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तीन साल में नई शिक्षा नीति भी नहीं दे पा रही सरकार, और कितनी देरी?

Sat, 26 May 2018 05:06 AM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 26 May 2018 05:06 AM IST
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Government can not give new education policy in three years

केन्द्र सरकार के तमाम काम टेढ़ी खीर साबित हो रहे हैं। इसमें से एक देश की नई शिक्षा नीति है। भाजपा की विचारधारा से तालमेल बनाकर चलने वाले एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत समेत अन्य ने काफी प्रयास किया। नई शिक्षा नीति की वकालत की और 2015 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति तैयार करने के लिए समित भी गठित कर दी। समिति ने 2016 में अपनी रिपोर्ट भी दे दी है, लेकिन आज तक शिक्षा नीति को उसका मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता।  

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इस बारे में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री के समय में गठित टीएसआर सुब्रामण्यम समिति ने अपना मसौदा दे दिया था। इस मसौदे के साथ नई शिक्षा नीति को मूर्त रूप देने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री ने इसरो के पूर्व चेयरमैन के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया था। यह समिति जून 2018 अपनी रिपोर्ट देगी। 
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इस रिपोर्ट के आने के बाद नई शिक्षा नीति को लागू करने के बारे कोई निर्णय हो सकेगा। इसे लेकर टीएसआर सुब्रामण्यम की अध्यक्षता में गठित समिति के एक सदस्य ने विरोध किया है। शिक्षा विभाग से गहरा संबंध रखने वाले सूत्र का कहना है कि सरकार नई शिक्षा नीति के नाम पर खिलवाड़ कर रही है। शिक्षाविद् के अनुसार टीएसआर सुब्रामण्यम समिति के बाद कस्तूरी रंगन समिति का गठन का अर्थ ही समझ में नहीं आता। फिर जून 2018 में रिपोर्ट आने के बाद बड़ा सवाल यह है कि सरकार इसे लागू कब करेगी? लागू करेगी भी तो इस पर अमल कब होगा? क्योंकि अगले साल 2019 में लोकसभा चुनाव प्रस्तावित है। 
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मानव संसाधन विभाग के ही एक पूर्व सचिव का भी कहना है कि नई शिक्षा ही नहीं शिक्षा से जुड़े कई मामले में सरकार भ्रम की स्थिति को नहीं दूर कर पा रही है। सूत्र का कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में छात्रों के सामने लगातार विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों का मॉडल फेल कर गया है। मंत्रालय के पूर्व अधिकारी के अनुसार शिक्षा क्षेत्र में दिशा हीनता की स्थिति लगातार बनी हुई है। 

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