।
शाह फैसल समेत कई राजनीतिज्ञ राज्य में अभी भी हिरासत में हैं। जस्टिस एनवी रमना की पीठ से उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-370 को बिना राज्य के विधानमंडल की सिफारिश के हटाना संघीय विधान के सिद्धांतों का उल्लंघन है। साथ ही यह जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम संविधान के अनुच्छेद-3 का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद-356 के तहत शक्तियों का हस्तांतरण राष्ट्रपति को नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के पुनर्गठन को कौन सक्षम प्राधिकारी हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सवाल उठाया कि संविधान के अनुच्छेद-370 के तहत तत्कालीन राज्य के विशेष दर्जे में बदलाव करने के लिए जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के पुनर्गठन के लिए सक्षम प्राधिकारी कौन हो सकता है। जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
पीठ ने यह बिंदु भी उठाया कि यदि फैसला लोगों के हिसाब से लिया जाता है तब क्या यह जनमत संग्रह, सहमति या परामर्श का मामला होगा। मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को भी होगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से उनके वकीलों ने सांविधानिक प्रावधानों का जिक्र किया और कहा कि केवल संविधान सभा ही जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे में किसी भी बदलाव के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश करने के लिए अधिकृत है। यह संविधान सभा राज्य के लोगों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है। राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद-370 को केंद्र की मोदी सरकार ने पांच अगस्त को हटा दिया था।
आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनेता बने शाह फैसल, शेहला रशीद और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन से जस्टिस रमना ने पूछा कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा के पुनगर्ठन के लिए सक्षम प्राधिकारी कौन हो सकता है। इस पर रामचंद्रन ने कहा कि अनुच्छेद-370 राज्य के लोगों को चुनने का अधिकार देता है और अंतिम निर्णय उनके हिसाब से होना चाहिए।
इस पर पीठ ने पूछा कि यदि यह मामला बनता है तब क्या यह जनमत संग्रह, सहमति या परामर्श का मामला होगा? पीठ में जस्टिस रमना के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत शामिल हैं।
संविधान सभा की सिफारिश पर राष्ट्रपति हटा सकते हैं अनुच्छेद-370
रामचंद्रन ने कहा कि केवल संविधान सभा की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को समाप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-370 संविधान सभा को यह फैसला लेने की शक्ति देता है कि वह विशेष दर्जा बनाए रखना चाहता है या समाप्त करना। अनुच्छेद में कहा गया है कि संविधान सभा की सिफारिश जरूरी है।
उन्होंने कहा कि संविधान सभा के नहीं होने पर राज्य की विधानसभा उसकी जगह लेगा। किसी भी परिस्थिति में राष्ट्रपति संविधान सभा की शक्तियों को हड़प नहीं सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सांविधानिक प्रावधान को खत्म नहीं कर सकती है।