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Freebies War: मुफ्त की रेवड़ी और गरीबों की ‘आवश्यक सहायता’ में अंतर समझें नेता, नहीं तो बन जाएंगे श्रीलंका

Fri, 12 Aug 2022 02:42 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 12 Aug 2022 02:42 PM IST
सार

Freebies War: आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि सरकारों का असली कार्य यह है कि वह लोगों के लिए इस तरह की मूलभूत सुविधाओं का निर्माण करें, जिससे लोग योग्य बनकर न केवल आत्मनिर्भर बनें, बल्कि राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान भी दे सकें...

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Freebies War: Which scheme is freebies and which considered as essential assistance given to the poor
Freebies War: सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रूख के बाद इस बात पर बहस तेज हो गई है कि किस योजना को ‘मुफ्त की रेवड़ी’ माना जाए और किस योजना को गरीब जनता के हित के लिए दी जा रही ‘आवश्यक सहायता’ माना जाए। इस बहस के सीधे निशाने पर अरविंद केजरीवाल को माना जा रहा है, जो मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी देने की घोषणा कर पहले दिल्ली की सत्ता में आए, बाद में इसी के सहारे पंजाब में भी सत्तारूढ़ हो गए। अब वे गुजरात सहित दूसरे प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह की मुफ्त योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं।

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लेकिन केवल आम आदमी पार्टी या अरविंद केजरीवाल ही यह काम कर रहे हों, ऐसा नहीं है। भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र-राज्य सरकारें भी यही काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा को मिली शानदार सफलता के पीछे भी यही बात सामने आई थी कि कोरोना काल में जनता को दी गई मुफ्त राशन योजना ने बड़ी भूमिका निभाई। केंद्र सरकार प्रति वर्ष करोड़ों गरीब किसानों को छह हजार रुपये की नकद आर्थिक सहायता भी पहुंचा रही है। पीएम आवास योजना और आयुष्मान योजना जैसी अनेक योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।
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ऐसे में यह कैसे तय किया जाए कि कौन सी योजना ‘मुफ्त की रेवड़ी’ है, और कौन सी योजना निर्धनों को दी गई ‘आवश्यक सहायता’ मानी जाए?

सरकारें लाभ कमाने वाली प्राइवेट कंपनी नहीं

आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि सरकारें लाभ कमाने वाली प्राइवेट कंपनी नहीं होतीं कि उनका कार्य केवल लाभ कमाना माना जाए। उनका असली कार्य यह है कि वह लोगों के लिए इस तरह की मूलभूत सुविधाओं का निर्माण करें, जिससे लोग योग्य बनकर न केवल आत्मनिर्भर बनें, बल्कि राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान भी दे सकें। सरकारों को इसके लिए शिक्षा-स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहिए। इसमें निजी क्षेत्र की मदद भी ली जानी चाहिए।

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लेकिन अनेक नागरिक आर्थिक कमजोरी के कारण इन सुविधाओं का लाभ लेने से वंचित रह जाते हैं। देश को अपने ऐसे गरीब नागरिकों के लिए शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को निःशुल्क उपलब्ध कराना चाहिए जिससे वे शिक्षित और स्वस्थ होकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकें। ध्यान देना चाहिए कि बीमार, गरीब और आर्थिक तौर पर पिछड़े जनसमुदाय किसी राष्ट्र के ऊपर बोझ साबित होते हैं, जबकि स्वस्थ-शिक्षित और तकनीकी ज्ञान से संपन्न नागरिक किसी राष्ट्र के लिए असेट साबित होते हैं। ऐसे में गरीब नागरिकों की मदद अवश्य की जानी चाहिए।   

अब प्रश्न उठता है कि किन योजनाओं को मुफ्त की रेवड़ी और किसे आवश्यक सहायता माना जाए। कई देशों में नागरिकों के लिए प्रारंभिक स्तर की शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएं मुफ्त होती हैं, तो कुछ देशों में बेरोजगारों को भारी मात्रा में भत्ता भी दिया जाता है। कई देशों में मुफ्त इंटरनेट की सुविधा पाना भी गरीबों की सहायता के तौर पर देखा जाता है जिससे वे ज्ञान की असीम दुनिया का लाभ उठाने से वंचित न रह जाएं।

देशों के लिए अलग-अलग मानक

डॉ नागेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, यह किसी देश की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है कि वह अपने नागरिकों की सुविधाओं पर कितना खर्च कर सकता है, लिहाजा सभी देशों के लिए एक समान मानक तय नहीं किये जा सकते। लेकिन यह तय है कि मुफ्त और एक समान शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधा बच्चों को भविष्य के लिए बेहतर नागरिक बनने के अवसर प्रदान करती है, लिहाजा इन्हें आवश्यक सुविधा माना जा सकता है। यदि बच्चों में क्षमता है तो उन्हें बेहतर खेल सुविधाएं दी जा सकती हैं, जिससे वे अपने-अपने क्षेत्रों में प्रगति कर राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकें। अमेरिका-चीन अपने युवाओं के लिए खेल सुविधाओं में भारी निवेश करते हैं।

उत्पादक योजनाओं में हो निवेश

किसी देश को ऐसी योजनाओं में निवेश करना चाहिए, और उन्हें निःशुल्क या उचित सस्ती दरों पर जनता को उपलब्ध कराना चाहिए जिससे नागरिक स्वयं धन पैदा करने में समर्थ हो सकें। इस अर्थ में बच्चों को शिक्षा-स्वास्थ्य की मुफ्त सुविधा देना, नागरिकों को रोजगार प्राप्त करने के लिए स्किल ट्रेनिंग देना आवश्यक सहायता मानी जा सकती है। इस कैटेगरी में निर्धनतम श्रेणी के गरीबों को एक सीमा तक बिजली-पानी की मुफ्त सुविधा देना भी आवश्यक सुविधा माना जा सकता है क्योंकि बेहतर जीवन स्तर में जीने वाला नागरिक बेहतर कार्य करने के लिए सक्षम होता है।

इसी प्रकार किसानों को सब्सिडी देना भी आवश्यक सुविधा है, क्योंकि इससे वे सस्ता अनाज पैदा करने में समर्थ होते हैं। वहीं, अनुत्पादक कार्यों के लिए दी गई सहायता को मुफ्त की रेवड़ी मानी जानी चाहिए। इस कैटेगरी में जनता को मुफ्त टीवी, वाशिंग मशीन देना अनुत्पादक माना जा सकता है।

पीएम मोदी ने दी जनता को आवश्यक सहायता- भाजपा

दिल्ली भाजपा के महामंत्री हर्ष मल्होत्रा ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार ने कोरोना काल के दौरान देश के 80 करोड़ गरीब परिवारों को राशन की सुविधा पहुंचाई है। विश्व बैंक, विश्व स्वास्थ्य संगठन और आईएमएफ जैसी संस्थाओं ने भी माना है कि यदि इन परिवारों को उचित सहायता न दी गई होती, तो बड़ी संख्या में परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले गए होते। उलटे भारत ने करोड़ों परिवारों को अत्यंत गरीबी रेखा से ऊपर लाने में सफलता पाई है।

हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि इसी प्रकार केंद्र सरकार ने कोरोना वैक्सीन लगाकर लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण में आने से बचाया है। करोड़ों गरीब परिवारों को उज्ज्वला गैस सहायता, प्रधानमंत्री आवास योजना की सहायता और आयुष्मान योजना के अंतर्गत इलाज की सुविधा देकर उनके जीवन स्तर को बेहतर करने का काम किया है। इससे इन नागरिकों को गरीबी के जाल में फंसने से बचने और अपना जीवन स्तर बेहतर करने का अवसर मिला है।

2020-21 में मनरेगा योजना के लिए 61,500 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था। लेकिन कोरोना काल की परिस्थिति को देखते हुए इसे 111,500 करोड़ रुपये कर दिया गया। वास्तविक खर्च 1,11,169 करोड़ रुपये का आया था। इस योजना के माध्यम से गरीब लोगों को आर्थिक मदद दी गई।

सामने आया रेवड़ी और असली सहायता का फर्क

उन्होंने कहा कि एक आरटीआई से मिली सूचना में अरविंद केजरीवाल सरकार ने बताया है कि उसने शिक्षा ऋण देने की एक योजना के प्रचार पर 19 करोड़ रुपये का खर्चा किया, जबकि इसका लाभ केवल दो छात्रों को मिला है। इसके पहले केजरीवाल सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक और स्कूलों के निर्माण का भी खूब ढिंढोरा पीटा था, लेकिन मोहल्ला क्लीनिक पूरी तरह फ्लॉप साबित हए हैं तो स्कूलों के निर्माण में भारी घोटाला हुआ है। भाजपा नेता ने कहा कि इसी से मुफ्त की रेवड़ी और जनता की असली सहायता करने का फर्क समझ में आ जाता है।

अमीरों का 10 लाख करोड़ का कर्ज क्या है- आप
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि केंद्र सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि अब तक 10 लाख करोड़ रुपयों का अमीरों का कर्ज समाप्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स 30 फीसदी से 25 फीसदी करके अमीरों को पांच लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की सहायता पहुंचाई है, जबकि दूध, दही, पनीर, पेंसिल, रबर और बेकरी की चीजों पर पांच फीसदी का टैक्स लगाकर गरीबों को चोट पहुंचाई है।



इसी से साफ होता है कि किस सरकार की प्राथमिकता में कौन है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुफ्त की योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने के बहाने आम आदमी पार्टी की गरीबों के लिए की जा रही राजनीति को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है।

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