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Republic Day: 1952 में हुआ था पहला चुनाव, खामोशी से रचा गया इतिहास, पढ़ें यह खास रिपोर्ट

Thu, 26 Jan 2023 06:11 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Thu, 26 Jan 2023 06:11 AM IST
सार

रघुवीर सहाय ने बरसों पहले पूछा था- राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य-विधाता है, फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है।' सवाल अब भी मौजूं है और जवाब तलाशना इतना मुश्किल भी नहीं। भाग्य-विधाता हैं वे तमाम लोग जो अपने-अपने क्षेत्रों में ईमानदारी और समर्पण के साथ काम करते हुए इस देश को आगे ले जाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन तमाम भाग्य-विधाताओं ने मिलकर इतने वर्षों में गणतंत्र का जो वट वृक्ष तैयार किया है, उसकी नींव में है 1952 का पहला चुनाव। वही मील का वह पहला पत्थर है जहां से सफर शुरू करते हुए हमने तमाम पड़ाव पार किए हैं। पहले आम  चुनाव पर संतोष शुक्ला की यह रिपोर्ट कई दिलचस्प तथ्यों से अवगत कराते हुए इस देश की अब तक की लोकतांत्रिक यात्रा को समझने में हमारी मदद करती है।

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first election was held in 1952, history was created silently, read this special report
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

1952 के आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र का पहला पड़ाव

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तकनीक ने आज भले ही चुनावी प्रक्रिया की  तमाम जटिलताओं को खत्म कर दिया हो लेकिन  कभी यह सब इतना आसान नहीं था। गणतंत्र बनने के बाद का पहला आम चुनाव तो मतदाताओं के साथ व्यवस्था के लिए भी खासा चुनौती भरा था। राजनीतिक दलों के साथ निर्वाचन आयोग के पास भी मतदाताओं तक पहुंचने के साधन सीमित थे। फिर, तकरीबन 85 फीसदी मतदाता शिक्षित भी नहीं थे।

इन सीमाओं के अलावा सब कुछ नया और पहली बार हो रहा था। इसने ढेर सारी आशंकाएं खड़ी कर दी थीं। लेकिन, करीब 61.16 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर  मिसाल कायम की। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद खुद नेहरू ने स्वीकार किया था, 'तथाकथित अशिक्षित मतदाता के प्रति मेरा सम्मान बढ़ गया है। उन्होंने सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के प्रति मेरी हर आशंका को गलत साबित किया है।'
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17.32 करोड़ मतदाता
चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पहले आम चुनाव में करीब 17.32 करोड़ मतदाता थे। इसमें 85 फीसदी मतदाता साक्षर नहीं थे। सूची तैयार करने के लिए करीब 16,500 लोगों को छह महीने के अनुबंध पर रखा गया था। घर-घर जाकर वोटर का नाम ढूढ़ना काफी मुश्किल भरा काम था। इसमें कई बार यह होता कि शहर और मोहल्ले में जिनकी पकड़ थी, उनसे पूछ लिया गया और उन्होंने जिसके नाम की पहचान कर ली, उसका नाम मतदाता सूची में डाल दिया गया।

महिलाओं में झिझक...
पहले चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करना आसान नहीं था। महिला मतदाता तो अपना नाम तक बताने में झिझकती थीं। राजनीति परिवार से ताल्लुक रखने वाले रंजीत शास्त्री बताते हैं कि उस वक्त तो महिलाएं अपना नाम तक नहीं लेती थीं। कई महिलाओं को तो शायद याद भी नहीं था। वह खुद को अपने किसी बेटी-बेटे की मां, किसी की पत्नी कहलाना अधिक पंसद कर रही थीं।

दिल्ली में 16 गुना बढ़े मतदाता
लोस के पहले आम चुनाव से लेकर 16वें चुनाव तक दिल्ली में मतदाताओं की संख्या 16 गुना बढ़  गई है। इस बीच सीटों की संख्या तीन से बढ़कर सात हुई है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1951 मेें दिल्ली में कुल 7,44,668 मतदाता थे जबकि इस बार 16वीं लोकसभा के लिए राजधानी में 1,20,60,493 मतदाता। दिलचस्प यह कि शुरुआती दो आम चुनावों 1951 व 1957 में दिल्ली की आउटर दिल्ली नामक एक सीट डबल मेंबर सीट थी।
 

चुनाव प्रचार भी बेहद मुश्किल
आज जिस तरह सोशल मीडिया से लेकर दूसरे प्रचार माध्यमों के जरिए घर-घर तक पहुंचना संभव हो सका है, वह पहले आम चुनाव में कतई संभव नहीं था। उस वक्त तो झंडा, बिल्ला व बैनर भी नहीं मिल पाते थे। कभी भाजपा के थिंक टैंक रहे केएन गोविंदाचार्य बताते हैं कि समर्थक जिस पार्टी के होते थे, उसका झंडा बनाने के लिए तब लोग अपना गमछा व धोती तक रंग लेते थे। सबके पास साइकिल भी नहीं होती थी। लोग पैदल ही गांव-गांव टहलते रहते थे। नेता ज्यादातर नुक्कड़ सभाएं लगाते थे। उसमें भी तीस चालीस लोग ही शिरकत करते।

-इस बारे में राधे श्याम गुप्ता बेहद मार्मिक कहानी बयां करते हैं। बकौल गुप्ता, उस वक्त मेरे पिताजी की मौत हो गई थी। मां सफेद रंग की धोती पहनती थी। वह सिलाई का काम भी जानती थी। हम लोग मां की धोती को रंग देते और उनसे गुजारिश कर उसका एक हिस्सा सिलवा लेते। यह डंडा फंसाने के काम आता। प्रचार के दौरान यही धोती झंडे का काम करती थी।
 

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पेटियों के रंग से पार्टी की पहचान
चूंकि देश में साक्षरता कम थी, इसलिए चुनाव आयोग ने इसका तरीका यह निकाला कि हर पार्टी के लिए अलग-अलग मतपेटी बना दी। इस पर संबंधित पार्टी के चुनाव निशान लिखे थे और जिस पार्टी की पेटी थी, उसे उसी रंग में रंग दिया गया था। अमेरिकी दूतावास के पूर्व राजनीतिक सलाहकार और चुनावी राजनीति के जानकार दिनेश दुबे बताते हैं कि पहले चुनाव में मत पेटियां रंगों से पहचानी गईं। 

कांग्रेस की पेटी सफेद थी, कम्युनिस्ट पार्टी की लाल व जनसंघ को केसरिया। निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए अलग रंग की पेटियों का इंतजाम किया गया। आज की तरह मतदान पत्र पर नाम और चिन्ह नहीं थे। हर मतदान केंद्र पर मतपेटियां रखी रहती थीं, जिस पर पार्टी का चुनाव चिन्ह बना होता था और मतदाताओं को उसमें अपना मत डालना पड़ता था। 

नकली मतदाताओं से बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी स्याही बनाई थी जो मतदाता की उंगली पर एक सप्ताह के लिए बनी रहती थी। पूरे मतदान के लिए लोहे की करीब 2.12 करोड़ मतपेटियां बनाई गई थीं और करीब 62 करोड़ मतपत्र छापे गए थे। चुनाव करवाने के लिए करीब 56,000 पीठासीन अधिकारी नियुक्त किए गए थे। इनकी मदद के लिए 2.28 लाख सहायकों और 2.24 लाख पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

पकड़ा गया झूठ
चांदनी चौक के राधे श्याम गुप्ता की उम्र इस वक्त करीब 95 साल है। पहले आम चुनाव का जिक्र छेड़ते ही वह मुसकराने लगे।  पुराने दिनों की याद करते हुए कहते हैं  एक बार हम बच्चों को नेहरू जी से मुलाकात के लिए त्रिमूर्ति भवन ले जाया गया। नेहरू जी ने हमसे पूछा, 'आपका प्रधानमंत्री आपको कैसा लग रहा है?’ हमने भी तपाक से जवाब दिया, ‘बहुत अच्छा।’ अगला सवाल किया, ‘आगे क्या बनना चाहते हो? ‘बोलना तो मैं उनका नाम ही चाहता था, लेकिन नाम ले नहीं सका। तो किसी और नाम बोल दिया। शायद वह हमारे मन की बात समझ गए थे और मुसकराते हुए कहा कि झूठ क्यों बोल रहे हो? जो मन में है, वह बोलो।’ तब जाकर उनका नाम ले सका। उन्होंने पीठ थपथपाई और कभी भी झूठ न बोलने की सलाह भी दी।
 

पहले चुनाव के साक्षी
पहले चुनाव की बात छिड़ते ही जिले के तमाम बुजुर्गों की आखें चमकने लगती हैं। वह गर्व से भर जाते हैं और जरा सा कुरेदने पर ही उन दिनों की बातें सुनाने लगते हैं...

प्रत्याशी निभाते थे वादे
नोएडा के असगरपुर गांव निवासी बुजुर्ग चेतराम अवाना (92) बताते हैं कि पहले नेता जो वादा करके जाते थें उनको हर हाल में पूरा कराते थें। चुनाव प्रचार के लिए एक या दो बार ही आते थे। कई बार तो रिश्तेदार ही बता देते थे कि फला नेता के पक्ष में मतदान करना है। उन्हीं के कहने पर एक-दो व्यक्ति नहीं बल्कि गांव के गांव एक ही नेता को वोट दे देते थें। एक जगह पर 10-12 गांवों का मतदान कराया जाता था। चूंकि भदी भी कम थी और जागरूकता की कमी थी। उन्होंने बताया कि गौतमबुद्घ नगर (दादरी क्षेत्र) राजनीति का गढ़ हुआ करता था। यहां गुर्जर नेता रामचंद्र विकल ने 1952 में पहला चुनाव 2000 रुपये के चंदे से लड़ा था और उन्होंने अपने वरिष्ठ नेता के लिए मुख्यमंत्री पद का त्याग कर दिया था। अब तो नेता पद पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

मारे खुशी के नींद नहीं आई
फरीदाबाद के गांव ददसिया निवासी 90 वर्षीय बुजर्ग सत्यवती ने बताया कि 1952 के चुनाव के दौरान पूरे गांव में जश्न का माहौल था। गांव में बाकायदा चौपाल पर चुनाव को लेकर बातचीत होती थी। लड़खड़ाते शब्दों में उन्होंने बताया कि गांव से तीन किलोमीटर दूर तिगांव के सरकारी स्कूल में मतदान केंद्र बनाया गया था। अगले दिन मुझे वोट डालने जाना था। इस खुशी में पूरी रात नींद नहीं आई थी। अगले दिन अल सुबह उठकर जल्दी खाना बनाने के साथ वोट डालने के लिए बैलगाड़ी में बैठ गई। वोट डालने के बाद जो जश्न मनाया था, वह आज भी आंखों में बसा हुआ है।

तब इतना हो हल्ला नहीं था
फरीदाबाद के एनआईटी निवासी 89 वर्षीय सरला देवी काफी बुजुर्ग होने के कारण अब थोड़ा कम सुन पाती हैं। आजादी के बाद पहले चुनाव में वोट डालने की बात छेड़ने पर उनके चेहरे पर उदासी घर कर जाती है। पुराने जख्म ताजा हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि आजादी के चार माह बाद पाकिस्तान छोड़कर उन्हें आना पड़ा। भारत पहुंचे शरणार्थियों को ओल्ड फरीदाबाद रेलवे स्टेशन के समीप स्थित 10 नंबर भट्ठे के पास टेंट में जगह दी गई। उस समय चुनाव चिन्ह आज के जैसे नहीं होते थे और न इतना हो-हल्ला होता था। देशभक्ति गीतों से ओतप्रोत चुनाव के गीत बजते थे। उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी, कम्युनिस्ट पार्टी का दरांती- गेहूं के फसल की बाली थी। बैलेट पेपर मिलता था। उसे डिब्बे में डालते थे। जिसके ज्यादा वोट होते थे, उसी को जीता मान लेते थे। ये मेरे और परिवार के बुजुर्गों के लिए यादगार क्षण था। मतदान केंद्र ओल्ड फरीदाबाद के सरकारी स्कूल में बनाया गया था।

जेब नहीं जमीर अहम था
उस वक्त सदर बाजार में व्यवसाय करने वाले गुरुग्राम के सच्चिदानंद शर्मा बताते हैं कि पहले चुनाव के समय वह करीब 22 वर्ष के थे। उस वक्त माहौल दूसरा था। देश को कांग्रेस ने आजादी दिलाई थी। पढ़े लिखे लोग बहुत कम थे। गरीबी ज्यादा थी। जनसंघ का अस्तित्व तो था, मगर लोग कांग्रेस को ज्यादा जानते थे।
सच्चिदानंद बताते हैं कि उन्होंने पहले चुनाव से लेकर अब तक हर चुनाव में वोट दिया है। तब लोगों में लोकतंत्र और अपनी सरकार को लेकर बहुत उत्साह होता था। आज का चुनाव सिर्फ खर्च पर टिका है। पहले प्रत्याशी की जेब नहीं उसका चेहरा और जमीर देखा जाता था।

भाड़े की भीड़ नहीं थी
गुरुग्राम के सिविल लाइंस में रहने वाली शिक्षाविद् डा. आशा शर्मा बताती हैं कि वर्ष 1952 में जब पहले आम चुनाव हुए तब वह 9 वर्ष की थीं, मगर मेरे सभी भाई बहन मुझसे बड़े थे। पूरा परिवार चुनाव के दौरान सक्रिय होता था। उनका परिवार राजनीति से जुड़ा हुआ परिवार था। गुरुग्राम बहुत छोटा सा कस्बा था।  चुनाव को लेकर बहुत उत्साह तो था, मगर तब आज की तरह रैलियां नहीं होती थी। किसी नेता को सुनने के लिए भाड़े की भीड़ नहीं होती थी। लोग खुद-ब-खुद अपने नेता के भाषण सुनने के लिए जाते थे। कांग्रेस का निशान बैलों की जोड़ी था और इसके बैच बनाकर हम बच्चों को लगा दिया जाता था।  
 

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