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गुजरात चुनाव : क्या मोदी-शाह के चक्रव्यूह को तोड़ पाएंगे राहुल गांधी?
शशिधर पाठक/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 26 Oct 2017 08:36 AM IST
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चुनाव आयोग ने गुजरात विधानसभा चुनाव के तारीखों का ऐलान कर दिया है। राज्य में 9 और 14 दिसंबर को दो चरणों में मतदान होगा और 18 दिसंबर को मतगणना।
गुजरात विधानसभा चुनाव को 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव का क्वार्टर फाइनल माना जा रहा है। वहीं इस बार का आम चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की नाक का सवाल बन गया है।
हर हाल में लगातार छठवीं बार भाजपा को विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह ने व्यूह रचना कर दी है। अब देखना है कि क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस चक्रव्यूह को तोडक़र पप्पू जैसी छवि से ऊबर पाते हैं।
क्या है मोदी और शाह की व्यूह रचना
पिछले दो महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पांच बार गुजरात गए हैं। उन्होंने वहां उद्घाटन और विकास कार्यों की घोषणाओं का अंबार लगाकर गुजरात में संदेश देने की कोशिश की है कि वह उनके लिए कितना अहम है।
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प्रधानमंत्री इस चुनाव को पूरी तरह से गुजरात की अस्मिता के धरातल पर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यहां तक कि जीएसटी के रेट में कटौती के फैसले में भी गुजरात का खास ख्याल रखा गया था। वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह न केवल गुजरात गौरव यात्रा निकाल चुके हैं, बल्कि यह चुनाव उनके राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित होने की मान्यता को आधार देगा।
-13 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2017 के बीच केन्द्र और राज्य सरकार ने एक के बाद दर्जन भर घोषणाएं की हैं।
-गुजरात की जनता को कांग्रेस के दिग्गज नेता माधव सिंह सोलंकी के खाम(केएचएएम-क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम समीकरण) की याद दिला रही है। ताकि ऊंची जाति के पटेल वोटों को रोका जा सके।
-पहली बार पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा लगभग भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों , केन्द्रीय मंत्रियों, पार्टी के प्रमुख नेताओं को बतौर स्टार प्रचारक राज्य में उतारा है।
- पार्टी ने उच्चस्तरीय और आक्रामक प्रचार का खाका तैयार किया है। कई केन्द्रीय मंत्री करीब दो महीने से नियमित राज्य का दौरा कर रहे हैं। यहां तक कि टेक्सटाइल से लेकर हर बड़ी योजना गुजरात को केन्द्र में रखकर तैयार हो रही है।
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गुजरात विधानसभा चुनाव को 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव का क्वार्टर फाइनल माना जा रहा है। वहीं इस बार का आम चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की नाक का सवाल बन गया है।
हर हाल में लगातार छठवीं बार भाजपा को विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह ने व्यूह रचना कर दी है। अब देखना है कि क्या कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस चक्रव्यूह को तोडक़र पप्पू जैसी छवि से ऊबर पाते हैं।
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क्या है मोदी और शाह की व्यूह रचना
पिछले दो महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पांच बार गुजरात गए हैं। उन्होंने वहां उद्घाटन और विकास कार्यों की घोषणाओं का अंबार लगाकर गुजरात में संदेश देने की कोशिश की है कि वह उनके लिए कितना अहम है।
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प्रधानमंत्री इस चुनाव को पूरी तरह से गुजरात की अस्मिता के धरातल पर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यहां तक कि जीएसटी के रेट में कटौती के फैसले में भी गुजरात का खास ख्याल रखा गया था। वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह न केवल गुजरात गौरव यात्रा निकाल चुके हैं, बल्कि यह चुनाव उनके राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित होने की मान्यता को आधार देगा।
-13 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 2017 के बीच केन्द्र और राज्य सरकार ने एक के बाद दर्जन भर घोषणाएं की हैं।
-गुजरात की जनता को कांग्रेस के दिग्गज नेता माधव सिंह सोलंकी के खाम(केएचएएम-क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम समीकरण) की याद दिला रही है। ताकि ऊंची जाति के पटेल वोटों को रोका जा सके।
-पहली बार पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा लगभग भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों , केन्द्रीय मंत्रियों, पार्टी के प्रमुख नेताओं को बतौर स्टार प्रचारक राज्य में उतारा है।
- पार्टी ने उच्चस्तरीय और आक्रामक प्रचार का खाका तैयार किया है। कई केन्द्रीय मंत्री करीब दो महीने से नियमित राज्य का दौरा कर रहे हैं। यहां तक कि टेक्सटाइल से लेकर हर बड़ी योजना गुजरात को केन्द्र में रखकर तैयार हो रही है।
पांच बार की अजेय है भाजपा
1989 के आम चुनाव से लेकर 2012 के विधानसभा चुनाव भाजपा गुजरात में परचम फहराया है। 1995, 1998, 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने हर बार कांग्रेस को चुनाव में पटखनी दी है।
इनमें 2002, 2007 और 2012 का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया है और इन तीन चुनावों में भाजपा को क्रमश: 127,117 और 116 सीटें मिली हैं। इसके मुकाबले में कांग्रेस को क्रमश: 51, 59 और 60 सीटें मिली हैं।
1998 में कांग्रेस को 53 तो 1995 में 45 सीट से ही संतोष करना पड़ा था। इस तरह से पिछले 22 साल में 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है।
भाजपा का डर
गुजरात देश का ट्रेडिंग और मैनुफैक्चरिंग स्टेट है। यूपी बिहार समेत तमाम राज्यों के कामगार वहां रोजी-रोटी के लिए बसे हैं। लेकिन नोटबंदी के बाद जीएसटी ने वहां के सूती कपड़ा, साड़ी समेत तमाम उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इससे आम गुजराती में काफी नाराजगी है।
- भाजपा अध्यक्ष के बेटे जय अमित भाई शाह पर लगे आरोपों, पार्टी के भीतर गुटबाजी ने भी भाजपा की चमक पर असर डाला है।
-पाटीदार समाज मुखर होकर भाजपा का विरोध कर रहा है।
-कांग्रेस छोड़ चुके वरिष्ठ नेता और गुजरात की राजनीति के महारथी शंकर सिंह बाघेला का वहां के विधानसभा चुनाव में खास प्रभाव नहीं दिख रहा है।
-भाजपा के तमाम प्रयास के बाद भी गुजरात में तीसरी कोई प्रभावी राजनीतिक ताकत नहीं बन पा रही है।
-मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है और कांग्रेस उपाध्यक्ष की जमसभाओं में भीड़ उमड़ रही है। वहीं करीब 15 साल बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब प्रधानमंत्री मोदी की सभा में आने वाले लोग बीच में ही लौट रहे हैं। काले झंडे भी दिखा रहे हैं।
-2002 का विधानसभा चुनाव गोधरा के बाद हुआ था। 2007 के चुनाव में सांप्रदायिक मुद्दे पर हुआ था। 2012 का विधानसभा चुनाव गुजरात की अस्मिता तथा मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर हुआ था। अब आगे का विकल्प क्या?
इनमें 2002, 2007 और 2012 का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया है और इन तीन चुनावों में भाजपा को क्रमश: 127,117 और 116 सीटें मिली हैं। इसके मुकाबले में कांग्रेस को क्रमश: 51, 59 और 60 सीटें मिली हैं।
1998 में कांग्रेस को 53 तो 1995 में 45 सीट से ही संतोष करना पड़ा था। इस तरह से पिछले 22 साल में 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है।
भाजपा का डर
गुजरात देश का ट्रेडिंग और मैनुफैक्चरिंग स्टेट है। यूपी बिहार समेत तमाम राज्यों के कामगार वहां रोजी-रोटी के लिए बसे हैं। लेकिन नोटबंदी के बाद जीएसटी ने वहां के सूती कपड़ा, साड़ी समेत तमाम उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इससे आम गुजराती में काफी नाराजगी है।
- भाजपा अध्यक्ष के बेटे जय अमित भाई शाह पर लगे आरोपों, पार्टी के भीतर गुटबाजी ने भी भाजपा की चमक पर असर डाला है।
-पाटीदार समाज मुखर होकर भाजपा का विरोध कर रहा है।
-कांग्रेस छोड़ चुके वरिष्ठ नेता और गुजरात की राजनीति के महारथी शंकर सिंह बाघेला का वहां के विधानसभा चुनाव में खास प्रभाव नहीं दिख रहा है।
-भाजपा के तमाम प्रयास के बाद भी गुजरात में तीसरी कोई प्रभावी राजनीतिक ताकत नहीं बन पा रही है।
-मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है और कांग्रेस उपाध्यक्ष की जमसभाओं में भीड़ उमड़ रही है। वहीं करीब 15 साल बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब प्रधानमंत्री मोदी की सभा में आने वाले लोग बीच में ही लौट रहे हैं। काले झंडे भी दिखा रहे हैं।
-2002 का विधानसभा चुनाव गोधरा के बाद हुआ था। 2007 के चुनाव में सांप्रदायिक मुद्दे पर हुआ था। 2012 का विधानसभा चुनाव गुजरात की अस्मिता तथा मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर हुआ था। अब आगे का विकल्प क्या?
राहुल के दांत के नीचे बटर एंड केक
पिछले 25 साल में पहली बार कांग्रेस पार्टी के दांत के नीचे बटर एंड केक दोनों हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को इसका फायदा मिलना तय माना जा रहा है। पाटीदार समाज जहां भाजपा से नाराज है, वहीं असरदार वोट काटने वाली कोई तीसरी बड़ी राजनीतिक ताकत अभी तक परिदृश्य में नहीं है।
पिछले चुनाव में जद(यू) और एनसीपी ने खाता खोला था, लेकिन इस बार अभी तक स्थिति साफ नहीं हुई है। आम आदमी पार्टी को लेकर भी तय होना बाकी है। इस तरह से चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस और मोदी-शाह बनाम राहुल गांधी ही होना है।
-गुजरात की जनता में नोटबंदी, जीएसटी तथा अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने को लेकर भारी नाराजगी है।
-कांग्रेस पार्टी के नेताओं में भितरघात, आपसी खींचतान की संभावना न के बराबर है।
-गुजरात में संप्रदायिक भेदभाव और हिन्दुत्व का कार्ड चलने की संभावना सिकुड़ी है।
-शहरी गुजरात में कांग्रेस की जनसभा में भीड़ उमडऩे लगी है। गांव क्षेत्र में पहले से कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा है।
-कांग्रेस गुजरात में जातिगत समीकरण बनाने में सफल रही है। पाटीदार समाज के नेता हार्दिक पटेल समेत अन्य समर्थन देने का भरपूर संदेश दिया है।
हर हाल में राहुल को फायदा
ट्विटर, फेसबुक, सोशल मीडिया के ट्रेंड में राहुल गांधी नोटिस किए जा रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष के पास व्यंग्य, तंज का पर्याप्त आधार है और वह इसका इस्तेमाल करके लगातार चर्चा में बने हैं। इस तरह से राहुल गांधी धीरे-धीरे विरोधियों द्वारा बनायी छवि से बाहर आ रहे हैं।
-यह पहला चुनाव है जिसमें कांग्रेस पार्टी के पास केवल एक मात्र स्टारक प्रचारक राहुल गांधी है। पार्टी के वक्ताओं, प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ नेताओं की कमी है।
-कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी स्वास्थ्यगत कारणों से चुनाव प्रचार में हिस्सा लेने से परहेज करेंगी। इसी तरह से पार्टी के महासचिव और अन्य केन्द्रीय नेता भी गुजरात में जनाधार नहीं रखते। शंकर सिंह बाघेला जैसा पार्टी के पास चेहरा नहीं है। ऐसे में पार्टी राज्य विधानसभा चुनाव केवल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के चेहरे पर लड़ रही है
पिछले चुनाव में जद(यू) और एनसीपी ने खाता खोला था, लेकिन इस बार अभी तक स्थिति साफ नहीं हुई है। आम आदमी पार्टी को लेकर भी तय होना बाकी है। इस तरह से चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस और मोदी-शाह बनाम राहुल गांधी ही होना है।
-गुजरात की जनता में नोटबंदी, जीएसटी तथा अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने को लेकर भारी नाराजगी है।
-कांग्रेस पार्टी के नेताओं में भितरघात, आपसी खींचतान की संभावना न के बराबर है।
-गुजरात में संप्रदायिक भेदभाव और हिन्दुत्व का कार्ड चलने की संभावना सिकुड़ी है।
-शहरी गुजरात में कांग्रेस की जनसभा में भीड़ उमडऩे लगी है। गांव क्षेत्र में पहले से कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा है।
-कांग्रेस गुजरात में जातिगत समीकरण बनाने में सफल रही है। पाटीदार समाज के नेता हार्दिक पटेल समेत अन्य समर्थन देने का भरपूर संदेश दिया है।
हर हाल में राहुल को फायदा
ट्विटर, फेसबुक, सोशल मीडिया के ट्रेंड में राहुल गांधी नोटिस किए जा रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष के पास व्यंग्य, तंज का पर्याप्त आधार है और वह इसका इस्तेमाल करके लगातार चर्चा में बने हैं। इस तरह से राहुल गांधी धीरे-धीरे विरोधियों द्वारा बनायी छवि से बाहर आ रहे हैं।
-यह पहला चुनाव है जिसमें कांग्रेस पार्टी के पास केवल एक मात्र स्टारक प्रचारक राहुल गांधी है। पार्टी के वक्ताओं, प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ नेताओं की कमी है।
-कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी स्वास्थ्यगत कारणों से चुनाव प्रचार में हिस्सा लेने से परहेज करेंगी। इसी तरह से पार्टी के महासचिव और अन्य केन्द्रीय नेता भी गुजरात में जनाधार नहीं रखते। शंकर सिंह बाघेला जैसा पार्टी के पास चेहरा नहीं है। ऐसे में पार्टी राज्य विधानसभा चुनाव केवल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के चेहरे पर लड़ रही है