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Monsoon Session: संसद सत्र के लिए सरकार के साथ किसान भी तैयार, जगदीप धनखड़ की दावेदारी से कमजोर नहीं पड़ेगा किसानों का आंदोलन
सार
इस बार किसान आंदोलन में युवाओं को भी जोड़ने की रणनीति पर काम हो रहा है। किसानों को लगता है कि अग्निपथ योजना के कारण युवाओं के रोजगार के संकट खत्म नहीं हुए हैं। युवा मतदाता भाजपा के सबसे बड़े समर्थक साबित हुए थे, लेकिन माना जा रहा है कि अग्निपथ योजना के बाद युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी है।
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संसद भवन
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सोमवार 18 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र के लिए सरकार के साथ-साथ किसान भी तैयार हैं। जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर भाजपा ने किसान आंदोलन के शुरू होने से पहले ही उसकी हवा निकालने की कोशिश की है, लेकिन किसानों का मानना है कि जगदीप धनखड़ देश के किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते और उनको उपराष्ट्रपति बनाने से किसानों की समस्याएं खत्म नहीं होने वाली हैं, लिहाजा संसद सत्र की शुरूआत से ही उनका आंदोलन भी पूरे जोरशोर से चलेगा और अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कामयाब रहेगा। 18 जुलाई से ही किसानों का पूरे देश में प्रदर्शन शुरू होगा तो 31 जुलाई को रास्ता रोको कार्यक्रम होगा।
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इस बार संयुक्त किसान मोर्चा के घटकों में आपस में ही फूट पड़ गई है और मोर्चा दो अलग-अलग धड़ों में बंट गया है। माना जा रहा है कि इस कारण इस बार किसान आंदोलन पिछली बार की तरह प्रभावी नहीं होगा और सरकार को झुकाने में कामयाब नहीं होगा। किसानों का मानना है कि पिछली बार के किसान आंदोलन में भी अनेक किसान नेता अलग-अलग कारणों से आंदोलन से अलग हो गए थे, लेकिन इसके बाद भी आंदोलन अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में कामयाब रहा।
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पिछला अनुभव आएगा काम
पिछली बार के अनुभव के कारण इस बार उनका आंदोलन कहीं ज्यादा व्यवस्थित और रणनीति से भरा होगा। किसानों का यह भी मानना है कि पिछली बार उनके पास सरकार की वादा खिलाफी को जनता के सामने रखने के लिए उनके पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था, जबकि इस बार उनके पास सरकार के वे वायदे हैं जिन्हें पूरा करने में वह नाकाम रही है। लिहाजा इन मुद्दों को जनता के सामने रखा जाएगा और सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की जाएगी। फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के लिए प्रस्तावित कमेटी पर अब तक कोई काम नहीं हुआ है। किसानों को लगता है कि सरकार की यह नाकामी जनता के बीच प्रमुख मुद्दा बनकर उभरेगा।
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युवाओं के साथ का भरोसा
इस बार किसान आंदोलन में युवाओं को भी जोड़ने की रणनीति पर काम हो रहा है। किसानों को लगता है कि अग्निपथ योजना के कारण युवाओं के रोजगार के संकट खत्म नहीं हुए हैं। युवा मतदाता भाजपा के सबसे बड़े समर्थक साबित हुए थे, लेकिन माना जा रहा है कि अग्निपथ योजना के बाद युवाओं में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी है। ऐसे में यदि किसान आंदोलन को युवाओं का साथ मिला तो 2024 के आम चुनाव से पूर्व भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। आम चुनाव से पहले इस साल से लेकर अगले वर्ष तक 11 राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें भी भाजपा को नुकसान हो सकता है।
पिछली बार झुकाया, इस बार सरकार गिराएंगे: किसान
किसान नेता अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि सरकारों के पास बड़ा तंत्र होने के बाद भी वे केवल चार-छह पार्टियों को साथ लेकर नहीं चल पाते, जबकि उनके आंदोलन में देश के अलग-अलग हिस्सों से 40 से ज्यादा संगठन साथ आकर काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस बार सरकार के खिलाफ हमारे पास बड़ा जनसमर्थन होने की उम्मीद है। उन्हें लगता है कि महंगाई से परेशान जनता, बेरोजगारी से परेशान युवा और सांप्रदायिक नीतियों से परेशान लोग उसके साथ आएंगे और सरकार को उनकी बात माननी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि पिछली बार सरकार को झुकाकर आंदोलन खत्म हुआ था, जबकि इस बार सरकार को गिराकर उनका आंदोलन समाप्त होगा।
राजनीतिक होने के आरोप
पिछली बार किसान आंदोलन पर राजनीतिक होने के आरोप लगे थे। भाजपा शुरू से इस आंदोलन को विपक्षी दलों के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम बता रही थी। आंदोलन समाप्त होने के बाद प्रमुख किसान नेता योगेंद्र यादव ने एक बातचीत में कहा था कि उन्होंने आंदोलन के जरिए पिच तैयार की थी, लेकिन विपक्षी दल इस पिच का लाभ उठाने में कामयाब नहीं हो पाए। इस बार भी आंदोलन के शुरू होने से पहले इसके 2024 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए सरकार विरोधी कार्यक्रम बताने की शुरूआत हो चुकी है।
हालांकि, किसानों की नाराजगी के बाद भी भाजपा पांच में से चार राज्यों में जीत हासिल करने में कामयाब रही थी। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेना और अमित शाह की कारगर रणनीति का परिणाम बताया गया था। विपक्ष की कमजोर तैयारी को भी भाजपा की जीत के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वहीं, किसान भी इस बार अपने आंदोलन को पूरी तरह गैर राजनीतिक रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनमें उन किसान संगठनों को लेने या न लेने पर मतभेद चल रहा है जो किसान आंदोलन के बाद चुनाव में कूद पड़े थे।