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गुजरात चुनावः भाजपा के दक्षिणी किले में जीएसटी कांग्रेस का मुख्य हथियार

Tue, 05 Dec 2017 09:08 PM IST
विनोद अग्निहोत्री/अमर उजाला
विनोद अग्निहोत्री/अमर उजाला Updated Tue, 05 Dec 2017 09:08 PM IST
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gujarat assembly elections 2017: Congress is breaking into BJP's southern region of Gujarat
BJP, Congress

पिछले कई चुनावों से भाजपा के गढ़ रहे दक्षिण गुजरात में इस बार भी कांग्रेस भाजपा को पछाड़ तो नहीं पाएगी, लेकिन उसके इस दक्षिणी किले में सेंध लगाने में जरूर कामयाब होती दिख रही है। यहां पाटीदार असंतोष के साथ-साथ जीएसटी और नोटबंदी को कांग्रेस ने अपना मुख्य हथियार बनाया हुआ है, जिसका कुछ फायदा उसे सूरत, भरूच और तापी जिलों में मिलता दिख भी रहा है।

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इसे स्थानीय भाजपा नेता भी दबी जुबान से स्वीकार करते हैं कि इस बार पिछली बार की जीती गई आठ से दस सीटों पर भाजपा कांग्रेस के साथ कड़े मुकाबले में फंसी है।  इसके बावजूद भाजपा के सरकार बना लेने का दावा करने वाले स्थानीय भाजपा नेताओं को सूरत में कपड़ा व्यापारियों और हीरा कारोबारियों की खामोशी परेशान भी कर रही है। 
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दक्षिणी गुजरात में सूरत, भरूच, तापी, नवसारी, वलसाड, डांग, नर्मदा जिलों की कुल 35 विधानसभा सीटें आती हैं। 2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 28 और कांग्रेस ने छह सीटें जीती थीं, जबकि एक सीट जनता दल (यू) के खाते में गई।
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12 सीटों वाले सूरत शहर में भाजपा ने सभी 12, चार सीटों वाले सूरत ग्रामीण में तीन भाजपा और एक कांग्रेस, दो सीटों वाले तापी में एक भाजपा एक कांग्रेस,चार सीटों वाले नवसारी में तीन भाजपा एक कांग्रेस, पांच सीटों वाले वलसाड में तीन भाजपा दो कांग्रेस, एक सीट वाले डांग में कांग्रेस, दो सीटों वाले नर्मदा में दोनों सीटें भाजपा और पांच सीटों वाले भरूच में चार सीट भाजपा और एक जेडी (यू) ने जीती थी। 

gujarat assembly elections 2017: Congress is breaking into BJP's southern region of Gujarat
गुजरात बीजेपी - फोटो : SELF

कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गांधी के सफल दौरों और जीएसटी व नोटबंदी से नाराज व्यापारियों के समर्थन के बल पर इस बार वह भाजपा के इस गढ़ में कम से कम 15 सीटें जीत सकती है। सबसे ज्यादा उम्मीद कांग्रेस को सूरत में है, जहां जीएसटी के खिलाफ कपड़ा व्यापारियों ने एक महीने का जबर्दस्त आंदोलन और बाजार बंद किया था।

व्यापारियों के आंदोलन पर हुए पुलिस लाठीचार्ज और स्थानीय भाजपा नेताओं और राज्य सरकार के रवैये को लेकर व्यापारियों में नाराजगी अब भी बरकरार है। सूरत के कपड़ा बाजार में व्यापारियों से बात करने पर वो अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर करते हैं, लेकिन वोट के सवाल पर चुप्पी साध जाते हैं।कपड़ा व्यापारी महेंद्र राजपुरोहित इसकी वजह व्यापारियों का डर बताते हैं। 

राजपुरोहित कहते हैं कि हम कारोबार करने वाले लोग हैं, हम सरकार सत्तारूढ़ दल से सीधा झगड़ा नहीं कर सकते हैं। आरएसएस के कट्टर कार्यकर्ता रहे महेंद्र राजपुरोहित बड़े विस्तार से जीएसटी से हुए कपड़ा कारोबार को परेशानी और नुकसान बताते हुए कहते हैं कि हमारे दिल में आज भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए प्यार और सम्मान है। लेकिन स्थानीय और राज्य भाजपा नेताओं के रवैए की वजह से भाजपा हमारे दिलों से उतर गई है। फिर भी अगर व्यापारी कमल पर मुहर लगाएंगे तो सिर्फ मोदी के नाम पर भाजपा के नाम पर नहीं।

एक और कपड़ा व्यापारी दिनेश भाई कहते हैं कि सूरत के व्यापारियों ने कभी भाजपा के अलावा किसी और के बारे में सोचा तक नहीं। लेकिन उसका सिला ये मिला कि न तो हमारी बात सुनी गई और इतना लंबा विरोध आंदोलन होने के बावजूद कोई भाजपा नेता पूछने तक नहीं आया बल्कि इस तरह के बयान दिए जिससे व्यापारियों के जख्म और हरे हो गए। दिनेश भाई के साथ खड़े एक युवा व्यापारी जो नाम बताने से इनकार करते हुए कहते हैं कि हम चाहते हैं कि सरकार भाजपा की ही बने, लेकिन सीटें कम हो जाएं जिससे कि नेताओं का अहंकार खत्म हो सके। 

वहीं एक और कपड़ा व्यापारी बृजेश भाई कहते हैं कि जिस सूरत शहर में कांग्रेस का झंड़ा लगाने वाला कोई नहीं मिलता था, आज उसके समर्थन में बड़े बड़े जुलूस निकल रहे हैं, इसका साफ संकेत है कि लोग जोर का झटका धीरे से देना चाहते हैं। यह पूछने पर कि सूरत की 12 सीटों में से भाजपा को कितने पर नुकसान हो सकता है, महेंद्र कहते हैं कि अभी तो चार सीटें फंसी हुई हैं, लेकिन अगर भाजपा नेताओं का यही हाल रहा तो यह संख्या बढ़कर छह भी हो सकती है।

हीरा कारोबारियों की संस्था जेम एंड जूलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के क्षेत्रीय अध्यक्ष दिनेश नवाडिया के मुताबिक नोटबंदी और जीएसटी से बड़े कारोबारियों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि हीरा निर्यात के कुल 85 फीसदी हिस्से का नियंत्रण सिर्फ 350 कारोबारियों के पास है। इसी तरह हीरा निर्माण उद्योग के 75 फीसदी कारोबार के मालिक सिर्फ 250 कारोबारी हैं। फिर हीरा उद्योग का ज्यादातर कारोबार चेक और बैंक में डिजिटल लेनदेन के जरिए होता है। लेकिन छोटे व्यापारियों पर इसका असर जरूर पड़ा है। 

gujarat assembly elections 2017: Congress is breaking into BJP's southern region of Gujarat

नवाडिया के मुताबिक समस्या हीरा निर्यात में नहीं है, लेकिन समस्या यह है कि गुजरात हीरा निर्माण उद्योग का केंद्र है, जबकि महाराष्ट्र हीरा व्यापार का बाजार है। अब एक राज्य से दूसरे राज्य में बी टु बी कारोबार पर जीएसटी लग जाता है और इसमें जो रकम फंसती है वो कारोबार पर असर डालती है।

नवाडिया के मुताबिक दुनिया के किसी भी देश में बी टु बी हीरा कारोबार में शून्य जीएसटी है। हमारी यही मांग है लेकिन सरकार ने इस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया। इस मुद्दे का राजनीतिक असर क्या होगा इस पर नवाडिया कहते हैं कि ज्यादातर कारोबारी इस मामले में कोई बात नहीं करना चाहते हैं।

पाटीदार असंतोष का असर भी सूरत की कम से कम तीन सीटों पर है। सूरत के हीरा उद्योग में राजकोट, भावनगर, अमरेली से आकर बड़ी संख्या में बसे पाटीदारों की भागीदारी है, इसीलिए 2007 हो या अब सौराष्ट्र की ही तरह सूरत भी पाटीदार असंतोष का केंद्र बनता रहा है।

यहां की कमरेज, वराछा और कतारगाम सीटों पर पाटीदार फैक्टर भाजपा को परेशान कर रहा है। जबकि चौरियासी सीट पर भाजपा के बागी निर्दलीय अजय चौधरी की मौजूदगी से कांग्रेस उम्मीदवार को फायदा मिलने की बात लोग कहते हैं। इस सीट पर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान से आए श्रमिकों की खासी तादाद है और चौधरी भाजपा से टिकट मांग रहे थे। टिकट न मिलने पर अजय चौधरी परप्रांतियों की उपेक्षा को मुद्दा बनाकर चुनाव मैदान में उतरे हैं।

सूरत शहर की सूरत बदलने के लिए मशहूर भाजपा के वरिष्ठ नेता फकीर भाई और उनकी पत्नी स्नेहलता बेन इस शहर के महापौर रह चुके हैं। बुजुर्ग फकीर भाई के घर पर किसी भाजपा नेता की नहीं आरएसएस के संस्थापक डा. बलिराम हेडगेवार, गुरु गोलवलकर और भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीरें लगी हैं।

फकीर भाई के घर पर न सिर्फ संघ और भाजपा के शीर्ष नेताओं का आना जाना रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पुराने दिनों में जब भी सूरत आते थे, यहीं रुकते थे। खुद अपनी जनसभा में मोदी ने यह बात कही कि वह जब भी सूरत आते हैं, फकीर भाई की याद आती है। 

फकीर भाई कहते हैं कि थोड़ी बहुत दिक्कत जरूर है लेकिन आखिर में लोग भाजपा को ही अपना समर्थन देंगे। वहीं बगल में बैठी स्नेहलता बेन मुस्कुरा कर इशारों में उनसे असहमति व्यक्त करती हैं। सूरत के बाजारों में कई जगह कांग्रेस के झंडे दिखाई देते हैं। ज्यादातर लोग बातचीत करने से या तो कन्नी काटते हैं या फिर इतना कहते हैं कि अभी तय नहीं किया है कि किसे वोट देना है।

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