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बंगाल में बीजेपी: आदिवासियों पर निगाहें, सत्ता पर निशाना
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 27 Jul 2018 01:02 AM IST
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अमित शाह
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अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल जीतने के लिए भाजपा आदिवासियों पर दांव लगाने जा रही है। इसकी वजह भी है। बीते पंचायत चुनावों में हिंसा और चुनावी धांधली के तमाम आरोपों के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था और वह दूसरे स्थान पर रही थी।
उसके बाद पुरुलिया में अपने दो कार्यकर्ताओं की हत्या को भी भुनाने में पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीते महीने पहले अमित शाह ने पुरुलिया में रैली की और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेदिनीपुर में रैली की। अमित शाह अगले महीने फिर बंगाल दौरे पर आने वाले हैं।
इसके अलावा पार्टी अब उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी चाय मजदूरों को लुभाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। उसने न्यूनतम मजदूरी की मांग में आंदोलन का फैसला किया है।
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इलाके की लोकसभा की दो और विधानसभा की एक दर्जन सीटों पर बागान मजदूरों के वोट ही निर्णायक हैं। इस साल मार्च में त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाकों की 20 सीटों ने ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था।
पार्टी अब बंगाल में भी त्रिपुरा फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाहती है। उसने अगले साल होने वाले आम चुनावों को सेमी-फाइनल और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को फाइनल कहा है।
बंगाल के आदिवासी वोटर
पश्चिम बंगाल में आदिवासी दशकों से लेफ्ट फ्रंट का वोट बैंक रहे हैं। जलपाईगुड़ी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं मालती विश्वास बताती हैं, "चाय बागानों में ट्रेड यूनियनों के जरिए मजबूत उपस्थिति की वजह से दशकों तक लेफ्ट फ्रंट की तूती बोलती रही है। लेकिन साल 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इन इलाकों में समीकरण बदले हैं।"
"बागानों के लगातार बंद होने, मजदूरों में भुखमरी और आदिवासी इलाकों में विकास नहीं होने की वजह से बढ़ती माओवादी गतिविधियों से आदिवासियों का लेफ्ट फ्रंट से मोहभंग तो वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हो गया था।"
"चाय बागान मजदूरों और आदिवासियों के लिए एकमुश्त दर्जनों योजनाएं शुरू कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन वोटरों का भरोसा हासिल किया था। लेकिन, अब तृणमूल के इस वोट बैंक में भाजपा सेंध लगाने लगी है।"
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उसके बाद पुरुलिया में अपने दो कार्यकर्ताओं की हत्या को भी भुनाने में पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीते महीने पहले अमित शाह ने पुरुलिया में रैली की और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेदिनीपुर में रैली की। अमित शाह अगले महीने फिर बंगाल दौरे पर आने वाले हैं।
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इसके अलावा पार्टी अब उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी चाय मजदूरों को लुभाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। उसने न्यूनतम मजदूरी की मांग में आंदोलन का फैसला किया है।
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इलाके की लोकसभा की दो और विधानसभा की एक दर्जन सीटों पर बागान मजदूरों के वोट ही निर्णायक हैं। इस साल मार्च में त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाकों की 20 सीटों ने ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था।
पार्टी अब बंगाल में भी त्रिपुरा फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाहती है। उसने अगले साल होने वाले आम चुनावों को सेमी-फाइनल और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को फाइनल कहा है।
बंगाल के आदिवासी वोटर
पश्चिम बंगाल में आदिवासी दशकों से लेफ्ट फ्रंट का वोट बैंक रहे हैं। जलपाईगुड़ी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं मालती विश्वास बताती हैं, "चाय बागानों में ट्रेड यूनियनों के जरिए मजबूत उपस्थिति की वजह से दशकों तक लेफ्ट फ्रंट की तूती बोलती रही है। लेकिन साल 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इन इलाकों में समीकरण बदले हैं।"
"बागानों के लगातार बंद होने, मजदूरों में भुखमरी और आदिवासी इलाकों में विकास नहीं होने की वजह से बढ़ती माओवादी गतिविधियों से आदिवासियों का लेफ्ट फ्रंट से मोहभंग तो वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हो गया था।"
"चाय बागान मजदूरों और आदिवासियों के लिए एकमुश्त दर्जनों योजनाएं शुरू कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन वोटरों का भरोसा हासिल किया था। लेकिन, अब तृणमूल के इस वोट बैंक में भाजपा सेंध लगाने लगी है।"
बीजेपी
भाजपा का प्रदर्शन
हाल के पंचायत चुनावों में आदिवासी इलाकों में भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। उसने इन इलाकों में ग्राम पंचायतों की कई सीटें जीती हैं और कई जगह तृणमूल कांग्रेस के साथ उसका फासला काफी कम हुआ है।
मिसाल के तौर पर कभी माओवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात रहे झाड़ग्राम और पुरुलिया में भाजपा ने क्रमशः 42 और 33 फीसदी सीटें जीती हैं जबकि पूरे राज्य में उसकी जीत का औसत 18 फीसदी है। इन दोनों इलाकों में आदिवासियों की आबादी क्रमशः 30 और 20 फीसदी है।
सीटों की तादाद
उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में लोकसभा की दो और विधानसभा की कम से कम एक दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां चाय बागान मजदूरों के वोटों से ही हार-जीत तय होती है।
इसी तरह दक्षिण बंगाल के आदिवासी-बहुल जिलों में लोकसभा की कम से कम चार और विधानसभा की 20 सीटों पर आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा की निगाहें इन सीटों पर ही हैं। भाजपा ने साल 2016 के विधानसभा चुनावों में अलीपुरद्वार जिले की एक आदिवासी-बहुल मदारीहाट सीट जीती थी।
यहां के भाजपा विधायक मनोज तिग्गा कहते हैं, "अब हम तमाम आदिवासी-बहुल इलाकों में यही करिश्मा दोहराना चाहते हैं। तृणमूल कांग्रेस से आदिवासियों का मोहभंग हो चुका है।" तिग्गा बताते हैं कि लेफ्ट फ्रंट से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक तमाम सरकारों ने आदिवासियों को खोखले आश्वसान देने के अलावा कुछ नहीं किया है।
पंचायत चुनावों की कामयाबी
अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए पार्टी इसलिए एक ओर जहां चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की मांग में आंदोलन करने की रणनीति बना रही है।
वहीं, आने वाले दिनों में कई केंद्रीय नेताओं के भी इन इलाकों के दौरे का कार्यक्रम तय किया जा रहा है। भाजपा को आदिवासी इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और उसके मजबूत नेटवर्क का भी फायदा मिल रहा है।
संघ वहां आदिवासी बच्चों के लिए कई स्कूल चला रहा है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "भाजपा को हमेशा संघ के कामकाज का फायदा मिला है। उसके नेटवर्क के सहारे पार्टी आदिवासी इलाकों में अपने पांव मजबूत करने की रणनीति पर बढ़ रही है। पार्टी बंगाल में सरकार बनाए बिना चैन से नहीं बैठेगी। हम पंचायत चुनावों की कामयाबी को जारी रखना चाहते हैं।"
हाल के पंचायत चुनावों में आदिवासी इलाकों में भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। उसने इन इलाकों में ग्राम पंचायतों की कई सीटें जीती हैं और कई जगह तृणमूल कांग्रेस के साथ उसका फासला काफी कम हुआ है।
मिसाल के तौर पर कभी माओवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात रहे झाड़ग्राम और पुरुलिया में भाजपा ने क्रमशः 42 और 33 फीसदी सीटें जीती हैं जबकि पूरे राज्य में उसकी जीत का औसत 18 फीसदी है। इन दोनों इलाकों में आदिवासियों की आबादी क्रमशः 30 और 20 फीसदी है।
सीटों की तादाद
उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में लोकसभा की दो और विधानसभा की कम से कम एक दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां चाय बागान मजदूरों के वोटों से ही हार-जीत तय होती है।
इसी तरह दक्षिण बंगाल के आदिवासी-बहुल जिलों में लोकसभा की कम से कम चार और विधानसभा की 20 सीटों पर आदिवासी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा की निगाहें इन सीटों पर ही हैं। भाजपा ने साल 2016 के विधानसभा चुनावों में अलीपुरद्वार जिले की एक आदिवासी-बहुल मदारीहाट सीट जीती थी।
यहां के भाजपा विधायक मनोज तिग्गा कहते हैं, "अब हम तमाम आदिवासी-बहुल इलाकों में यही करिश्मा दोहराना चाहते हैं। तृणमूल कांग्रेस से आदिवासियों का मोहभंग हो चुका है।" तिग्गा बताते हैं कि लेफ्ट फ्रंट से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक तमाम सरकारों ने आदिवासियों को खोखले आश्वसान देने के अलावा कुछ नहीं किया है।
पंचायत चुनावों की कामयाबी
अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए पार्टी इसलिए एक ओर जहां चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और दूसरी मूलभूत सुविधाओं की मांग में आंदोलन करने की रणनीति बना रही है।
वहीं, आने वाले दिनों में कई केंद्रीय नेताओं के भी इन इलाकों के दौरे का कार्यक्रम तय किया जा रहा है। भाजपा को आदिवासी इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं और उसके मजबूत नेटवर्क का भी फायदा मिल रहा है।
संघ वहां आदिवासी बच्चों के लिए कई स्कूल चला रहा है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "भाजपा को हमेशा संघ के कामकाज का फायदा मिला है। उसके नेटवर्क के सहारे पार्टी आदिवासी इलाकों में अपने पांव मजबूत करने की रणनीति पर बढ़ रही है। पार्टी बंगाल में सरकार बनाए बिना चैन से नहीं बैठेगी। हम पंचायत चुनावों की कामयाबी को जारी रखना चाहते हैं।"
lok-sabha
खतरे की घंटी
घोष पंचायत चुनावों को तृणमूल कांग्रेस के अंत की शुरुआत बताते हैं। वह कहते हैं, "लालगढ़ आंदोलन के बाद आदिवासियों के समर्थन से ही ममता सत्ता में आई थीं। लेकिन, अब ममता और उनकी पार्टी से आदिवासियों का मोहभंग हो गया है और वे भाजपा का समर्थन कर रहे हैं।" उन्होंने बताया कि पार्टी आदिवासी इलाकों में युवा नेतृत्व को बढ़ावा देकर अपना संगठन मजबूत करने पर खास जोर दे रही है।
पंचायत चुनावों में आदिवासी-बहुल इलाकों में भाजपा के प्रदर्शन ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। यही वजह है कि नतीजों के फौरन बाद ममता बनर्जी ने आदिवासी कल्याण मंत्री समेत अपने तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया।
उन्होंने सीपीएम से निष्कासित सांसद ऋत्तब्रत बनर्जी की अगुवाई में एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर दिया है इसमें आदिवासियों के कई प्रतिनिधि शामिल हैं।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "मंत्रियों को हटाने और नई समिति बनाने से साफ है कि तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व सदमे में है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "पंचायतों की कुछ सीटें जीतने का कोई मतलब नहीं है।"
"लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे और समीकरण एकदम अलग होते हैं। राज्य के लोग ममता बनर्जी और उनकी नीतियों के साथ हैं।" जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, "भाजपा नेतृत्व फिलहाल आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने और तृणमूल कांग्रेस के साथ फासला कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।"
"हाल के तमाम चुनावों और उपचुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट को पीछे धकेल कर वह दूसरे नंबर पर तो पहले ही काबिज हो चुकी है। अब उसका मकसद तृणमूल कांग्रेस के साथ अपने फासले को धीरे-धीरे पाटना है।"
घोष पंचायत चुनावों को तृणमूल कांग्रेस के अंत की शुरुआत बताते हैं। वह कहते हैं, "लालगढ़ आंदोलन के बाद आदिवासियों के समर्थन से ही ममता सत्ता में आई थीं। लेकिन, अब ममता और उनकी पार्टी से आदिवासियों का मोहभंग हो गया है और वे भाजपा का समर्थन कर रहे हैं।" उन्होंने बताया कि पार्टी आदिवासी इलाकों में युवा नेतृत्व को बढ़ावा देकर अपना संगठन मजबूत करने पर खास जोर दे रही है।
पंचायत चुनावों में आदिवासी-बहुल इलाकों में भाजपा के प्रदर्शन ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। यही वजह है कि नतीजों के फौरन बाद ममता बनर्जी ने आदिवासी कल्याण मंत्री समेत अपने तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटा दिया।
उन्होंने सीपीएम से निष्कासित सांसद ऋत्तब्रत बनर्जी की अगुवाई में एक आदिवासी कल्याण समिति का गठन कर दिया है इसमें आदिवासियों के कई प्रतिनिधि शामिल हैं।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "मंत्रियों को हटाने और नई समिति बनाने से साफ है कि तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व सदमे में है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "पंचायतों की कुछ सीटें जीतने का कोई मतलब नहीं है।"
"लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे और समीकरण एकदम अलग होते हैं। राज्य के लोग ममता बनर्जी और उनकी नीतियों के साथ हैं।" जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चौधरी कहते हैं, "भाजपा नेतृत्व फिलहाल आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने और तृणमूल कांग्रेस के साथ फासला कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।"
"हाल के तमाम चुनावों और उपचुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट को पीछे धकेल कर वह दूसरे नंबर पर तो पहले ही काबिज हो चुकी है। अब उसका मकसद तृणमूल कांग्रेस के साथ अपने फासले को धीरे-धीरे पाटना है।"