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SC Updates: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- उम्मीदवारों को अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी करना होगा खुलासा
Wed, 01 Jul 2026 09:17 PM IST
राहुल कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राहुल कुमार
Updated Wed, 01 Jul 2026 09:17 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात नगर निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को चुनाव हलफनामे में न केवल अपनी संपत्ति, बल्कि अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी खुलासा करना होगा। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले का संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट की ओर से गलत कानूनी प्रावधान लागू करने की गलती एक ऐसी खामी है जिसे सुधारा जा सकता है और इससे आपराधिक कार्यवाही अपने-आप अमान्य नहीं हो जाती।
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जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने गुजरात की पूर्व नगर पार्षद चंद्रिकाबेन किशोर डफडा की अपील को आंशिक रूप से मंजूरी देते हुए ये निर्देश जारी किए। डफडा ने 2015 के गुजरात नगर निकाय चुनावों के लिए अपने नामांकन हलफनामे में पति की कुछ अचल संपत्तियों की जानकारी न देने के आरोप में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी।
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हालांकि, पीठ ने आपराधिक मामले को रद्द नहीं किया। इसके बजाय, पीठ ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए) की धारा 125ए के तहत मजिस्ट्रेट की ओर से संज्ञान लेने वाले आदेश को रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया, ताकि वह उचित कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान ले सके और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सके। पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने आरोपों की सच्चाई या गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।
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राज्यपाल की सांविधानिक रियायत नीति को खत्म नहीं किया जा सकता: शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की सांविधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए बनाई गई रिमिशन (सजा में छूट) नीति को बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धाराओं 432 और 433 के तहत बनाई गई वैधानिक नीति से समाप्त या निरस्त नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सांविधानिक शक्ति से बनी नीति का दर्जा वैधानिक नीति से ऊपर है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हरियाणा सरकार की वर्ष 2002 की छूट नीति को प्रभावी माना और कहा कि वर्ष 2008 में जारी नई नीति उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। मामला वर्ष 2009 में 12 वर्षीय बच्चे की हत्या के दोषी ठहराए गए एक आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी से जुड़ा था। 14 वर्ष से अधिक वास्तविक सजा पूरी करने के बाद उसने 2002 की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। हरियाणा सरकार ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उस पर 2008 की नीति लागू होगी, जिसके तहत 20 वर्ष की वास्तविक और 25 वर्ष की कुल सजा पूरी करना आवश्यक है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी सरकार के निर्णय को सही ठहराया था।
हरियाणा सरकार को चार सप्ताह में नए सिरे से विचार करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को चार सप्ताह के भीतर 2002 की नीति के तहत दोषी की छूट याचिका पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भविष्य में लागू होगा और पहले से निपटाए जा चुके रिमिशन मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की सांविधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए बनाई गई रिमिशन (सजा में छूट) नीति को बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धाराओं 432 और 433 के तहत बनाई गई वैधानिक नीति से समाप्त या निरस्त नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सांविधानिक शक्ति से बनी नीति का दर्जा वैधानिक नीति से ऊपर है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हरियाणा सरकार की वर्ष 2002 की छूट नीति को प्रभावी माना और कहा कि वर्ष 2008 में जारी नई नीति उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। मामला वर्ष 2009 में 12 वर्षीय बच्चे की हत्या के दोषी ठहराए गए एक आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी से जुड़ा था। 14 वर्ष से अधिक वास्तविक सजा पूरी करने के बाद उसने 2002 की नीति के तहत समयपूर्व रिहाई की मांग की थी। हरियाणा सरकार ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उस पर 2008 की नीति लागू होगी, जिसके तहत 20 वर्ष की वास्तविक और 25 वर्ष की कुल सजा पूरी करना आवश्यक है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी सरकार के निर्णय को सही ठहराया था।
हरियाणा सरकार को चार सप्ताह में नए सिरे से विचार करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को चार सप्ताह के भीतर 2002 की नीति के तहत दोषी की छूट याचिका पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भविष्य में लागू होगा और पहले से निपटाए जा चुके रिमिशन मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
गुजरात नगर निकाय चुनाव के उम्मीदवारों को पत्नी की संपत्ति का भी करना होगा खुलासा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात नगर निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को चुनाव हलफनामे में न केवल अपनी संपत्ति, बल्कि अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी खुलासा करना होगा। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले का संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट की ओर से गलत कानूनी प्रावधान लागू करने की गलती एक ऐसी खामी है जिसे सुधारा जा सकता है और इससे आपराधिक कार्यवाही अपने-आप अमान्य नहीं हो जाती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने गुजरात की पूर्व नगर पार्षद चंद्रिकाबेन किशोर डफडा की अपील को आंशिक रूप से मंजूरी देते हुए ये निर्देश जारी किए। डफडा ने 2015 के गुजरात नगर निकाय चुनावों के लिए अपने नामांकन हलफनामे में पति की कुछ अचल संपत्तियों की जानकारी न देने के आरोप में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। हालांकि, पीठ ने आपराधिक मामले को रद्द नहीं किया। इसके बजाय, पीठ ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए) की धारा 125ए के तहत मजिस्ट्रेट की ओर से संज्ञान लेने वाले आदेश को रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया, ताकि वह उचित कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान ले सके और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सके। पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने आरोपों की सच्चाई या गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात नगर निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को चुनाव हलफनामे में न केवल अपनी संपत्ति, बल्कि अपने जीवनसाथी की संपत्ति का भी खुलासा करना होगा। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले का संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट की ओर से गलत कानूनी प्रावधान लागू करने की गलती एक ऐसी खामी है जिसे सुधारा जा सकता है और इससे आपराधिक कार्यवाही अपने-आप अमान्य नहीं हो जाती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने गुजरात की पूर्व नगर पार्षद चंद्रिकाबेन किशोर डफडा की अपील को आंशिक रूप से मंजूरी देते हुए ये निर्देश जारी किए। डफडा ने 2015 के गुजरात नगर निकाय चुनावों के लिए अपने नामांकन हलफनामे में पति की कुछ अचल संपत्तियों की जानकारी न देने के आरोप में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। हालांकि, पीठ ने आपराधिक मामले को रद्द नहीं किया। इसके बजाय, पीठ ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए) की धारा 125ए के तहत मजिस्ट्रेट की ओर से संज्ञान लेने वाले आदेश को रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया, ताकि वह उचित कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से संज्ञान ले सके और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सके। पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि उन्होंने आरोपों की सच्चाई या गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।
सड़क दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तय किए नए नियम
मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में एकरूपता लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने बुधवार को साफ किया कि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले या घायल होने वाले पीड़ितों की वार्षिक आय की गणना आयकर रिटर्न (आईटीआर) के आधार पर कैसे की जानी चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने नौकरीपेशा और व्यापारियों या अपना रोजगार करने वालों के लिए अलग-अलग नियम तय किए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ के मुताबिक, नौकरीपेशा के मामलों में वार्षिक आय की गणना पिछले एक साल के आयकर रिटर्न (आईटीआर) के आधार पर की जाएगी और उसी के मुताबिक मुआवजा निर्धारित किया जाएगा। व्यापारी या स्वरोजगार वाले मामले में वार्षिक आय की गणना के लिए पिछले 3 साल के आईटीआर की औसत आय को आधार बनाया जाएगा और उसी के अनुसार मुआवजा का निर्धारण किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने अपने इस फैसले के पीछे के कारणों को भी साफ किया। कोर्ट ने कहा कि नौकरीपेशा व्यक्ति के मामले में प्रमोशन या वेतन बढ़ने का वित्तीय असर केवल उसी साल के आईटीआर में दिखता है। कई वर्षों का औसत निकालने से पीड़ित को नुकसान होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी नौकरीपेशा व्यक्ति का हादसे से ठीक पहले प्रमोशन हुआ था और वह आखिरी आईटीआर में नहीं दिख रहा, तो अदालतें प्रमोशन लेटर या अन्य वित्तीय दस्तावेजों को भी देख सकती हैं।
आय तय करने के लिए आईटीआर महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस करोल ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे के उद्देश्य से किसी की आय का आकलन करने के लिए आईटीआर एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है। शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ वकील जेआर मिढ़ा की इन दलीलों को स्वीकार किया कि वार्षिक आय के आकलन के समय वेतनभोगी और स्व-रोजगार वाले व्यक्तियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। देशभर की अदालतों में इस मामले में अलग-अलग रुख अपनाए जाने का संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि कुछ अदालतें केवल नवीनतम आईटीआर पर भरोसा करती थीं, जबकि अन्य पिछले वर्षों के रिटर्न का औसत निकालती थीं, जिससे मुआवजे की रकम में विसंगतियां पैदा हो रही थीं।
कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा...यह ऐतिहासिक फैसला ओडिशा के एक कंस्ट्रक्शन व्यवसायी रश्मिरेखा त्रिपाठी की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि. के खिलाफ दायर अपील पर आया। ओडिशा हाईकोर्ट ने 39 वर्षीय मृतक के दो वर्षों के आईटीआर (11.6 लाख और 15.06 लाख रुपये) का औसत निकालकर उसकी सालाना आय 13.33 लाख मानी थी और 1.87 करोड़ का मुआवजा तय किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कंस्ट्रक्शन बिजनेस की प्रकृति और उसकी ग्रोथ को देखते हुए सालाना आय 14 लाख रुपये मानी जानी चाहिए। अदालत ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 1.97 करोड़ रुपये (6 फीसदी सालाना ब्याज के साथ) कर दिया।
व्यवसाय-स्वरोजगार में आय स्थिर नहीं
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि व्यवसाय या स्वरोजगार में आय स्थिर नहीं रहती, उसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसलिए ऐसे मामले में पिछले तीन वर्षों तक के आईटीआर में दिखाई गई औसत आय को ही आधार माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति भी हो सकती है जहां केवल एक या दो आईटीआर ही दाखिल किए गए हों। ऐसी परिस्थितियों और आय के उतार-चढ़ाव का आकलन करते समय व्यवसाय की प्रकृति, विकास का पैटर्न, पीड़ित की मृत्यु का व्यवसाय पर प्रभाव और व्यवसाय की भविष्य की क्षमता जैसे कारकों को देखा जाएगा। आईटीआर दाखिल करने की तारीख भी एक महत्वपूर्ण कारक होगी, क्योंकि ऐसे मामले भी आ सकते हैं जहां मृत्यु या चोट लगने के बाद बढ़ा-चढ़ाकर आय दिखाई गई हो। ऐसी स्थिति में व्यवसाय के अन्य सहायक वित्तीय दस्तावेजों की जांच की जाएगी।
मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में एकरूपता लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने बुधवार को साफ किया कि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले या घायल होने वाले पीड़ितों की वार्षिक आय की गणना आयकर रिटर्न (आईटीआर) के आधार पर कैसे की जानी चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने नौकरीपेशा और व्यापारियों या अपना रोजगार करने वालों के लिए अलग-अलग नियम तय किए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ के मुताबिक, नौकरीपेशा के मामलों में वार्षिक आय की गणना पिछले एक साल के आयकर रिटर्न (आईटीआर) के आधार पर की जाएगी और उसी के मुताबिक मुआवजा निर्धारित किया जाएगा। व्यापारी या स्वरोजगार वाले मामले में वार्षिक आय की गणना के लिए पिछले 3 साल के आईटीआर की औसत आय को आधार बनाया जाएगा और उसी के अनुसार मुआवजा का निर्धारण किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने अपने इस फैसले के पीछे के कारणों को भी साफ किया। कोर्ट ने कहा कि नौकरीपेशा व्यक्ति के मामले में प्रमोशन या वेतन बढ़ने का वित्तीय असर केवल उसी साल के आईटीआर में दिखता है। कई वर्षों का औसत निकालने से पीड़ित को नुकसान होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी नौकरीपेशा व्यक्ति का हादसे से ठीक पहले प्रमोशन हुआ था और वह आखिरी आईटीआर में नहीं दिख रहा, तो अदालतें प्रमोशन लेटर या अन्य वित्तीय दस्तावेजों को भी देख सकती हैं।
आय तय करने के लिए आईटीआर महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले जस्टिस करोल ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे के उद्देश्य से किसी की आय का आकलन करने के लिए आईटीआर एक महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है। शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ वकील जेआर मिढ़ा की इन दलीलों को स्वीकार किया कि वार्षिक आय के आकलन के समय वेतनभोगी और स्व-रोजगार वाले व्यक्तियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। देशभर की अदालतों में इस मामले में अलग-अलग रुख अपनाए जाने का संज्ञान लेते हुए पीठ ने कहा कि कुछ अदालतें केवल नवीनतम आईटीआर पर भरोसा करती थीं, जबकि अन्य पिछले वर्षों के रिटर्न का औसत निकालती थीं, जिससे मुआवजे की रकम में विसंगतियां पैदा हो रही थीं।
कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा...यह ऐतिहासिक फैसला ओडिशा के एक कंस्ट्रक्शन व्यवसायी रश्मिरेखा त्रिपाठी की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि. के खिलाफ दायर अपील पर आया। ओडिशा हाईकोर्ट ने 39 वर्षीय मृतक के दो वर्षों के आईटीआर (11.6 लाख और 15.06 लाख रुपये) का औसत निकालकर उसकी सालाना आय 13.33 लाख मानी थी और 1.87 करोड़ का मुआवजा तय किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कंस्ट्रक्शन बिजनेस की प्रकृति और उसकी ग्रोथ को देखते हुए सालाना आय 14 लाख रुपये मानी जानी चाहिए। अदालत ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 1.97 करोड़ रुपये (6 फीसदी सालाना ब्याज के साथ) कर दिया।
व्यवसाय-स्वरोजगार में आय स्थिर नहीं
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि व्यवसाय या स्वरोजगार में आय स्थिर नहीं रहती, उसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसलिए ऐसे मामले में पिछले तीन वर्षों तक के आईटीआर में दिखाई गई औसत आय को ही आधार माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति भी हो सकती है जहां केवल एक या दो आईटीआर ही दाखिल किए गए हों। ऐसी परिस्थितियों और आय के उतार-चढ़ाव का आकलन करते समय व्यवसाय की प्रकृति, विकास का पैटर्न, पीड़ित की मृत्यु का व्यवसाय पर प्रभाव और व्यवसाय की भविष्य की क्षमता जैसे कारकों को देखा जाएगा। आईटीआर दाखिल करने की तारीख भी एक महत्वपूर्ण कारक होगी, क्योंकि ऐसे मामले भी आ सकते हैं जहां मृत्यु या चोट लगने के बाद बढ़ा-चढ़ाकर आय दिखाई गई हो। ऐसी स्थिति में व्यवसाय के अन्य सहायक वित्तीय दस्तावेजों की जांच की जाएगी।