Hindi News ›   India News ›   Former IPS Yashovardhan Azad said - retired bureaucrats should speak fiercely on issues and do not hide his experience from the country

पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद बोले- मुंह बंद न रखें पूर्व नौकरशाह, 'मुद्दों' पर जमकर बोलें, देश से छिपाएं नहीं अपना अनुभव

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 07 Jun 2021 05:24 PM IST

सार

कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, नौकरशाहों को 'विपक्ष' की तरह नहीं बोलना है, बल्कि उन्हें वह अनुभव साझा करना है जो उन्होंने लोगों के बीच से ही अर्जित किया है। सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) अमेंडमेंट रूल्स, 2020 की परवाह न करें...
पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद
पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद - फोटो : Agency
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विस्तार

देश में चारों तरफ से ऐसी आवाजें उठ रही हैं कि शासन-प्रशासन की रीढ़ कहे जाने वाले पूर्व नौकरशाहों को विभिन्न मुद्दों पर बोलना चाहिए। ऐसा नहीं है कि उनके रिटायर होने के बाद लोग उनसे उम्मीद रखना छोड़ देते हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियां हो जाती हैं कि लोगों को किसी ऐसे 'नौकरशाह' की जरूरत महसूस होती है, जो दशकों तक सरकारी सेवा के जरिए उनके मुद्दों से जुड़ा रहा है। कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, पूर्व नौकरशाह अपना मुंह बंद न रखें और 'मुद्दों' पर जमकर बोलें। यहां सरकार के पक्ष में या विपक्ष में बोलने-लिखने की बात नहीं है, आपको केवल मुद्दों पर आधारित बात कहनी है। नौकरशाहों को 'विपक्ष' की तरह नहीं बोलना है, बल्कि उन्हें वह अनुभव साझा करना है जो उन्होंने लोगों के बीच से ही अर्जित किया है। सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) अमेंडमेंट रूल्स, 2020 की परवाह न करें।



बता दें कि देश में कुछ माह से पूर्व नौकरशाहों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। जनता और सिविल सोसायटी की तरफ से ऐसी आवाजें आती रही हैं कि सरकार के विवादित निर्णयों पर पूर्व नौकरशाहों को बोलना चाहिए। सरकार तो खुद के निर्णयों को जायज बताने का प्रयास करेगी ही और विपक्ष उनका विरोध करेगा। ऐसी स्थिति में पूर्व नौकरशाहों से यह उम्मीद की जाती है कि वे लोगों को सच्चाई से अवगत कराएंगे। पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, कई अधिकारी विदेश नीति पर अच्छा बोलते हैं। पुलिस और कानून को लेकर लिखा जाता है। पिछले दिनों पूर्व नौकरशाहों ने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी है। सेंट्रल विस्टा को लेकर सरकार को चेताया गया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और केंद्र सरकार के बीच जो विवाद सामने आया, उस बाबत अनेक पूर्व नौकरशाहों ने सही स्थिति लोगों के सामने रखी है। लक्षद्वीप मामले में जो कुछ हो रहा है, उस बाबत 93 पूर्व आईएएस, आईपीएस और आईएफएस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर के मसले में भी अनेक पूर्व आईएएस और आईपीएस आगे आए थे।

वह आगे कहते हैं कि कई बार ऐसा लगता है कि पूर्व नौकरशाह भी सत्ता व विपक्ष की भांति विभाजित हो जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वे मुद्दे को देखें, न कि विपक्षी मानसिकता को। सरकार अच्छा कर रही है तो उसे भी लोगों को बताएं। चीन के मामले में सरकार ने अच्छा स्टैंड लिया था। अब ये भी तो नहीं है कि नौकरशाहों की हर बात ठीक होगी। सवाल तो उन पर खड़े हो सकते हैं। बतौर आजाद, आप कोविड को ही देख लें। सरकार ने 11 एम्पावर्ड ग्रुप बनाए थे। उनमें सचिव ही तो सारा कामकाज देख रहे थे। बाद में जब कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचाई तो इन समूहों की सलाह, रणनीति और कामकाज पर सवाल उठ खड़े हुए।

दो ही बातों का ध्यान रखें। एक, मुद्दे के आधार पर सरकारी निर्णय का विरोध या समर्थन करें। दूसरा, अब अनुभव अवश्य लिखें। किसी भी नौकरशाह ने जो कुछ कमाया है, वह उसी सामाजिक दायरे में रह कर कमाया गया है। यहां कमाई से मतलब अनुभव है। अब उसे देश से छिपाया क्यों जा रहा है। आप खुल कर बोलें और लिखें। किसी राज्य में स्कूल नहीं है, अस्पताल नहीं हैं, शिक्षक या डॉक्टर नहीं हैं। नौकरशाह जानते हैं कि इसकी वजह क्या है। बजट भी मंजूर हुआ, लेकिन उसके बावजूद लोगों को सुविधाएं नहीं मिल सकी। ऐसे मसलों पर नौकरशाहों को बोलना चाहिए।

पूर्व कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा और पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई ने पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी विवाद में कहा था, यह घटना एक बुरी मिसाल कायम करने वाली है। यह सिविल सर्वेंट्स को हतोत्साहित करेगी। पिल्लई नेपिल्लई ने कहा, 'आजाद भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि रिटायर होने से एक दिन पहले एक सचिव स्तर के अधिकारी को केंद्र में तैनात किया जा रहा है। यह आदेश पूरी तरह से अनियमित है। ऐसा कहना कि सचिव स्तर के अधिकारी को सुबह 10 बजे (किसी दिन विशेष) तक दिल्ली को रिपोर्ट करना होगा, यह अनसुना है। सभी नौकरशाहों के लिए कार्यभार ग्रहण करने का वक्त आम तौर पर छह दिन और यात्रा के समय को मिलाकर होता है। इसी मामले में बीके चतुर्वेदी ने कहा, यह स्पष्ट है कि भारत सरकार का मानना था कि राज्य में बंदोपाध्याय का बने रहना अहम था। अन्यथा उन्हें सेवा विस्तार नहीं दिया जाता। सीएम ममता बनर्जी ने उनके रिटायर होने से पहले आवेदन किया था। यह कानून के शासन में सिविल सर्वेंट्स के भरोसे को खत्म करता है। इस मामले में पीएम को जिसने भी सलाह दी है, वह ठीक से नहीं दी गई।

पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा ने इस मामले में कहा था, यह काफी परेशान करने वाला घटनाक्रम है। सिविल सेवा के युवा अधिकारी इससे हतोत्साहित होंगे। हमें यह समझना चाहिए कि सिविल सर्विस की कल्पना मुख्य रूप से राज्यों में सेवा देने के लिए की गई थी। जो इच्छुक हैं, वे ही केंद्र में आएं। अगर आप एक मिसाल कायम करते हैं कि आप जिससे नाराज हैं, उसे केंद्र में बुलाया जाएगा, तो नौकरशाह कैसे काम करेंगे। उन्होंने बंदोपाध्याय को केंद्र में बुलाए जाने के तरीके पर भी सवाल उठाया। बंदोपाध्याय को केंद्र के आपदा प्रबंधन एक्ट के नोटिस पर, मिश्रा ने कहा कि यह बचकाना है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों एक नया आदेश जारी कर दिया है। इसमें लिखा था, इंटेलीजेंस या सुरक्षा संबंधित किसी संस्थान से रिटायर होने वाले सरकारी कर्मी कोई भी लेख या किताब अपनी मर्जी से प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें अपने संस्थान से पूर्व मंजूरी लेनी होगी, जहां से वे काम करके रिटायर हुए हैं। इससे जुड़ा नोटिफिकेशन मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक ग्रीवेंस एंड पेंशन के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने जारी किया था। एक फॉर्म 26 अंडरटेकिंग के रूप में कर्मी को देना होगा। इसमें यह लिखा है कि अगर रिटायरमेंट के बाद वह अंडरटेकिंग की शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है।
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