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चिंताजनक: देश में बढ़ी जीनोम जांच, वैज्ञानिकों को दुरुपयोग की आशंका, सख्त नियम लागू करने की उठी मांग

Thu, 07 Mar 2024 06:53 AM IST
यशोधन शर्मा परीक्षित निर्भय
परीक्षित निर्भय Published by: यशोधन शर्मा Updated Thu, 07 Mar 2024 06:53 AM IST
सार

अमेरिका और यूरोप सहित कई देशों में इसे नियमों के दायरे में लाया है, लेकिन भारत में अभी यह प्रारंभिक स्थिति में है। वैज्ञानिकों ने कहा कि हमें जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए एक मजबूत कानून की जरूरत है जो बीमा कंपनियों की ओर से भेदभाव के साथ इसके दुरुपयोग को भी रोकें।

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Genome testing increased India scientists fear misuse Demand implement strict rules India
जीनोम सीक्वेंसिंग - फोटो : twitter@Arvindkejriwal

विस्तार

कोरोना महामारी में जीनोम सीक्वेंसिंग यानी आनुवंशिक जांच तेजी से बढ़ी है, जिसके चलते इनकी लागत भी कम हो रही है। आम आदमी तक पहुंच बढ़ने का यह बेहतर संकेत है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसके दुरुपयोग की आशंका जताते हुए सरकार से जल्द सख्त नियम लागू करने की सिफारिश की है। नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-आईजीआईबी के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. विनोद स्कारिया का कहना है कि जीनोम सीक्वेंसिंग को लेकर अगले पांच साल बहुत अहम है और हमें अभी सक्रिय होने की जरूरत है।
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अमेरिका और यूरोप सहित कई देशों में इसे नियमों के दायरे में लाया है, लेकिन भारत में अभी यह प्रारंभिक स्थिति में है। उन्होंने कहा कि हमें जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए एक मजबूत कानून की जरूरत है जो बीमा कंपनियों की ओर से भेदभाव के साथ इसके दुरुपयोग को भी रोकें। सबसे अहम यह कि जीनोम डाटा गोपनीय और सुरक्षित होना चाहिए।
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हाल ही में एक विदेशी कंपनी ने बगैर अनुमति भारत के 20 हजार लोगों के जीनोम डाटा को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पेश किया। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक तरह से राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में जीनोमिक डाटा का संरक्षण होना चाहिए। जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत 10 हजार भारतीय जीनोम का अनुक्रमण (सीक्वेंस) पूरा हुआ है। अगले चरण में 10 हजार और अनुक्रमण होंगे।
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भारत में 2006 में पहली जांच
भारत ने 2006 में पहली बार मानव जीनोम का अनुक्रमण किया लेकिन कोरोना महामारी में वायरस के नए स्वरूपों की पहचान में इसका इस्तेमाल बढ़ा है। हैदराबाद स्थित सीसीएमबी के पूर्व निदेशक डॉ. राकेश मिश्रा के अनुसार, केंद्र सरकार जीनोम मैपिंग कर देश के लोगों की आनुवंशिक स्थिति समझने का प्रयास कर रही है।


इसलिए अहम तकनीक
यह तकनीक इसलिए अहम है क्योंकि इसका इस्तेमाल बीमारियों से लड़ने में हो सकता है। वर्ष 2009 में भारतीय वैज्ञानिकों ने इसी के सहारे पता लगाया कि एमवाईबीपीसी-3 (कार्डियक मायोसिन बाइंडिंग प्रोटीन सी) नामक एक प्रोटीन में असामान्यता है, जिसका संबंध हार्ट अटैक से है। यह आनुवंशिक स्वरूप भारत की करीब चार फीसदी आबादी में है।
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