पूर्व कानून मंत्री ने हिरासत में उत्पीड़न एवं मौतों को रोकने के लिए पीएम को लिखा खत
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पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अश्वनी कुमार ने हिरासत में उत्पीड़न की वजह से होने वाली मौतों को रोकने के लिए उपयुक्त कानून बनाने की माँग को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। देश में इस तरह के मामलों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, लॉ कमीशन ऑफ इंडिया और संसद की चयनित कमेटी भी समय समय पर इस बाबत मजबूत कानून बनाए जाने की पैरवी कर चुकी हैं। डॉ.कुमार ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि अगर सम्भव हो तो संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे पर कोई सार्थक पहल करें।
डॉ.कुमार ने इस विषय को लेकर बीते दिनों प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई अपनी मुलाकात का जिक्र भी इस पत्र में किया है। उन्होंने कहा, मैंने मोदी जी से व्यक्तिगत तौर पर इस मुद्दे को देखने का आग्रह किया था। इसके अलावा 27 मार्च 2018 को भी इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजा गया था। हिरासत में होने वाली मौतों को रोकने के लिए जल्द से जल्द एक सख़्त कानून बनाए जाने की जरूरत है। देश में जब तक यह कानून नहीं बन जाता तब तक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में किया गया वादा पूरा नहीं हो सकता।
पिछले कुछ समय से हिरासत में होने वाली मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसा कोई दिन खाली नहीं जाता, जब हिरासत में उत्पीड़न का मामला दर्ज न किया जाता हो। बढ़ते अपराध और उससे निपटने के कमजोर सिस्टम की आलोचना न केवल देश में, बल्कि दूसरे राष्ट्रों में भी हो रही है। भारत ने 1997 में हिरासत होने में होने वाली मौतों को रोकने के लिए घरेलू स्तर पर ठोस कानूनी व्यवस्था तैयार करने को लेकर यूएन कन्वेनशन अगेन्स्ट टॉर्चर, पर हस्ताक्षर किए थे।तब से लेकर अब तक विश्व के 161 देश इस विषय को लेकर एक कारगर व्यवस्था करने की पुष्टि कर चुके हैं।
जिन देशों ने यूएन को इस मुद्दे पर कुछ करने का भरोसा देने के लिए चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया, उन देशों में भारत, अंगोला, ब्रूनर, कोमरोस, पालन, गम्बिया, हेती और सूडान जैसे देश शामिल हैं। इससे वैश्विक स्तर पर देश का अपमान होता है। डॉ. अश्वनी कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी से इस बाबत जल्द ही कोई कारगर कदम उठाने की माँग की है।