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Assam: हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं पर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को जारी किया नोटिस, नफरती भाषण देने का आरोप

Thu, 26 Feb 2026 07:07 PM IST
Nirmal Kant न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी। Published by: Nirmal Kant Updated Thu, 26 Feb 2026 07:07 PM IST
सार

Assam: गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कथित नफरती भाषपणों के लिए जनहित याचिकाओं पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को नोटिस जारी किया है। इसके अलावा, राज्य सरकार और डीजीपी को भी नोटिस जारी किया गया है। क्या है मामला, पढ़ें रिपोर्ट-

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Gauhati HC issues notice to Assam CM in PILs alleging 'hate speech'
गौहाटी उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई

विस्तार

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने गुरुवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को नोटिस जारी किया। यह नोटिस कुछ जनहित याचिकाओं (पीआईएल) पर दिया गया है, जिनमें उन पर नफरती भाषण देने और सांप्रदायिक टिप्पणियां करने के आरोप हैं, खासकर 'मिया' समुदाय के खिलाफ। तीन अलग-अलग याचिकाओं पर राज्य सरकार और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भी नोटिस जारी किए गए। 
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मुख्य न्यायाधीश (सीजे) अशुतोष कुमार और न्यायाधीश अरुण देव चौधरी की एक खंडपीठ ने इन तीन याचिकाओं की सुनवाई की। अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 21 मार्च तय की है। वकील सांतनु बोरठाकुर पीटीआई से बातचीत में कहा, उत्तरदाता अगली तारीख से पहले नोटिस का जवाब देंगे। अदालत ने कोई अन्य आदेश नहीं दिया है।
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याचिका में क्या मांग की गई थी?
एक याचिका असम के साहित्यकार हिरेन गोहेन, पूर्व डीजीपी हरेकृष्ण डेका और वरिष्ठ पत्रकार परेश मलाकर ने 24 फरवरी को दायर की थी। इसके अलावा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 21 फरवरी को अलग याचिकाएं दायर की थीं, जिसमें मुख्यमंत्री को इस तरह की टिप्पणियां करने से रोकने का अनुरोध किया गया।
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सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थीं सरमा के खिलाफ याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें मुख्यमंत्री सरमा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। इन याचिकाओं में एक वायरल वीडियो दिखाया गया था, जिसमें वह कथित तौर पर किसी विशेष समुदाय के सदस्यों को राइफल से निशाना साधते हुए दिखाई दे रहे थे।

'मिया' मूल रूप से असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द है। गैर-बंगाली भाषी लोग उन्हें आम तौर पर बांग्लादेशी आप्रवासियों के रूप में पहचानते हैं। हाल के वर्षों में, इस समुदाय के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने विरोध के संकेत के तौर पर इस शब्द को अपनाना शुरू कर दिया है।



 
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