उत्तर प्रदेश में आतंक और अंडरवर्ल्ड का दूसरा नाम बन चुके विकास दुबे को पुलिस ने शुक्रवार सुबह मुठभेड़ में मार गिराया। पिछले हफ्ते दो जुलाई को कानपुर के बिकरू गांव में उसे पकड़ने के लिए गए पुलिसकर्मियों पर उसने और उसके साथियों ने गोलियां चला दी थीं। इसमें आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। हालांकि इस एनकाउंटर की परिस्थितियां और पुलिस की कहानी से इस एनकाउंटर पर ही सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, यह कोई पहला ऐसा एनकाउंटर का मामला नहीं है जिसमें ऐसे सवाल उठ रहे हों।
इशरत जहां से लेकर हैदराबाद कांड तक, ये हैं देश के पांच सबसे विवादित एनकाउंटर
कुख्यात अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। इस एनकाउंटर ने कई बहस फिर शुरू कर दी हैं, फिर चाहे वह कैदियों को हथकड़ी लगाने या न लगाने का मामला हो या फिर फर्जी एनकाउंटर की बात हो। हालांकि, भारत में पहले भी कई ऐसे एनकाउंटर हुए हैं जो विवादों के घेरे में रहे हैं। जानिए देश के इतिहास के पांच सबसे विवादित एनकाउंटर के बारे में...
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इशरत जहां मुंबई की रहने वाली 19 वर्षीय युवती थी जिसे 15 जून 2004 को एक एनकाउंटर में मारा गया था। गुजरात पुलिस के इस एनकाउंटर में तीन लोग और मारे गए थे। पुलिस ने कहा था कि इशरत जहां एक आतंकी साजिश का हिस्सा थी जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारवे के लिए रची जा रही थी। इस एनकाउंटर के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कई सवाल उठाए थे और विपक्षी दलों ने इसे हत्या करार दिया था।
इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था। इसमें गुजरात पुलिस के कई पुलिस अधिकारी जांच के घेरे में आए थे। एनकाउंटर का नेतृत्व करने वाले वाले पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा को 17 साल बाद साल 2019 में मामले से राहत दी गई थी। इस मामले में अहमदाबाद में सीबीआई अदालत में अभी भी मुकदमा चल रहा है।
वंजारा की टीम ने इशरत जहां, उसके दोस्त जावेद उर्फ प्राणेश और पाकिस्तानी मूल के जीशान जौहर और अमजद अली राणा को अहमदाबाद के बाहरी इलाके में एक मुठभेड़ में मार दिया था। गुजरात पुलिस ने इशरत जहां और उसके दोस्तों को आंतकवादी करार देते हुए कहा था कि वे नरेंद्र मोदी की हत्या करने की साजिश रच रहे थे। हालांकि बाद में सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि यह मुठभेड़ फर्जी थी।
आगे की स्लाइड में पढ़ें-सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर
सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी को साल 2005 में गुजरात पुलिस ने एक एनकाउंटर में मार दिया था। पुलिस ने कहा था कि सोहराबुद्दीन आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा मॉड्यूल का हिस्सा था। यह मामला भी अदालत ने सीबीआई के हवाले किया था। इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह को आरोपी के रूप में नामित किया गया था। हालांकि, बाद में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी।
साल 2018 में सबूतों के अभाव में सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले में 22 आरोपियों को बरी किया था। सीबीआई के मुताबिक आतंकवादियों से संबंध रखने वाला कथित गैंगेस्टर शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और उसके सहयोगी प्रजापति को गुजरात पुलिस ने एक बस से उस वक्त अगवा कर लिया था, जब वे लोग 22 और 23 नवंबर 2005 की रात हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे।
सीबीआई के मुताबिक शेख की 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद के पास कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई। उसकी पत्नी को तीन दिन बाद मार डाला गया और उसके शव को ठिकाने लगा दिया गया। साल भर बाद 27 दिसंबर 2006 को प्रजापति की गुजरात और राजस्थान पुलिस ने गुजरात-राजस्थान सीमा के पास चापरी में कथित फर्जी मुठभेड़ में गोली मार कर हत्या कर दी। अभियोजन ने इस मामले में 210 गवाहों से पूछताछ की जिनमें से 92 मुकर गए थे।
आगे की स्लाइड में पढ़ें-लखन भैया एनकाउंटर
अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन का गुर्गा कहे जाने वाले रामनारायन गुप्ता उर्फ लखन भैया को मुंबई के वर्सोवा के पास एनकाउंटर में मार डाला गया था। पुलिस ने दावा किया था कि लखन भैया पर आपराधिक गतिविधियों का शक होने पर उन्होंने उसे नवी मुंबई से 11 नवंबर 2006 उठाया था। लाखन के भाई और मां ने इस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी।
बाद में यह एनकाउंटर वाकई फर्जी साबित हुए और इसमें 22 पुलिस वालों की गिरफ्तारी हुई। इस मामले में अदालत ने 21 लोगों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोषियों में 13 पुलिसवाले भी शामिल थे। सरकारी पक्ष ने 15 लोगों को मौत की सजा देने की मांग की थी। यह उन गिने-चुने मामलों में से एक है जिसमें पुलिस मुठभेड़ में शामिल लोगों को दोषी ठहराया गया था।
आगे की स्लाइड में पढ़ें-वारंगल एनकाउंटर
साल 2008 का यह ऐसा मामला था जिसमें जनता ने भावनात्मक रूप से इस पुलिसिया कार्रवाई का समर्थन किया था। इसमें आंध्र प्रदेश पुलिस ने एसिड अटैक के तीन आरोपियों को मार दिया था। तीनों पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज की दो छात्राओं पर एसिड फेंकने का आरोप था। पुलिस ने कहा था कि उन्होंने यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की थी, लेकिन कई लोगों ने कहा था पुलिस ने यह लोगों की उद्वेलित होती भावनाओं को शांत करने के लिए जानबूझकर किया था।