Supreme Court: संस्थापकों के सियासी गठबंधन पर तय नहीं होगा एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि इसे एक विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह अपने अल्पसंख्यक दर्जे को छोड़ देगा। सीजेआई ने कहा कि हमें यह देखना होगा कि क्या 1920 के अधिनियम से एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा खत्म हो गया था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्ज रहेगा या नहीं, इस पेचीदा मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में मंगलवार को चौथे दिन भी सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ब्रिटिश काल के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के संस्थापकों के राजनीतिक गठबंधन का आज संस्थान की अल्पसंख्यक स्थिति निर्धारित करने में कोई असर नहीं पड़ेगा। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के चौथे दिन सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की सात सदस्यीय पीठ ने कहा कि संस्थापकों को महात्मा गांधी या खिलाफत के साथ जोड़ा जा सकता है, लेकिन इसका संस्थान की अल्पसंख्यक स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
संविधान पीठ ने ये टिप्पणी तब की जब केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हर इतिहासकार ने एएमयू के संस्थापकों को अंग्रेजों के प्रति वफादार बताया है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, मान लीजिए कि संस्थापकों के दो गुट थे। एक वफादार, जो गांधी का समर्थन करते थे और दूसरे खिलाफत के लोग जिन्होंने जामिया का गठन किया। उनकी वफादारी का मतलब यह नहीं है कि संस्थान का अल्पसंख्यक चरित्र बदल जाता है।
मेहता ने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय ने डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा न चुनकर अपना अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ दिया है। बजाय इसके उसने संसद के एक अधिनियम के तहत एक संस्थान माना। एक अल्पसंख्यक संस्थान सभी के लिए खुला हो सकता है, अगर इसकी अन्य विशेषताएं संतुष्ट हैं तो इससे इसका अल्पसंख्यक चरित्र खत्म नहीं होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब कोई संस्थान सरकार के नियमों और शर्तों से सहमत होता है और भंग होने का विकल्प चुनता है, तो उसकी पिछली स्थिति समाप्त हो जाती है।
अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने इस बात पर जोर दिया कि अल्पसंख्यक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के अधिकार पर संविधान का अनुच्छेद 30 एक सक्षम प्रावधान है। सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
अजीज बाशा फैसले के तहत एएमयू ने अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा छोड़ा था
मेहता ने इस बात पर जोर दिया कि अजीज बाशा के फैसले में यह निष्कर्ष दर्ज किया गया था कि एएमयू ने अल्पसंख्यक संस्थान होने का अपना दावा छोड़ दिया है। 1967 में अजीज बाशा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति के खिलाफ फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया था कि विश्वविद्यालय न तो मुस्लिम अल्पसंख्यक की ओर से स्थापित किया गया था और न ही प्रशासित किया गया था और यह माना गया था कि संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत वह शैक्षणिक संस्थानों को प्रशासित करने के लिए अल्पसंख्यकों के लिए संरक्षण का आनंद नहीं ले सकता है।
अल्पसंख्यक संस्थान डिग्री देते वक्त बिना कानून के मान्यता की मांग नहीं कर सकता
याचिकाकर्ता के वकील एमआर शमशाद की दलीलों पर सीजेआई ने कहा, एक अल्पसंख्यक संस्थान यह कह सकता है कि उसके पास एक स्कूल स्थापित करने का विकल्प है, लेकिन वह यह नहीं कह सकता कि जब डिग्री प्रदान करने की बात आए तो बिना कानून के उसे मान्यता देनी होगी। पीठ ने कहा, यदि आप मदद चाहते हैं तो आपको अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ना नहीं होगा और यह काफी अच्छी तरह से स्थापित है।
फरवरी, 2019 को एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे मुद्दे को भेजा गया था संविधान पीठ के पास
सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी, 2019 को एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे के बेहद विवादास्पद मुद्दे को सात न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया था। इसी तरह का संदर्भ 1981 में भी दिया गया था। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का मुद्दा पिछले कई दशकों से कानूनी चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।
एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में आया था ये निर्णय
पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1967 में एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि चूंकि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता है। हालांकि, 1875 में स्थापित इस प्रतिष्ठित संस्थान को अल्पसंख्यक का दर्जा वापस मिल गया, जब संसद ने 1981 में एएमयू (संशोधन) अधिनियम पारित किया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रद्द किया था ये प्रावधान
जनवरी 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1981 के कानून के उस प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसके द्वारा विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया था। केंद्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। विश्वविद्यालय ने इसके खिलाफ एक अलग याचिका भी दायर की है।
भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने 2016 में उच्चतम न्यायालय से कहा था कि वह पूर्ववर्ती संप्रग सरकार द्वारा दायर अपील वापस ले लेगी। उसने एस अजीज बाशा मामले में शीर्ष अदालत के 1967 के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि यह सरकार द्वारा वित्त पोषित केंद्रीय विश्वविद्यालय है।