निर्भया के दोषियों से पहले 1983 में एक साथ चार गुनहगारों को हुई थी फांसी, यह था मामला
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निर्भया के दोषियों की फांसी की सजा की तारीख मुकर्रर हो गई है। 16 दिसंबर 2012 को चलती बस में निर्भया के साथ दरिंदगी करने वाले चारों दोषी तिहाड़ जेल में बंद हैं और 22 जनवरी को उन्हें फांसी दी जानी है। पटियाला हाउस कोर्ट से निर्भया के चारों दोषियों के डेथ वारंट जारी कर दिए गए हैं। बुधवार को जेल प्रशासन की ओर से दोषी मुकेश (32), पवन गुप्ता (25), विनय शर्मा (26) और अक्षय कुमार सिंह (31) को डेथ वारंट की कॉपी सौंप दी गई है।
लेकिन, यह पहली बार नहीं है जब एक ही दिन चार दोषियों को मृत्युदंड दिया जाएगा। इससे पहले 1983 में पुणे में सनसनीखेज जोशी-अभयंकर हत्या मामले में चार दोषियों को एक साथ यरवदा केंद्रीय जेल में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। राजेंद्र जक्कल, दिलीप सुतार, शांताराम कन्होजी जगताप और मुनावर हारून शाह को 25 अक्टूबर 1983 को फांसी दी गई थी।
नशे के आदी थे हत्यारे
जोशी-अभयंकर सिलसिलेवार हत्याओं में उन्होंने जनवरी 1976 और मार्च 1977 के बीच 10 हत्याएं की थीं। मामले में आरोपी सुभाष चंडक गवाह बन गया था। हत्यारे पुणे के अभिनव कला महाविद्यालय में वाणिज्यिक कला के छात्र थे। वे सभी नशे के आदी थे और दो पहिया वाहन सवारों से लूटपाट करते थे।
हत्याओं से महाराष्ट्र में छा गई थी दहशत
पहली हत्या 16 जनवरी 1976 को हुई थी। हत्या के शिकार हुए प्रसाद हेडगे कातिलों के सहपाठी थे। उनके पिता कॉलेज के पीछे एक रेस्तरां चलाते थे। हत्यारों ने फिरौती के लिए अपहरण किया था। इन कातिलों ने 31 अक्टूबर 1976 और 23 मार्च 1977 के बीच नौ और लोगों की हत्याएं की। ये लोग घर में घुसकर घरवालों को आतंकित कर महंगा सामान लूटते थे और फिर लोगों की हत्या कर देते थे। इस तरह की हत्याओं से समूचे महाराष्ट्र में दहशत छा गई थी।
शाम 6 बजे के बाद घरों से बाहर नहीं निकलते थे लोग
सहायक पुलिस आयुक्त के तौर पर सेवानिवृत्त हुए शरद अवस्थी भी उस वक्त अदालत में मौजूद थे जब इन कातिलों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने बताया कि मुझे याद है कि जब आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई उस समय अदालत परिसर में भारी भीड़ थी। सजा सुनाए जाने के बाद चारों दोषियों को अदालत से बाहर ले जाया गया।
उस समय किशोर रहे पुणे के सामाजिक कार्यकर्ता बालासाहेब रूनवाल ने कहा कि हत्याओं से लोगों के बीच इतनी दहशत पैदा हो गयी कि लोग शाम छह बजे के बाद घरों से निकलने से कतराने लगे थे।