मानसून की देरी से खेती का काम पिछड़ा, किसान चिंतित
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मानसून की देरी से इस बार जिले में खेती का काम पिछड़ गया है। पिछले साल इस समय तक खरीफ बोनी का काम लगभग पूरा हो चुका था। लेकिन इस बार अब तक इसकी शुरुआत नहीं हो सकी है। किसानों की टकटकी आसमान की ओर लगी है। आषाढ़ में भी बारिश नहीं होने से किसान सहित आम लोगों को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। लोगों का उमस व गर्मी से जीना दूभर हो गया है। बारिश नहीं होने से किसानों का बोनी का काम पिछड़ता जा रहा है। जिसको लेकर किसान चिंतित नजर आ रहे है।
मेवात में लगभग 80 प्रतिशत किसान बारिश पर निर्भर है। इसके कारण बारिश में विलंब होने से खेती के लिए मानसूनी बारिश पर निर्भर किसानों की चिंता बढ़ती जा रही है। पिछले वर्ष खरीफ सीजन में इस समय तक बोनी लगभग पूरी हो चुकी थी। पर इस बार मौसम की बेरुखी के चलते अभी तक खेतों की जुताई का काम भी पूरा नहीं हो सका है।
हालांकि जून महीनें में कहीं कहीं बूंदाबांदी और बौछारें जरूर पड़ी। लेकिन इसके बाद से बारिश का पता नहीं चला। इसके चलते क्षेत्र में कृषि कार्य प्रभावित हो गया है। किसान मानसून का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। हाजी उसमान, अख्तर अली, जमालुदीन, असगर, फारूक, रामसिंह, बाबूराम, रोहताश आदि किसानों का कहना है कि अक्सर आधा आषाढ तक बुवाई का काम हो जाता था। पर इस साल गर्मी व बारिश के अभाव के चलते अभी खेतों की मेढ़बंदी, खरपतवार सफाई और जुताई का काम भी नहीं हो पा रहा है। बारिश के कोई आसार भी नहीं दिख रहे। ऐसे में खेती पिछड़ रही है। जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
मानसून की प्रगति में शिथिलता के कारण देश में खरीफ फसलों की बुवाई की रफ्तार भी धीमी है। अब तक खरीफ का रकबा 234.33 लाख हेक्टेयर पहुंचा है जो पिछले साल के मुकाबले 27 प्रतिशत पीछे चल रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल इस मौसम में अब तक 319.68 लाख हेक्टेयर में फसल बोयी जा चुकी थी। मौसम विभाग के अनुसार इस साल बारिश सामान्य से 33 प्रतिशत कम हुई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत भी कुछ देर से हुई है। मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई-अगस्त में बारिश अच्छी रहेगी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार खरीफ की मुख्य फसल धान की बुवाई पिछले सप्ताह के अंत तक 52.47 लाख हेक्टेयर हुई जबकि पिछले साल इसी दौरान धान का रकबा 68.60 लाख हेक्टयेर तक पहुंच गया था। छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में धान की बुवाई पिछड़ी है।
खरीफ की दलहनों की बुवाई भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। अब तक इसका रकबा 7.94 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंच सका है जबकि पिछले साल अब तक यह 27.91 लाख हेक्टेयर था। इसी तरह मोटे अनाज का रकबा भी एक साल पहले के 50.65 लाख हेक्टेयर की तुलना में अब तक 37.37 लाख हेक्टेयर ही पहुंचा है।
इस दौरान मुंगफली, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों की बुवाई भी पिछड़ी हुई है। इनका रकबा 34.02 लाख हेक्टेयर ही पहुंच सका है जबकि पिछले साल अब तक 59.37 लाख हेक्टेयर तिलहनी फसल बोयी गयी थी। गन्ने की बुवाई में हल्की गिरावट देखी गयी है। यह पिछले साल के 51.41 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक ही पहुंची है।
इसी तरह से कपास और पटसन की बवाई भी कम बारिश से प्रभावित हो रही है। कपास का रकबा 54.60 लाख हेक्टेयर की तुलना में अभी 45.85 लाख हेक्टेयर ही है। सरकार ने खरीफ की 14 अधिसूचित फसलों की न्यूनतम समर्थन कीमतों में महत्वपूर्ण वृद्धि की है।