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Global Politics: अमेरिका, रूस और चीन के नए समीकरणों के बीच भारत की राह कितनी आसान?

Sun, 21 Jun 2026 08:17 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sun, 21 Jun 2026 08:17 PM IST
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Given the stance of the US, Russia, and China, how easy is the path ahead for India?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी7 की बैठक में। - फोटो : PTI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद देश के रणनीतिकार नए सिरे से चिंतन में जुटे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने वैश्विक मंच पर जिस तरह का रुख दिखाया, उसने  नई चिंता पैदा की है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार को भी इससे हैरानी हुई कि आखिर ईरान के साथ टकराव जारी रहने के बीच में ट्रंप ने चीन का दौरा क्यों किया?

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समझिए!ट्रंप के चीन दौरे के मायने। अभी इसका महत्व खत्म नहीं हुआ है। चीन ट्रंप के लौटने के बाद ईरान के साथ अमेरिका के शांति वार्ता में गति देखने को मिली है। दूसरी बड़ी चिंता विदेश मामलों को समझने वाले एसके शर्मा की है। एसके शर्मा का कहना है कि अमेरिकी रणनीतिकार पिछले साल से पाकिस्तान को लगातार महत्व दे रहे हैं। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच में संदेश वाहक की भूमिका निभाई है। पाकिस्तान का चीन से भी रिश्ता है। रंजीत कुमार कहते हैं कि एक केमिस्ट्री और दिखी, रूस और चीन के बीच की। चीन और ईरान की। ईरान और रूस की। चीन-ईरान के जहां परोक्ष रूप से रणनीतिक साझीदार के रूप नजर आ रहा है, वहीं यूक्रेन के साथ युद्ध और नए परिदृश्य में रूस की जरूरत। सधी रणनीति के बल पर चीन ने बिना कोई लड़ाई लड़े दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया है।  
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अमेरिका के एक रणनीतिकार क्या बोल गए थे?
नई दिल्ली में रायसीना डायलॉग में अमेरिका के प्रतिनिधि ने भारत की आंखे खोल दी थी। अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडो मार्च में भारत आए थे और साफ कहा था कि अमेरिका भारत के साथ चीन वाली गलती नहीं दोहराएगा। इसका अर्थ है कि अमेरिका ने जैसे चीन को आर्थिक ताकत बनने में मदद की, वह भारत के मामले में ऐसा नहीं करेगा। दूसरी तरफ चीन ने भारत में रिकार्ड स्तर मोबाइल फोन की असेंबलिंग और निर्यात को देखते हुए रेयर अर्थ समेत तमाम महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति में सावधानी बरतना शुरू कर दिया है। उभरता भारत जहां चीन को प्रतिद्वंदी दिखाई देता है, वहीं अमेरिका भारत जैसे देश को दूसरा चीन बनने देने से परहेज कर रहा है। पिछले दशकों में भारत ने सर्विस, आईटी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। प्रबंधन के क्षेत्र में भारतीय मैनेजर अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने भारत के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। इसका असर पुणे, नोएडा, गुरूग्राम,हैदराबाद, बेंग्लुरू की चमक पड़ने की संभावना देखी जा रही है।  
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 नाम न छापने की शर्त पर पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि भारत को दक्षिण एशिया शिखर सम्मेलन(दक्षेस) को कमजोर बनाने में योगदान नहीं देना चाहिए था। मुझे चिंता है कि अमेरिका के साथ रिश्तों के संतुलन में हम अन्य साथियों को थोड़ा भूल गए। अब हमारे लिए पुराने रास्ते पर लौटना उतना आसान नहीं है। पूर्व विदेश सचिव शशांक ने अमेरिका से ट्रेड डील का दबाव बढ़ने पर कहा था कि भारत को ब्रिक्स को मजबूत बनाने की तरफ लौटना चाहिए। संभवत: पूर्व विदेश सचिव का इशारा इसी ओर है। खैर, हम यूरोपीय देशों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  


रणनीतिक स्वायत्तता पर बढ़ रहा है दबाव
चीन की विस्तारवादी नीति में कोई बदलाव नहीं है। वह हिन्द महासागरीय क्षेत्र में लगातार अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। अमेरिका के साथ ट्रेड डील का दबाव है। कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। उच्च तकनीकी समेत कई क्षेत्रों में भारत अमेरिका के साथ पारस्पिरिक सहयोग चाहता है। इसके अलावा मध्य एशिया में अभी स्थिति सामान्य नहीं हुई है। भारत और इस्राइल के रिश्ते काफी प्रगाढ़ हैं। लेकिन अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद मध्य एशिया का समीकरण तेजी से बदलेगा। इसके सामानांतर भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चिंता काफी महत्वपूर्ण है।   प्रधानमंत्री ने आईना दिखाते हुए दुनिया में एकजुटता, सबका और सबका विकास तथा दुनिया में समवेशी विकास की अवधारणा को मजबूत बनाने पर जोर दिया। ग्लोबल साऊथ की बात की। प्रधानमंत्री की इन चिंताओं में भारत जैसे विकासशील देश का दर्द भी साफ दिखाई देता है।

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