MGNREGA: 'इसे हटाओ नहीं, इसमें सुधार करो', मनरेगा पर 350 से ज्यादा विशेषज्ञों की केंद्र सरकार को खुली चिट्ठी
मनरेगा को खत्म करने के प्रस्ताव के खिलाफ 350 से ज्यादा शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार को खुला पत्र लिखा है। उन्होंने कहा है कि मनरेगा की कमियां दूर की जाएं, न कि उसे रद्द किया जाए।
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ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना मनरेगा को लेकर देश में बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा को हटाकर नई योजना लाने की चर्चा के बीच 350 से ज्यादा वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार को खुला पत्र लिखकर साफ कहा है कि मनरेगा को खत्म नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसकी कमियों को दूर किया जाना जरूरी है।
खुले पत्र में कहा गया है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा को रद्द कर उसकी जगह विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून लाने का तर्क कमजोर है। पत्र में बताया गया है कि मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसका मांग आधारित स्वरूप है, जो गरीबों को काम मांगने का कानूनी अधिकार देता है।
मांग आधारित व्यवस्था क्यों जरूरी?
खुले पत्र में कहा गया है कि मनरेगा एक अधिकार आधारित योजना है। यह गरीबों को न सिर्फ रोजगार मांगने का हक देती है, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को भी मजबूत करती है। इससे हाशिये पर खड़े लोग अपनी बात रख पाते हैं और अल्पसंख्यकों की आवाज सुनी जाती है। इसके उलट नई प्रस्तावित योजना का ढांचा ऐसा है, जो ऊपर से तय नियमों पर चलता है और गरीबों पर ही यह बोझ डाल देता है कि वे साबित करें कि उन्हें क्या चाहिए।
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जमीनी जवाबदेही का आधार
पत्र में कहा गया है कि कई अध्ययनों से साबित हुआ है कि मनरेगा ने गरीबों को प्रशासन से जवाबदेही मांगने का आधार दिया है। इससे गांव के ताकतवर लोगों के सामने बराबरी की भावना बनी है और समुदाय के भीतर आपसी सम्मान बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई योजना का तयशुदा ढांचा इस पूरी प्रक्रिया को कमजोर कर देगा।
तकनीक से समस्या हल नहीं होगी
खुले पत्र में यह भी कहा गया है कि काम में गड़बड़ी, मशीनों के इस्तेमाल और डिजिटल हाजिरी जैसी समस्याओं को केवल नई तकनीक से हल नहीं किया जा सकता। नई योजना में एनएमएमएस ऐप, जियोटैगिंग और बायोमेट्रिक सिस्टम को और सख्त बनाने की बात है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि गांवों के लोग इतनी जटिल प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते और ग्राम सभाओं में अपनी मांग तक सही ढंग से नहीं रख पाते।
मनरेगा खेती का विकल्प नहीं
इस तर्क को भी गलत बताया गया कि मनरेगा खेती के मौसम में मजदूरों की कमी पैदा करता है। पत्र में कहा गया है कि मनरेगा की मजदूरी दर कृषि मजदूरी से 40 से 50 प्रतिशत तक कम होती है। मनरेगा कोई स्थायी रोजगार नहीं, बल्कि तब का सहारा है, जब खेती का काम नहीं मिलता या शोषणकारी होता है।
फंडिंग और रोजगार के दावे पर सवाल
खुले पत्र में कहा गया है कि नई योजना में खर्च का बोझ राज्यों पर डालने से राजनीतिक भेदभाव बढ़ सकता है। राज्य सरकारें खर्च से बचने के लिए काम की मांग दबा सकती हैं, जिससे बेरोजगारी और पलायन बढ़ेगा। पत्र में यह भी कहा गया है कि 125 दिन रोजगार देने का वादा भ्रामक है, क्योंकि मौजूदा बजट में भी औसतन 50 दिन ही रोजगार मिल पा रहा है।
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