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संरक्षण : उत्तराखंड ने दिया देश को तोहफा, पहली बार वनस्पतियों का तैयार किया जा रहा डेटा बैंक

Sat, 05 Jun 2021 03:56 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 05 Jun 2021 03:56 AM IST
सार

ब्रह्म कमल, बर्फ आर्किड, त्रायबाण, बद्री तुलसी सहित 1576 प्रजातियों का किया जा रहा संरक्षण

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For the first time, data bank of flora is being prepared in uttarakhand
सांकेतिक तस्वीर.... - फोटो : google

विस्तार

दुर्लभ जड़ी-बूटी और वनस्पतियों के लिए मशहूर उत्तराखंड में वनस्पतियों के संरक्षण के लिए डाटा बैंक तैयार किया जा रहा है। उत्तराखंड वन विभाग के शोधकर्ताओं ने पहली बार वनस्पतियों के संरक्षण का डाटा बैंक तैयार किया है।

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सके तहत संरक्षण उपायों के माध्यम से वनस्पतियों की कुल 1576 प्रजातियों का संरक्षण किया गया है। इनमें कुछ प्रजातियों को सीटू (जहां प्राकृतिक रूप से हैं) और पूर्व सीटू( सुरक्षित स्थान पर ले जाकर) संरक्षित किया गया है।
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 शोधकर्ताओं ने वनस्पतियों की 1507 प्रजातियों की पहचान की है जो प्राकृतिक संतुलन के लिए अनिवार्य हैं। इनमें से अभी 69 की पहचान होनी बाकी है। शोध के मुताबिक इनमें से कुल 11 प्रजातियां बहुत अधिक दोहन का शिकार हुई हैं, जबकि 20 अभी भी खतरे में हैं, 11 असुरक्षित हैं।
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वहीं, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के वर्गीकरण के अनुसार इन प्रजातियों का आकलन करें तो इनमें से 1 खतरे में हैं, 3 असुरक्षित हैं, और पर्यावरण सूचना प्रणाली- ईएनवाईएस के मुताबिक 4 दुर्लभ हैं, और 5 गंभीर रूप से खतरे में हैं, उत्तराखंड वन विभाग द्वारा संरक्षित की गई प्रजातियों में ब्रह्म कमल, अतिश, रुद्राक्ष, तेजपात, कल्पवृक्ष, सीता अशोक, त्रायबाण, बटरफ्लाई आर्किड, बर्फ आर्किड, हंसराज, लेमनग्रास, बद्री तुलसी प्रमुख हैं।  
 
संरक्षित प्रजातियों में 13 खतरे में
 भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के अनुसार संरक्षित की गई प्रजातियों में 8 खतरे में हैं, 5 संकट में और असुरक्षित हैं। वहीं उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड की सूची के अनुसार 13 खतरे में हैं और 1 गंभीर संकट में हैं। इसी क्रम में भारतीय बायोडायवर्सिटी पोर्टल के अनुसार 2 लुप्तप्राय हैं, 4 असुरक्षित हैं और 3 प्रजातियां दुर्लभ हैं।


इसके अलावा कुल संरक्षित प्रजातियों में से 61 प्रजातियां स्थानिक हैं, जिनमें से 35 स्थानिक के पास हैं,  इसमें 7 प्रजातियां उत्तराखंड के लिए स्थानिक हैं, और 10 प्रजातियां भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए स्थानिक हैं और 9 प्रजातियां पूरे देश में पाई जाती हैं।  इसमें से कुल औषधीय गुणों के कारण 464 प्रजातियों का संरक्षण किया गया हैं।

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