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चुनाव से पहले हरियाणा कांग्रेस में भीतरघात की आशंका, पूर्व सीएम और पूर्व अध्यक्ष में ठनी रार

Thu, 03 Oct 2019 08:10 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 03 Oct 2019 08:10 PM IST
सार

  • हरियाणा में कांग्रेस का हाल, घर में नहीं है दाने, अम्मा चली भुनाने जैसा
  • राहुल गांधी बनाम सोनिया गांधी की पीढ़ी के नेता हुए आमने-सामने

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haryana assembly Polls 2019: disputes in Haryana Congress, rivalry between Huda and Ashok Tanwar
हुड्डा - फोटो : amarujala

विस्तार

21 अक्टूबर को हरियाणा में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है और ठीक 18 दिन पहले कांग्रेस पार्टी के दो दिग्गज नेताओं की राजनीतिक लड़ाई सतह पर आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की जहां टिकट बंटवारे में चली है, वहीं अशोक तंवर बागी मूड में दिखाई दे रहे हैं। हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने संगठन के हरियाणा प्रभारी और पार्टी के महासचिव गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस के टिकटों का निर्धारण करने वाली समिति के फैसले पर बड़ा सवाल उठा दिया है। हरियाणा में कांग्रेस का हाल घर में नहीं है दाने, अम्मा चली भुनाने जैसा ही है।
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पार्टी को एकजुट नहीं रख सके तंवर

23 मई 2019 को लोकसभा चुनाव का नतीजा आया तो राज्य से कांग्रेस पार्टी का खाता ही नहीं खुला था। बड़े अरमान के साथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अशोक तंवर के हाथ में कमान सौंपी थी। लेकिन अशोक तंवर राज्य में कांग्रेस को एकजुट नहीं रख सके। नतीजा लोकसभा चुनाव में पार्टी का हरियाणा में खाता ही नहीं खुल पाया। भूपेन्द्र हुड्डा गुट लगातार अशोक तंवर के लिए और तंवर हमेशा हुड्डा गुट के लिए चुनौती बने रहे। विधानसभा चुनाव की तारीख नजदीक आते देखकर भूपेन्द्र हुड्डा ने बागी तेवर दिखाना शुरू कर दिया। इस बीच यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कमान संभाल ली थी।

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सोनिया ने तंवर को अध्यक्ष पद से हटाते हुए कुमारी शैलजा को हरियाणा की कमान सौंप दी और हुड्डा का मान बढ़ा दिया। पार्टी के भीतर नया समीकरण बनने के बाद से ही तंवर गुट खार खाए बैठा है।

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तंवर ने दिया प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा

अब पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर का कहना है कि कुछ लोगों ने उनके जैसे साधारण व्यक्ति को दबा दिया। अशोक तंवर ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़कर नाराजगी जाहिर करते हुए प्रदेश कांग्रेस की सभी कमेटियों से इस्तीफा दे दिया है। तंवर का कहना है कि लोकसभा चुनाव में उम्मीद कम थी, लेकिन वह विधानसभा चुनाव के लिए तैयार थे। वहीं पार्टी की भीतर की ताकतों ने उन्हें बर्बाद कर दिया। तंवर का आरोप है कि सोनिया गांधी ने जो कमेटियां बनाई, उसने काम ही नहीं किया। तंवर का कहना है कि कुछ लोग जातिवाद की लड़ाई के चलते उन्हें नीचे धकेल रहे हैं।

जारी रखेंगे लड़ाई

अशोक तंवर का कहना है कि जो लोग अभी कुछ करने का दावा कर रहे हैं, उनका 20 दिन में सच सामने आ जाएगा। उन्होंने पार्टी में टिकट बंटवारे पर गुस्सा फोड़ा है। तंवर ने कहा कि पिछले पांच साल से जिन्होंने जमीन पर उतरकर काम किया, लेकिन उनके साथ धोखा हुआ है। अशोक तंवर का कहना है कि वह अन्याय के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। तंवर की टीम के एक सदस्य का कहना है कि बाप (भूपेन्द्र) और पुत्र (दीपेन्द्र) अपनी सबसे प्रिय सीट पर लोकसभा का चुनाव लड़े थे। अपनी ही सीट नहीं बचा पाए और कुछ ऐसा ही हाल विधानसभा चुनाव में होने वाला है।

चुनाव पर कितना पड़ेगा अशोक तंवर का असर?

भीतरघात हमेशा घातक होती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव इसका साफ उदाहरण है। समाजवादी पार्टी भीतरघात और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के चुनाव मैदान में होने का खामियाजा भुगत रही है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस तरह के बागी तेवरों से समाज में गलत संदेश जाता है। अशोक तंवर का खेमा ऐसे में कांग्रेस पार्टी के साथ खुलकर रहने से परहेज कर सकता है। इसका असर प्रदेश की कुछ दर्जन विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है।

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