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'प्रेग्नेंट होने से कोई औरत अनफिट नहीं हो जाती'

Fri, 16 Feb 2018 08:35 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Fri, 16 Feb 2018 08:35 PM IST
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Having a pregnant does not make a woman unfit

क्या किसी महिला का प्रमोशन इसलिए रोका जा सकता है क्योंकि वो गर्भवती है? क्या किसी प्रेग्नेंट औरत को 'अनफिट' बताकर उससे आगे बढ़ने के मौके छीने जा सकते हैं? केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ में तैनात शर्मीला यादव के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था। 

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- क्या था मामला?
साल 2009 में शर्मीला की सीआरपीएफ में कॉन्स्टेबल के पद पर भर्ती हुई थी। इसके बाद वो असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर पोस्ट के लिए होने वाली परीक्षा में शामिल हुई और इसमें कामयाब भी रहीं। प्रमोशन लिस्ट साल 2011 में आई लेकिन उसमें शर्मीला का नाम नहीं था।
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उन्हें 'लोवर मेडिकल कैटिगरी' में डाल दिया गया था क्योंकि उस दौरान वो प्रेग्नेंट थीं। जब शर्मीला ने इसका विरोध किया तो अगले साल यानी 2012 में उन्हें प्रमोशन दे तो दिया गया लेकिन पिछली तारीख से नहीं बल्कि एक साल बाद की तारीख से।
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इस तरह जो प्रमोशन उन्हें साल 2011 में मिल जाना चाहिए था, वो एक साल बाद मिला।  नतीजतन, उनके साथ काम करने वाले और जूनियर भी उनसे सीनियर हो गए जबकि शर्मीला पीछे रह गईं। इसके बाद शर्मीला लगातार पांच साल तक अपने विभाग में इंसाफ पाने की कोशिश करती रहीं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

...जब दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचा शर्मीला का मामला

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delhi court

शर्मीला के वकील अंकुर छिब्बर ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "उन्होंने तीन बार अलग-अलग तरीके से अपना मामला अधिकारियों के सामने रखा लेकिन हर बार उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। " आखिरकार मामला दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचा जहां शर्मीला के पक्ष में फैसला आया।

अंकुर छिब्बर के मुताबिक, "कोई व्यक्ति मेडिकली अनफिट तभी कहा जा सकता है जब वो किसी तरह की शारीरिक अक्षमता का शिकार हो या गंभीर रूप से घायल हो। गर्भवती होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, प्रेग्नेंट होने से कोई औरत अनफिट नहीं हो जाती।" उन्होंने कहा कि जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस नवीन चावला ने अपने फैसले में कुछ बेहद अहम बातों की ओर ध्यान दिलाया जो भविष्य में ऐसे मामलों में पत्थर की लकीर बनेंगी।"

'गर्भवती महिला अनफिट नहीं'
बीबीसी के पास अदालत के इस फैसले की प्रति है। फैसले में जजों की कही कुछ अहम बातें इस तरह हैं-

• प्रेग्नेंसी की वजह से होने वाला भेदभाव निंदनीय है। ये बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। इससे समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन होता है।
• अगर किसी औरत के गर्भवती होने की वजह से उसके साथ किसी भी तरह का भेदभाव होता है तो यह लिंग आधारित भेदभाव है जो पूरी तरह गैरकानूनी है। किसी भी महिला के साथ ऐसा करना नाइंसाफी होगी क्योंकि मां बनना उसका प्राकृतिक अधिकार है।"
• अगर प्रेग्नेंसी के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव होता है तो इसका मतलब ये होगा कि हम प्रेग्नेंसी को 'विकलांगता' मान रहे हैं और गर्भवती महिला को विकलांग जो बिल्कुल गलत होगा। 

फैसले में ये भी कहा गया कि शर्मीला यादव मामले में सीआरपीएफ का रवैया गलत धारणाओं पर आधारित, अन्यायपूर्ण और अस्वीकर्य है। जजों ने कहा कि इस तरह की घटनाओं में भेदभाव छिपा होता है और ये संविधान के नियमों का उल्लंघन है। 

दिक्कत मां बनने के बाद की

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क्या कहता है सीआरपीएफ?
सीआरपीएफ के डीआईजी एम. दिनकरन ने बीबीसी से कहा, "हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं और इसका पालन भी करेंगे।" डीआईजी एम. दिनकरन ने कहा कि उन्हें यकीन है कि दिल्ली हाई कोर्ट का ये फैसला सुरक्षाबलों में तैनात तमाम महिलाओं के लिए मिसाल के तौर पर देखा जाएगा।

दिक्कत मां बनने के बाद की
वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट (2013) के मुताबिक भारत में 15 साल से ज्यादा उम्र की सिर्फ 27% औरतें काम करती हैं। ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की बात करें तो भारत में नौकरी करने वाली महिलाओं की संख्या सबसे कम है। वहीं चीन में ये संख्या सबसे ज्यादा (64%) है। दिल्ली और एनसीआर में किए गए एक सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि मां बनने के बाद सिर्फ 18-34% महिलाएं काम पर लौटती हैं। 
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