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अच्छी खबर: हीमोफीलिया मरीजों में भारत की पहली मानव जीन थेरेपी सफल, गंभीर श्रेणी के रोगियों पर दिखी असरदार
Wed, 11 Dec 2024 07:38 AM IST
ज्योति भास्कर
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Wed, 11 Dec 2024 07:38 AM IST
सार
हीमोफीलिया गंभीर रक्तस्राव विकार है जो क्लॉटिंग कारकों (यानी, फैक्टर 8 और फैक्टर 9 प्रोटीन) की कमी के कारण होता है। भारत में करीब 1.36 लाख से भी अधिक मामले दर्ज हैं। अब देश की पहली मानव जीन थेरेपी सफल होने से इलाज में मदद मिलेगी। खास बात ये है कि यह थेरेपी पांच गंभीर श्रेणी के रोगियों पर असरदार देखी गई है।
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हीमोफीलिया मरीजों में भारत की पहली मानव जीन थेरेपी सफल (प्रतीकात्मक)
- फोटो : एएनआई
विस्तार
भारतीय वैज्ञानिकों ने एक बार फिर विश्व स्तर पर बड़ी कामयाबी हासिल की है। हीमोफीलिया के मरीजों के लिए भारत की पहली मानव जीन थेरेपी सफल रही है। गंभीर हीमोफीलिया ए से ग्रस्त मरीजों में जब इसथेरेपी का इस्तेमाल किया गया तो कुछ ही सप्ताह के दौरान उनमें रक्तस्राव की दर शून्य तक पहुंचने के साथ-साथ बार-बार रक्त के थक्के जमाने वाले कारकों को बदलने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी।
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में केंद्र सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और सीएमसी वेल्लोर में स्टेम सेल अनुसंधान केंद्र (सीएससीआर) के शोधकर्ताओं ने बताया कि गंभीर हीमोफीलिया ए से ग्रस्त रोगियों में फैक्टर 8 नामक थक्के बनाने वाले प्रोटीन की मात्रा कम होने लगती है। इस वजह से मामूली चोट लगने पर भी बार-बार और असामान्य रूप से रक्तस्राव होता है। हीमोफीलिया ए से पीड़ित लोगों में चोट न लगने पर भी रक्तस्राव हो सकता है। इससे उनकी जान का जोखिम बनता है। मरीजों के खून में थक्के बनाने के लिए उन्हें बार-बार फैक्टर 8 बदलना पड़ता है। इस परेशानी को लेकर शोधकर्ताओं ने 20 से 41 साल की आयु के पांच गंभीर श्रेणी के मरीजों पर शोध शुरू किया। इसके तहत लेंटीवायरल वेक्टर के साथ मानव जीन थेरेपी की शुरुआत हुई।
1.36 लाख से अधिक मामले देश में
दरअसल, हीमोफीलिया गंभीर रक्तस्राव विकार है जो क्लॉटिंग कारकों (यानी, फैक्टर 8 और फैक्टर 9 प्रोटीन) की कमी के कारण होता है। भारत में करीब 1.36 लाख से भी अधिक मामले दर्ज हैं। भारत दुनिया में सबसे अधिक रोगियों में दूसरे स्थान पर है। इनके इलाज में खर्च, बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाना, खासतौर पर बच्चों में विनौस एक्सेस जैसी कुछ बाधाएं भी हैं।
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एएवी वेक्टर की जगह लेंटीवायरल वेक्टर का इस्तेमाल
इस थेरेपी के लिए सीएससीआर के वैज्ञानिकों ने एएवी वेक्टर की जगह लेंटीवायरल वेक्टर का उपयोग करके फैक्टर 8 अभिव्यक्ति को बहाल करने के लिए वैकल्पिक प्रणाली खोजी। इसमें वायरल वैक्टर का उपयोग किया जाता है। इससे मरीज को फैक्टर 8 उत्पन्न करने की क्षमता मिलती है। प्री क्लिनिकल डाटा के आधार पर गंभीर हीमोफीलिया ए से ग्रस्त पांच मरीजों में इस थेरेपी का पहला परीक्षण सफल रहा। परीक्षण में इन रोगियों को ऑटोलॉगस हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल (एचएससी) प्राप्त हुए जो लेंटीवायरल वेक्टर फैक्टर 8 के साथ ट्रांसड्यूसर किए गए। विश्लेषण में यह पाया कि ऑटोलॉगस हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ने मरीजों में पर्याप्त समय के लिए आठवीं प्रोटीन का उत्पादन करने वाली रक्त कोशिकाओं को जन्म दिया जो बार-बार होने वाले संक्रमण का जोखिम खत्म करती है।
अब भारत में ही बनेगा जीन पूरी दुनिया को मिलेगा
केंद्र के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सूत्रों के मुताबिक, इस अध्ययन के जरिये वैज्ञानिकों ने जिस लेंटीवायरल वेक्टर की खोज की है। उसका उत्पादन भारत में ही होगा और पूरी दुनिया में उसे उपलब्ध कराया जाएगा। इसी साल फरवरी में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में इस मानव परीक्षण की घोषणा करते हुए कहा था कि कामयाबी मिलने पर भारत में ही वेक्टर का निर्माण शुरू होगा और आगे के नैदानिक परीक्षणों के साथ देश आगे बढ़ेगा।
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न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित इस अध्ययन में केंद्र सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और सीएमसी वेल्लोर में स्टेम सेल अनुसंधान केंद्र (सीएससीआर) के शोधकर्ताओं ने बताया कि गंभीर हीमोफीलिया ए से ग्रस्त रोगियों में फैक्टर 8 नामक थक्के बनाने वाले प्रोटीन की मात्रा कम होने लगती है। इस वजह से मामूली चोट लगने पर भी बार-बार और असामान्य रूप से रक्तस्राव होता है। हीमोफीलिया ए से पीड़ित लोगों में चोट न लगने पर भी रक्तस्राव हो सकता है। इससे उनकी जान का जोखिम बनता है। मरीजों के खून में थक्के बनाने के लिए उन्हें बार-बार फैक्टर 8 बदलना पड़ता है। इस परेशानी को लेकर शोधकर्ताओं ने 20 से 41 साल की आयु के पांच गंभीर श्रेणी के मरीजों पर शोध शुरू किया। इसके तहत लेंटीवायरल वेक्टर के साथ मानव जीन थेरेपी की शुरुआत हुई।
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1.36 लाख से अधिक मामले देश में
दरअसल, हीमोफीलिया गंभीर रक्तस्राव विकार है जो क्लॉटिंग कारकों (यानी, फैक्टर 8 और फैक्टर 9 प्रोटीन) की कमी के कारण होता है। भारत में करीब 1.36 लाख से भी अधिक मामले दर्ज हैं। भारत दुनिया में सबसे अधिक रोगियों में दूसरे स्थान पर है। इनके इलाज में खर्च, बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाना, खासतौर पर बच्चों में विनौस एक्सेस जैसी कुछ बाधाएं भी हैं।
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एएवी वेक्टर की जगह लेंटीवायरल वेक्टर का इस्तेमाल
इस थेरेपी के लिए सीएससीआर के वैज्ञानिकों ने एएवी वेक्टर की जगह लेंटीवायरल वेक्टर का उपयोग करके फैक्टर 8 अभिव्यक्ति को बहाल करने के लिए वैकल्पिक प्रणाली खोजी। इसमें वायरल वैक्टर का उपयोग किया जाता है। इससे मरीज को फैक्टर 8 उत्पन्न करने की क्षमता मिलती है। प्री क्लिनिकल डाटा के आधार पर गंभीर हीमोफीलिया ए से ग्रस्त पांच मरीजों में इस थेरेपी का पहला परीक्षण सफल रहा। परीक्षण में इन रोगियों को ऑटोलॉगस हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल (एचएससी) प्राप्त हुए जो लेंटीवायरल वेक्टर फैक्टर 8 के साथ ट्रांसड्यूसर किए गए। विश्लेषण में यह पाया कि ऑटोलॉगस हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ने मरीजों में पर्याप्त समय के लिए आठवीं प्रोटीन का उत्पादन करने वाली रक्त कोशिकाओं को जन्म दिया जो बार-बार होने वाले संक्रमण का जोखिम खत्म करती है।
अब भारत में ही बनेगा जीन पूरी दुनिया को मिलेगा
केंद्र के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सूत्रों के मुताबिक, इस अध्ययन के जरिये वैज्ञानिकों ने जिस लेंटीवायरल वेक्टर की खोज की है। उसका उत्पादन भारत में ही होगा और पूरी दुनिया में उसे उपलब्ध कराया जाएगा। इसी साल फरवरी में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में इस मानव परीक्षण की घोषणा करते हुए कहा था कि कामयाबी मिलने पर भारत में ही वेक्टर का निर्माण शुरू होगा और आगे के नैदानिक परीक्षणों के साथ देश आगे बढ़ेगा।