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बकरी को बचाने के लिए बाघ से भिड़ी लड़की, फिर ली सेल्फी

Wed, 04 Apr 2018 05:07 PM IST
बीबीसी, हिंदी
बीबीसी, हिंदी Updated Wed, 04 Apr 2018 05:07 PM IST
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girl fought with tiger for saving her goats and then took selfie with mother

बाघ के पंजों से बुरी तरह घायल और खून से लथपथ इस बहादुर लड़की ने घर के भीतर आने के बाद क्या किया? अपना मोबाइल फोन निकालकर अपनी और घायल मां की सेल्फियां लीं। क्योंकि बाघ अब भी बाहर था, सुरक्षा की गारंटी नहीं थी, लिहाजा वो अपनी हालत को कैमरे में सुरक्षित कर लेना चाहती थी। 21 साल की कॉमर्स ग्रैजुएट रुपाली मेश्राम एक दुबली-पतली सी ग्रामीण लड़की हैं।

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साधारण परिवार की इस लड़की के सिर पर, दोनों हाथ-पांव और कमर पर घाव के निशान दिखते हैं। सिर और कमर के घाव गहरे थे लिहाजा वहां टांके आए हैं। नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अहाते में वह अपना डिस्चार्ज कार्ड दिखाती हैं जिसपर घावों की वजह साफ लिखी है - जंगली पशु बाघ का हमला।
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हालांकि असली कहानी है कि किस तरह से उसने और उसकी मां ने बाघ से भिड़कर खुद की जान बचाई, लेकिन फिर भी गांव लौटने का हौसला बाकी है। पूर्वी विदर्भ में भंडारा जिले के नागझिरा इलाके में वाइल्ड लाइफ सैंक्चुरी (वन्य जीव अभयारण्य) से सटे गांव में रुपाली का छोटा-सा घर है।
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उसकी मां जीजाबाई और बड़ा भाई वन विभाग के लिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उसके अलावा परिवार ने बकरियां पाल रखी हैं ताकि कुछ और रुपए बच पाएं। इसीलिए 24 मार्च की रात जब बकरियों के चिल्लाने की आवाजें आईं तो नींद से उठकर रुपाली ने घर का दरवाजा खोल दिया। आंगन में बंधी बकरी खून से लथपथ थी और उसके करीब हल्की रोशनी में दिखती बाघ की छाया।

'लगा था कि ढेर हो जाऊंगी'

girl fought with tiger for saving her goats and then took selfie with mother

उसे बकरी से दूर करने के इरादे से रुपाली ने एक लकड़ी उठाकर बाघ पर वार किया। वो बताती हैं कि लकड़ी की मार पड़ते ही बाघ ने उन पर धावा बोला। "उसके पंजे की मार से मेरे सिर से खून बहने लगा, लेकिन मैं फिर भी उस पर लकड़ी चलाती रही। मैंने चीख कर मां को बाघ के बारे में बताया।" रुपाली की मां जीजाबाई कहती हैं, "जब मैं रुपाली की चीख सुनकर बाहर आई तो उसके कपड़े खून से लथपथ थे। मुझे लगा कि अब वो मर जायेगी। उसके सामने बाघ था। मैंने भी लकड़ी उठाकर उस पर दो बार वार किए।

उसने मेरे दाहिनी आंख के पास पंजे से वार किया। लेकिन, मैं जैसे-तैसे रुपाली को घर के भीतर लाने में सफल रही। हमने दरवाजा भी बंद कर दिया। छोटी-सी बस्ती होने के चलते घर दूर-दूर बने हैं। शायद इसलिए हमारी चीखें किसी को सुनाई ना दी हो।" ठीक तभी रुपाली ने कुछ ऐसा किया जिसकी ऐसे समय कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसने मोबाइल फोन निकालकर अपनी और मां की कुछ सेल्फियां ले लीं।

वो इसकी वजह बताती हैं कि ''बाघ उस वक्त भी बाहर था। हमारे बचने की कोई गारंटी नहीं थी। मेरे सिर से और कमर से खून बहता जा रहा था। कपड़े खून से सन गए थे। ऐसे में हमारे साथ जो कुछ हुआ था उस हादसे का मैं एक रिकॉर्ड रखना चाहती थी। मां ने लोगों को फोन करने का सुझाव दिया। मैंने कुछ लोगों को फोन करके बताया भी। इनमें एक वनकर्मी भी था जो आधे घंटे बाद पहुंचा। हम भी बाहर आए, लेकिन तब तक बाघ जा चुका था।''

रुपाली ने बताया, "मेरी सांसें असामान्य गति से चल रही थीं। लग रहा था कि मैं ढेर हो जाऊंगी। गांव के डॉक्टर की सलाह पर एम्बुलेंस बुलाकर हमें तहसील के अस्पताल ले जाया गया जहां मेरे घांवों पर टांके लगे। फिर हमें जिला अस्पताल भेजा गया। दो दिन बाद हमें नागपुर के सरकारी अस्पताल रेफर किया गया। यहां एक्स-रे और सोनोग्राफी तमाम टेस्ट हुए।" मंगलवार को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया हालांकि इसी महीने दो बार और आने को कहा गया है। अस्पताल के सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. राज गजभिये ने बताया कि अब दोनों के घाव भर रहे हैं, लेकिन उन के घावों से पता चल रहा था कि बाघ से भिड़ंत के दौरान उन्होंने बहादुरी का परिचय दिया। 

लगता है डर

girl fought with tiger for saving her goats and then took selfie with mother

हालांकि, सौभाग्य से बाघ के जबड़े से खुद को बचाने में वे कामयाब रहीं। हमने उन्हें रेबीज और उस तरह की बीमारियों की आशंका से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त दवाइयां दी हैं। लेकिन समस्याओं की फेरहिस्त यहीं खत्म नहीं हो जाती। पिछले दस दिनों से मां और भाई दोनों काम पर नहीं जा सके हैं। जाहिर है कि आर्थिक समस्या काफी है। रुपाली बताती है कि इलाके के पूर्व सांसद शिशुपाल पटले ने उन्हें फोन कर मदद की बात कही है। हमने श्री पटले से फोन पर पूछा तो उन्होंने मेश्राम परिवार को वन विभाग से सहायता दिलाने के लिए राज्य के वन मंत्री से सम्पर्क में होने की बात कही। उन्होंने कहा कि इस बहादुर लड़की को वन विभाग में ही स्थायी नौकरी मिल जाये तो उन्हें खुशी होगी।

घर लौटने पर डर लगता है?

लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी बाकी है। सिर्फ एक लकड़ी हाथ में लिए जब वह बाघ के सामने डटी थी, तब रुपाली के दिमाग में क्या चल रहा था? रुपाली की आंखों में फिर कठोर भाव जाग जाते हैं। वह बताने लगती हैं, "कुछ देर तक ख्याल आया कि शायद मैं नहीं बचूंगी। लेकिन मैंने खुद को चेतावनी दी कि मुझे हारना नहीं है।" क्या लौटने पर डर या आशंका की भावना आती है? उसका जवाब है कि ''चिंता हो सकती है, लेकिन डर बिल्कुल नहीं। मैं जिन्दगी में कभी किसी बाघ से नहीं डरूंगी।''

अब वो कॉमर्स ग्रैजुएट क्या बनना चाहती हैं? उसका कहना है,"किसी बैंक में नौकरी का सपना देखती हूं। लेकिन उसके लिए कोचिंग जरूरी है और मेरे पास रुपए नहीं हैं। तो जो ठीक-ठाक काम मिल जाए, वही ढूंढना होगा।" फिर वो दुबली-पतली, लेकिन धुन की पक्की लड़की खुद ही बुदबुदाती है, "लेकिन किसी जंगली बाघ से डरने का सवाल ही नहीं है।"

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