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स्वास्थ्य: अग्न्याशय, लिवर और मांसपेशियां तय करती हैं शुगर की हालत; 25 लाख लोगों के जेनेटिक डाटा से खुलासा
Sun, 08 Feb 2026 04:27 AM IST
हिमांशु चंदेल
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Sun, 08 Feb 2026 04:27 AM IST
सार
2.5 मिलियन लोगों के जेनेटिक डाटा पर आधारित एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ब्लड शुगर का स्तर सिर्फ अग्न्याशय ही नहीं, बल्कि लिवर और मांसपेशियां भी मिलकर तय करती हैं। अलग-अलग जीन इन अंगों के कामकाज को प्रभावित करते हैं, जिससे ग्लूकोज नियंत्रण और डायबिटीज का खतरा बदलता है।
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लिवर
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
टाइप-टू डायबिटीज को अब तक ज्यादातर खून में शुगर के स्तर से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। दुनिया भर के 25 लाख लोगों के आनुवंशिक आंकड़ों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों ने पाया है कि इस बीमारी के अधिकांश जैविक कारण खून में नहीं, बल्कि शरीर के दूसरे अहम अंगों जैसे अग्न्याशय, लिवर, मांसपेशियां और चर्बी वाले ऊतकों में छिपे होते हैं।
शोध के मुताबिक डायबिटीज से जुड़े करीब 85 प्रतिशत महत्वपूर्ण जीन रक्त जांच में दिखाई ही नहीं देते। टाइप-टू डायबिटीज आज दुनिया की सबसे आम बीमारियों में शामिल है और करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं। आमतौर पर इसकी पहचान खून में ग्लूकोज की मात्रा से की जाती है, जो जरूरी तो है, लेकिन बीमारी की पूरी तस्वीर सामने नहीं लाती। नया वैश्विक अध्ययन बताता है कि टाइप-टू डायबिटीज सिर्फ खून की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर से जुड़ा जटिल विकार है।
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इस बीमारी में अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता, मांसपेशियां इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं, लिवर जरूरत से ज्यादा ग्लूकोज बनाने लगता है और फैट टिश्यू में भी असंतुलन पैदा हो जाता है। अगर जांच केवल खून तक सीमित रहे, तो इन अंगों में चल रही गड़बड़ियां सामने ही नहीं आ पातीं। यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट और जर्मनी की हेल्महोल्ट्ज म्यूनिख के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया। इसके नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर मेटाबोलिज्म में प्रकाशित हुए हैं।
25 लाख लोगों के डाटा का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और पूर्वी एशिया सहित अलग-अलग क्षेत्रों से आए 25 लाख लोगों के जेनेटिक डाटा का विश्लेषण किया। वैज्ञानिकों ने डायबिटीज से जुड़े शरीर के सात अलग-अलग ऊतकों का अध्ययन किया, जिनमें अग्न्याशय, लीवर, मांसपेशियां और चर्बी वाला ऊतक शामिल था। इस प्रक्रिया में टाइप-टू डायबिटीज से जुड़े कुल 676 जीन पहचाने गए। सबसे अहम बात यह रही कि इनमें से केवल करीब 18 प्रतिशत जीन ऐसे थे जो खून में भी नजर आए। यानी लगभग 85 प्रतिशत जरूरी जेनेटिक संकेत रक्त परीक्षण में बिल्कुल दिखाई नहीं देते।
अलग-अलग नस्लों को शामिल करने से खुले राज
इस अध्ययन की एक बड़ी खासियत यह रही कि इसमें अलग-अलग देशों और नस्लों के लोगों को शामिल किया गया। पहले ज्यादातर आनुवंशिक शोध यूरोपीय आबादी तक सीमित रहते थे, लेकिन इस बार अफ्रीकी, एशियाई और अमेरिकी मूल के लोगों का डेटा भी जोड़ा गया। नतीजों से पता चला कि कुछ जीन सभी समुदायों में डायबिटीज से जुड़े पाए गए, जबकि कई ऐसे जोखिम जीन केवल तब सामने आए जब गैर-यूरोपीय आबादी को विश्लेषण में शामिल किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अगर दुनिया की विविध आबादी को शोध में जगह नहीं दी जाएगी, तो बीमारी की वास्तविक समझ अधूरी ही रहेगी।
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शोध के मुताबिक डायबिटीज से जुड़े करीब 85 प्रतिशत महत्वपूर्ण जीन रक्त जांच में दिखाई ही नहीं देते। टाइप-टू डायबिटीज आज दुनिया की सबसे आम बीमारियों में शामिल है और करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं। आमतौर पर इसकी पहचान खून में ग्लूकोज की मात्रा से की जाती है, जो जरूरी तो है, लेकिन बीमारी की पूरी तस्वीर सामने नहीं लाती। नया वैश्विक अध्ययन बताता है कि टाइप-टू डायबिटीज सिर्फ खून की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शरीर से जुड़ा जटिल विकार है।
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25 लाख लोगों के डाटा का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और पूर्वी एशिया सहित अलग-अलग क्षेत्रों से आए 25 लाख लोगों के जेनेटिक डाटा का विश्लेषण किया। वैज्ञानिकों ने डायबिटीज से जुड़े शरीर के सात अलग-अलग ऊतकों का अध्ययन किया, जिनमें अग्न्याशय, लीवर, मांसपेशियां और चर्बी वाला ऊतक शामिल था। इस प्रक्रिया में टाइप-टू डायबिटीज से जुड़े कुल 676 जीन पहचाने गए। सबसे अहम बात यह रही कि इनमें से केवल करीब 18 प्रतिशत जीन ऐसे थे जो खून में भी नजर आए। यानी लगभग 85 प्रतिशत जरूरी जेनेटिक संकेत रक्त परीक्षण में बिल्कुल दिखाई नहीं देते।
अलग-अलग नस्लों को शामिल करने से खुले राज
इस अध्ययन की एक बड़ी खासियत यह रही कि इसमें अलग-अलग देशों और नस्लों के लोगों को शामिल किया गया। पहले ज्यादातर आनुवंशिक शोध यूरोपीय आबादी तक सीमित रहते थे, लेकिन इस बार अफ्रीकी, एशियाई और अमेरिकी मूल के लोगों का डेटा भी जोड़ा गया। नतीजों से पता चला कि कुछ जीन सभी समुदायों में डायबिटीज से जुड़े पाए गए, जबकि कई ऐसे जोखिम जीन केवल तब सामने आए जब गैर-यूरोपीय आबादी को विश्लेषण में शामिल किया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि अगर दुनिया की विविध आबादी को शोध में जगह नहीं दी जाएगी, तो बीमारी की वास्तविक समझ अधूरी ही रहेगी।
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