वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री बढ़ने पर पिघलेंगे एक तिहाई ग्लेशियर, 1.9 अरब लोगों के पीने के पानी पर संकट!
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इस अध्यय में बताया गया है कि अगर जलवायु परिवर्तन को काबू करने के लिए की जा रही कोशिशें नाकाम होती हैं तो इन ग्लेशियरों पर और भी ज्यादा बुरा असर होगा। इस समय के उत्सर्जन के मुताबिक साल 2100 तक हिमालय के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल जाएंगे।
ग्लेशियरों का बड़ा हिस्सा पिघलने से नदियों में पानी तेजी से घट जाएगा और इससे हिमालय के आसपास के इलाकों में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा। करीब 1.9 अरब लोगों के पीने के पानी का स्रोत है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के अध्ययन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी त्रासदी होगी जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई होगी। ग्लोबल वॉर्मिंग लगातार इन जमे हुए ग्लेशियर से ढके हिंदू कुश पहाड़ों की चोटी को गलाने में लगी है। एक सदी से भी कम में यह बर्फ से रहित पहाड़ बन जाएंगे जो कि आठ देशों से होकर गुजरते हैं।
हिंदू कुश क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए यह अध्ययन पांच सालों तक चला। यह क्षेत्र एशिया के आठ देशों, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, चीन, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से होकर गुजरता है। इसी इलाके में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटियां भी हैं और वे सारे ग्लेशियर भी, जिनसे सिंधू, गंगा, यांग्सी, इरावती और मेकॉन्ग नदियों में पानी आता है।
ग्लेशियर पिघलने पर विक्राल समस्याएं होंगी
अध्ययन के अनुसार ऐसा अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय के आसपास मौजूद सभी देशों में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़कर खतरनाक स्तर तक पहुंच जाएगा। ग्लेशियरों में काले कार्बन और धूल के जमने जैसे बदलाव दिखेंगे। मौसम की गतिविधियां भी भयानक हो जाएंगी।ग्लेशियरों के पिघलने की स्थिति में इलाके में कहीं पर बाढ़ तो कहीं पर सूखा तो कहीं पर जबरदस्त आंधियां आएंगी। इसकी वजह से शहरों में पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी और खाने पीने की किल्लत बढ़ सकती है।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका की एक पर्यावरण संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डेवलपमेंट ने इस रिपोर्ट के नतीजों को बहुत खतरनाक बताया है, खासकर बांग्लादेश जैसे देशों के लिए। इस अध्ययन के मुताबिक विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पहले कि यह बड़ा संकट बन जाए, सभी प्रभावित देशों को इस आने वाली समस्या से निपटने के उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
जलवायु परिवर्तन से क्या प्रभाव पड़ रहा
भूगर्भ शास्त्र के अनुसार हिमालय पर्वत श्रृंखला सात करोड़ साल पहले बननी शुरू हुई थी। हिमालय पर्वत के ग्लेशियर बदलते मौसम के लिहाज से काफी संवेदनशील है। साल 1970 से इस क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर पर ग्लोबल वार्मिंग के असर पर लगातार नजर रखी जा रही और उसे रिकॉर्ड किया जा रहा है। हिमालय में मौजूद तमाम बड़े ग्लेशियर लगातार तेजी से पिघल रहे हैं। धीरे धीरे कई ऐसे क्षेत्र जो हमेशा बर्फ से ढके रहते थे वहां से बर्फ पूरी तरह से हटनी शुरू हो गई है। हिमालय के वातावरण में आ रहे पर्यावरण के इन बदलाव का असर दिखना शुरू हो गया है।
उत्तराखंड में कुमाऊं है सर्वाधिक प्रभावित
भारत और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। कुमाऊं में नामिक, मिलम और जौलिंगकौंग ग्लेशियर (दारमा घाटी) सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। तापमान बढ़ने से हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसकी वजह से निचले क्षेत्र की आबादी के लिए खतरा पैदा हो गया है। यह खतरा कश्मीर से उत्तराखंड तक सभी जगह है। भारत को भी नेपाल की तरह इस तरह की झीलों के पानी की निकासी करने की परियोजना पर काम करना होगा।
बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ गईं
गढ़वाल विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का कहना है कि गढ़वाल में अलकनंदा घाटी में 69 ग्लेशियरों में से 18 सिकुड़ गए हैं। भारत की 40 फीसद आबादी हिमालयी क्षेत्र के संसाधनों पर निर्भर है। हिमालय एशिया का वॉटर टॉवर है। पानी का 80 फीसद हिस्सा हिमालय से निकलने वाली नदियों से निकलता है। हिमालय जैव विविधता का सबसे अहम स्थान है। ऐसे में ग्लेशियरों के पिघलने से नुकसान होना तय है। उत्तराखंड में बड़ी संख्या में जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं और 70 परियोजनाओं का निर्माणा चालू हैं।
मिजोरम पर सबसे ज्यादा खतरा
पोलैंड जलवायु सम्मेलन में भारतीय वैज्ञानिकों की पेश रिपोर्ट में बताया गया था कि हिमालयी राज्यों में असम और मिजोरम जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। मिजोरम का 30 फीसदी इलाका ढलान होने के कारण राज्य में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे ज्यादा होने की आशंका है। ऐसे इलाके भूस्खलन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं।
वहीं पहाड़ी राज्य होने पर भी सिक्किम जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे कम संवेदनशील है। क्योंकि वहां घने जंगल, कम जन घनत्व और प्रति व्यक्ति आय बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा होना है।
असम में घट जाएगी चाय की पैदावार
बीते कुछ सालों में असम में कई बार बाढ़ आई और सूखा भी पड़ा। जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं की गंभीरता बढ़ी है। स्टेट एक्शन प्लान फॉर क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 60 सालों यानी साल 1951 से 2010 के दौरान राज्य में सालाना औसत तापमान 0.59 डिग्री सेल्सियस बढ़ी।
इस हिसाब से साल 2050 तक इसमें 1.7 से 2.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार औसतन सालाना बारिश भी 38 फीसदी बढ़ सकती है। इसके अलावा साल 2050 तक प्रदेश में चाय की पैदावार भी 40 फीसदी घट जाएगी।
कैसे निपटे इस चुनौती से
नए समाधान तलाशने पर ही बचेंगे
अध्ययन के मुताबिक अगर 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के मुताबिक सदी के आखिर तक वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने तक सीमित कर भी लिया गया तो भी हिंदू कुश क्षेत्र में एक तिहाई ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे। यदि यह बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियस तक होती है, तो भी दो तिहाई ग्लेशियर नहीं रहेंगे। इसलिए अब तक सोचे गए उपायों से भी आगे बढ़कर जलवायु परिवर्तन को रोकने के नए और कारगर उपाय ढूंढने होंगे।
चीड़, देवदार के पेड़ बन सकते हैं मददगार
द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक उत्तराखंड वन विभाग की मदद से पेड़ों के भीतर जमा कार्बन की गणना कर रहे हैं। शोध बताते हैं कि हिमालय के घने जंगलों में कार्बन सोखने की क्षमता काफी अधिक है। इसलिए इन जंगलों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
हिमालय को ग्लोबल वार्मिंग की मार से बचाने में चीड़, देवदार और ओक के पेड़ सबसे ज्यादा मददगार साबित हो सकते हैं। हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों में पेड़ की इन प्रजातियों में कार्बन सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है।