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Ganpati Idol: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा- प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा बनाने पर रोक नहीं, बिना मंजूरी विसर्जन नहीं

Mon, 09 Jun 2025 11:16 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 09 Jun 2025 11:16 PM IST
सार

गणेशोत्सव से पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने पीओपी से गणपति मूर्तियों के निर्माण की अनुमति दी, लेकिन प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन पर कोर्ट की मंजूरी अनिवार्य की। इसके साथ ही महाराष्ट्र सरकार को मूर्ति विसर्जन के लिए नीति बनाने का आदेश भी दिया गया है।

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Bombay HC allows making of Plaster of Paris Ganpati idols, but says no immersion without its nod
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

गणेशोत्सव से पहले महाराष्ट्र के हजारों कारीगरों को बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बड़ी राहत दी है। इसके तहत कोर्ट ने सोमवार को प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी गणपति मूर्तियों के निर्माण की अनुमति दे दी है। हालांकि कोर्ट ने भी यह साफ किया है कि ऐसी मूर्तियों का विसर्जन प्राकृतिक जलस्रोतों (जैसे नदी, तालाब, समुद्र) में बिना कोर्ट की अनुमति के नहीं किया जा सकता। 
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बता दें कि इस फैसले के साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में दिए गए उस आदेश में बदलाव किया है जिसमें पीओपी मूर्तियों के निर्माण और बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। पर्यावरणविद पीओपी को नुकसानदायक मानते हैं, इसलिए उस पर पाबंदी की मांग की जा रही थी।
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कोर्ट ने राज्य सरकार को दी नीति बनाने का आदेश

साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि वह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की विशेषज्ञ समिति की हालिया सिफारिशों के आधार पर मूर्तियों के विसर्जन को लेकर अपनी नीति बनाए। समिति ने यह भी साफ किया है कि उसकी सिफारिशें केवल सलाह के रूप में हैं, न कि कानून की तरह बाध्यकारी।


मामले में दायर हुए कई याचिकाएं
गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश आलोक अराध्ये और न्यायमूर्ति संदीप मर्ने की खंडपीठ ने यह फैसला उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया, जिनमें  सीपीसीबी की नई गाइडलाइंस को लागू करने की मांग की गई थी। जहां एक जनहित याचिका में दावा किया गया कि पीओपी मूर्तियों का निर्माण और जलस्रोतों में उनका विसर्जन गाइडलाइंस की खुली अवहेलना है। 

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वहीं दूसरी ओर मूर्ति निर्माता और गणेश मंडलों ने तर्क दिया कि इन दिशानिर्देशों में पीओपी के फायदे नहीं देखे गए हैं और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। हालांकि सीपीसीबी की ओर से बताया गया कि समिति ने 21 मई 2025 को अपनी सिफारिशें दी थीं और यह स्पष्ट किया कि ये केवल सलाह के तौर पर हैं। राज्य सरकार अपनी शर्तों के अनुसार खुद निर्णय ले सकती है।

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