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नूंह: G20 के बीच कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती सरकार; क्या 31 जुलाई को भी ऐसी सतर्कता से हिंसा से बचा जा सकता था?
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नूह हिंसा से सरकार ने लिया सबक
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अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली में शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर सर्व हिंदू समाज ने यह दावा किया था कि वह 28 अगस्त को नूंह में दुबारा ब्रज मंडल यात्रा निकालेगा। अरुण जैलदार ने दावा किया था कि यह 31 जुलाई को निकाली गई अधूरी ब्रज मंडल यात्रा को पूरा करने का प्रयास है, जिसे किसी भी कीमत पर पूरा किया जाएगा। पहले से ही तनावग्रस्त इलाके नूंह में इससे एक बार फिर हिंसा भड़कने की आशंका जताई जा रही थी। अंततः हरियाणा सरकार ने ब्रज मंडल यात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। यह नूंह में फिर हिंसा की आशंकाओं को दूर करने की ओर से एक कड़ा कदम है। हरियाणा सरकार ने यह स्टैंड क्यों लिया? क्या 31 जुलाई को भी इसी तरह की सतर्कता बरतते हुए नूंह हिंसा से बचा जा सकता था?विहिप नेता डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा है कि इसी बीच देश की राजधानी दिल्ली में जी 20 का आयोजन होना है। इसे देखते हुए अब केवल स्थानीय मंदिरों में पूजा-पाठ का आयोजन किया जाएगा। हालांकि, इसके पहले उन्होंने कहा था कि वे यात्रा निकालने पर अटल हैं और यात्रा की सुरक्षा की गारंटी देना हरियाणा सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। वे धार्मिक यात्राओं को निकालने के लिए स्वतंत्र हैं। विहिप ने यह भी स्पष्ट कर दिया था केवल प्रशासन के दबाव में सैकड़ों साल से चली आ रही धार्मिक यात्राओं का स्वरूप और मार्ग नहीं बदला जाएगा।
शनिवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में अरुण जैलदार ने साफ कर दिया था कि वे हरियाणा सरकार से जी-20 की परिस्थितियों के कारण वार्ता करने के लिए तैयार हैं। यदि सरकार कोई उचित सुझाव देती है तो उसे स्वीकार करने पर विचार किया जा सकता है। अंततः सरकार और सर्व हिंदू समाज के बीच हुई वार्ता के बाद हरियाणा के सभी स्थानीय मंदिरों में शिव पूजा करने पर सहमति बनी है और इस तरह नूंह में प्रदर्शन को रोकने का रास्ता तैयार हो गया।
यह थी चिंता
दरअसल, 31 जुलाई को भी नूंह में हुई हिंसा के बाद इसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनी गई थी। इससे केंद्र सरकार को अल्पसंख्यकों को सुरक्षा न दे पाने का आरोप लगा था। विपक्ष ने भी इसे लेकर सरकार पर निशाना साधा था। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा था। इसके बाद सरकार इस मुद्दे पर रक्षात्मक रुख अपनाने के लिए मजबूर हुई थी।
इसके पहले शाहीन बाग के मुद्दे पर भी सरकार को अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे जिसमें 53 लोगों की जान चली गई थी। उस घटना के कारण भी केंद्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था।
अब, 8-10 सितंबर को दिल्ली में दुनिया के 40 देशों के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री उपस्थित रहने वाले हैं। इस परिस्थिति के बीच यदि नूंह में दोबारा ब्रज मंडल यात्रा निकाली जाती है और इस दौरान कोई अप्रिय घटना घटती है तो इससे देश की छवि पर नकारात्मक असर पड़ना तय था। यही कारण है कि नूंह प्रशासन ने यात्रा को किसी भी कीमत पर अनुमति नहीं दी और संबंधित पक्ष को अपनी जिद से पीछे हटना पड़ा।
रुक सकती थी हिंसा की आग
जानकारों का कहना है कि 31 जुलाई को भी यदि प्रशासन सतर्क रहा होता तो हिंसा को रोका जा सकता था। ब्रज मंडल यात्रा निकालने के पहले सोशल मीडिया पर मोनू मानेसर और बिट्टू बजरंगी के आपत्तिजनक बयान वायरल हो गए थे। इसके उलट दूसरे पक्ष से भी कई आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले वीडियो सोशल मीडिया में फैलने लगे थे। यह खतरे की पहली घंटी थी। यदि सरकार और प्रशासन सतर्क रहा होता तो 31 जुलाई को हुई हिंसा को रोका जा सकता था।