किसान आंदोलनः ‘रफ्तार’ पर ‘ब्रेक’, ‘संयोग’ या ‘प्रयोग’
- गुरुवार को मोदी देंगे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को ‘रफ्तार’, किसानों के ट्रैक्टर मार्च से ‘ब्रेक’
- अब अगली वार्ता पर असर पड़ना तय, दोनों हाथों से ताली बजने के आसार कम
- कोरोना टीकाकरण पर भी पड़ सकता असर, करनाल को बनाया गया है टीके का केंद्र
- दोनों पक्षों के अड़ियल रवैये से आगे कई चुनौतियां, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से आस
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विस्तार
यह महज संयोग है या प्रयोग कि जब गुरुवार की सुबह 11 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की ‘रफ्तार’ को हरी झंडी दे रहे होंगे तभी आंदोलनकारी किसान संगठन ट्रैक्टर मार्च कर हरियाणा-राजस्थान-यूपी से सटे दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर की रफ्तार पर ‘ब्रेक’ लगा कर विरोध जता रहे होंगे। आंदोलनकारी किसानों के इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ से अगले दिन शुक्रवार आठ जनवरी की प्रस्तावित वार्ता पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। पिछली वार्ता तक सरकार के दो टूक संदेश के बाद तीनों कृषि कानूनों की वापसी की उम्मीद किसान संगठनों को भी नहीं है। संभवतः इसलिए आठ जनवरी की वार्ता से पहले किसान संगठनों ने दबाव की रणनीति अपनाई और आंदोलन पर नरम रुख नहीं रखा। सरकार की ओर से भले बातचीत से बात बन जाने की थोड़ी उम्मीद पाली गई है, लेकिन अड़ियल रवैया यह संकेत दे रहा है कि इस वार्ता में दोनों हाथों से ताली बजने के आसार बेहद कम हैं। ऐसे में अब 11 जनवरी से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से आस बचती है।
गुरुवार को रफ्तार बनाम ब्रेक
प्रधानमंत्री मोदी गुरुवार को डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को हरी झंडी दिखाएंगे। यह भी हरियाणा के रेवाड़ी और राजस्थान के मदार से जुड़ा है। इस कॉरिडोर से मालवाहन की कनेक्टिविटी बढ़ेगी। इससे माल ढुलाई आसान होगी। यह दुनिया में अपनी उपलब्धि भी है। दूसरी तरफ, इसी रेवाड़ी इलाके में आंदोलनकारी किसान पिछले कई दिनों से ट्रैक्टर के साथ दिल्ली की ओर बढ़ने को बेताब हैं। इस प्रयास में हरियाणा, राजस्थान, पंजाब से जुड़ी सड़कों पर हजारों आंदोलनकारी किसान खराब मौसम के बावजूद डटे हैं। अब गुरुवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली-एनसीआर की चारों सीमाओं सिंघु, टीकरी, गाजीपुर, पलवल पर ट्रैक्टर मार्च कर आगे बढ़ने का एलान कर रखा है। रेवाड़ी में ऐसी कोशिश पर पिछले दिनों सुरक्षा बलों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। टकराव का अंदेशा अब भी बना हुआ है। आंदोलनकारी किसानों के ट्रैक्टर मार्च से सरकार पर दबाव बने या नहीं, लेकिन एनसीआर की सीमाओं पर आवाजाही प्रभावित होने का खतरा है। ट्रैक्टर-ट्रॉला मार्च का यह ‘ट्रेलर’ बता रहा है कि अगली वार्ता की ‘पिक्चर’ कैसी हो सकती है।
जाम व टीकाकरण की चुनौतियां
किसानों के आंदोलन से एनसीआर के जाम से जहां नौकरीपेशा की परेशानी बढ़ सकती है, वहीं इस समय की सबसे बड़ी चुनौती कोरोना टीकाकरण को लेकर अड़चन पैदा होने का डर है। मकर संक्रांति के आसपास से देश में टीकाकरण की मुहिम शुरू करने की तैयारी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने उत्तर भारत के लिए करनाल को टीका भंडारण-आपूर्ति का बड़ा केंद्र बनाया है। इसके अलावा चेन्नई, मुंबई, कोलकाता केंद्र बनाये गए हैं। यूं तो जान हैं जहान के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाए जाते हैं लेकिन इस किसान आंदोलन की धुरी करनाल के आसपास का हिस्सा भी है। ट्रैक्टर मार्च से जाम की नौबत आई तो करनाल टीका केंद्र से दिल्ली-एनसीआर व पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी के इलाके में टीके के भंडारण-आपूर्ति की मुहिम को झटका लग सकता है। अभी कोरोना आपदा काल में यूं भी एनसीआर में नौकरीपेशा महीनों से परेशान रहे हैं। लॉकडाउन से उबरकर अनलॉक की ओर बढ़ रहे एनसीआर के लिए जाम सिरदर्द साबित होंगे, चाहें वह नौकरीपेशा की आवाजाही को लेकर हो या आर्थिक गतिविधियों को लेकर।
अगले ‘डॉयलाग’में ‘डेडलॉक’ का खतरा
संयुक्त किसान मोर्चा ने 8 जनवरी को सरकार से निर्णायक बात करने का मन बनाया है। सरकार को बिंदुवार खामियां गिनाते हुए तीनों कानूनों की वापसी से कम कुछ भी नहीं का संदेश देने की तैयारी है। कानून वापसी और न्यूनत्तम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की प्रक्रिया पर ही फिर बात होगी। एक किसान नेता ने कहा, सरकार की 8 तारीख की वार्ता के बाद ही संयुक्त किसान मोर्चा फिर अगली रणनीति बनायेगा। फिलहाल, 26 जनवरी तक के आंदोलन की रुपरेखा तय है। 8 जनवरी की वार्ता बेपटरी हुई तो सरकार जोड़तोड़ में जुटेगी। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर का दावा है कि कानून के समर्थन में देश के अनेक किसान संगठन हैं। जाहिर है, दोनों तरफ से लंबी लड़ाई की तैयारी है। ऐसे में 8 जनवरी की वार्ता से किसान संगठनों को ज्यादा उम्मीद नहीं है। दोनों तरफ से ‘मानेंगे पंच की बात लेकिन खूंटा वहीं गाड़ेंगे ’ वाली नौबत है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का आसरा
तीनों कृषि कानूनों की वैधता को चुनौती वाली अर्जी पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस विवाद से जुड़ी सभी अर्जियां एक साथ जोड़ दीं। 11 जनवरी को अगली सुनवाई की तारीख तय की। शुरू में 8 जनवरी की तारीख पर विचार किया जा रहा था, लेकिन उसी दिन सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच अगले दौर की वार्ता प्रस्तावित है। ‘डॉयलॉग इन प्रोगेस’को देखकर सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी की तारीख तय की।
सुप्रीम कोर्ट में अर्जियां
सुप्रीम कोर्ट में इस विवाद से जुड़ी कई अर्जियां हैं। एक याचिका दिल्ली-एनसीआर के जाम (बंधक बनाने) को लेकर है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन की सुनवाई के बाद वार्ता से हल निकालने की ओर इशारा किया। उस सुनवाई का असर यह हुआ कि डेडलॉक फिर डॉयलॉग की ओर बढ़ा। दो दौर की वार्ता के बाद बात बनती नजर नहीं आ रही है। गतिरोध कायम है। सुप्रीम कोर्ट में जाम के अलावा कृषि कानूनों की वैधता को चुनौती वाली याचिकाएं हैं। कृषि को राज्य का मामला बनाते हुए इस पर केंद्र से कानून समेत कई तर्कों के आधार पर चुनौती दी गई है। इसी से जुड़ी एक याचिका पर बुधवार को सुनवाई हुई। दो किसान संगठनों ने भी कृषि कानूनों को चुनौती दे रखी है। तीसरा, आंदोलन के दौरान पानी की बौछार से लेकर मानवाधिकार पहलू को लेकर एनजीओ की ओर से याचिका है। आंदोलनकारी इन 40 किसान संगठनों या संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से भले सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई की पहल न की गई, लेकिन इनसे जुड़े आठ किसान संगठन पक्षकार बनाए गए हैं। एक अर्जी इन सभी 40 किसान संगठनों को पक्षकार बनाने को लेकर है। सो, इस समूचे विवाद में कृषि कानूनों की वैधता, प्रदर्शन-जाम-बंधक, मानवाधिकार आदि पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट विस्तार से गौर कर सकता है। ऐसे में अगर प्रस्तावित वार्ता से बात नहीं बनी, तो सुप्रीम कोर्ट की आस बचेगी।