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किसान आंदोलन तय करेगा हरियाणा में राजनीति की दशा और दिशा, मुखौटा लगाने वालों को लगेगा तगड़ा झटका!

Tue, 15 Dec 2020 12:55 AM IST
देव कश्यप जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Tue, 15 Dec 2020 12:55 AM IST
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Farmers protest against agriculture bill 2020 will decide the state and direction of politics in Haryana
किसानों का प्रदर्शन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

हरियाणा की राजनीति लंबे समय तक किसानों के इर्द गिर्द घूमती रही है। भाजपा को छोड़ दें तो बाकी दलों की जड़े कहीं न कहीं ग्रामीण परिवेश, खासतौर पर किसानों के साथ जुड़ी रही हैं। यह तय है कि किसान आंदोलन, प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा। हो सकता है कि किसान आंदोलन में मुखौटा लगाकर घूमने वाले राजनेताओं को आगामी चुनाव में तगड़ा झटका लग जाए। इसका असर उन राजनीतिक दलों पर भी पड़ेगा, जो सीधे तौर पर इस आंदोलन की खिलाफत करते नजर आ रहे हैं।

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किसानों के नाम पर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने वाले चौ. देवीलाल परिवार का कुनबा भी इस आंदोलन में सक्रियता नहीं दिखा रहा है। दुष्यंत चौटाला जो कि प्रदेश की भाजपा सरकार में डिप्टी सीएम हैं, वे किसानों को दिलासा दे रहे हैं कि सरकार उनके साथ बातचीत करेगी। मामला सुलझ जाएगा। दूसरी तरफ सीएम खट्टर हैं, जो किसान आंदोलन को खत्म कराने के प्रयासों में जुटे हैं।
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प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार बताते हैं, किसान आंदोलन में मुखौटा पहनकर जाने वाले राजनीतिक दलों को आने वाले समय में नुकसान उठाना पड़ सकता है। चूंकि जजपा का जनाधार किसान आधारित रहा है, इसलिए आंदोलन का सबसे ज्यादा असर इसी पार्टी पर पड़ेगा। पार्टी की कमान संभाल रहे डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने आंदोलन के बीच केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों के साथ बैठक कर यह जताने का प्रयास किया है कि वे किसानों की मांगों को लेकर संजीदा हैं।

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किसानों को उम्मीद थी कि उनकी आवाज को बुलंद करने के लिए दुष्यंत चौटाला आगे आएंगे। बीच में खबरें भी आई कि किसानों का मुद्दा खट्टर सरकार को मुसीबत में डाल सकता है। ऐसे सवाल किए गए कि क्या जजपा, खट्टर सरकार से समर्थन वापस ले लेगी। अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। जजपा के कुछ नेता किसानों के समर्थन में बयानबाजी जरूर करते रहते हैं, लेकिन सरकार से समर्थन वापसी जैसा कठोर कदम उठाने की संभावना अभी तक नजर नहीं आ रही।

प्रदेश के दो निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू और सोमबीर सांगवान तो किसानों के समर्थन में दिल्ली तक पहुंच गए। सांगवान ने तो पशुधन विकास बोर्ड के चेयरमैन पद से इस्तीफा देकर किसानों को समर्थन देने की पहल की है। रविंद्र कुमार कहते हैं, अहीरवाल में किसान आंदोलन को लेकर कोई बड़ी हलचल नजर नहीं आई। राजस्थान सीमा से लगते गांवों में कुछ लोग सक्रिय दिखाई दिए। ऐसा नहीं है कि प्रदेश के किसानों को इस आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है। दरअसल, उन्हें कोई ठोस राजनीतिक नेतृत्व नहीं मिल रहा। यही वजह है कि प्रदेश के किसान खुलकर आंदोलन में शामिल नहीं हो रहे हैं। प्रदेश के किसानों से जो समर्थन अपेक्षित था, वह देखने को नहीं मिला। आंदोलन में जरुरी वस्तुओं की सप्लाई और दूसरी मदद पहुंचाई गई है। रोहतक, सोनीपत व झज्जर, जिसे भूपेंद्र हुड्डा का गढ़ माना जाता है, यहां से किसानों की बहुत कम संख्या आंदोलन में नजर आ रही है।

एक सवाल उठता है कि क्या हुड्डा केवल सोशल मीडिया और प्रेसवार्ता के जरिए किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। दीपेंद्र हुड्डा प्रतीकात्मक तौर पर किसानों के साथ दिखे हैं। सक्रियता न होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी को किसान आंदोलन से कुछ फायदा हो सकता है। चुनाव में कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला, हुड्डा और कुमारी शैलजा कह सकते हैं कि हमारी पार्टी किसानों के साथ खड़ी रही है। ये अलग बात है कि हरियाणा कांग्रेस के नेता आंदोलन को दूर से ही हवा देने में लगे हैं। मंच से भूपेंद्र हुड्डा भी स्वयं को किसान नेता बताते हैं। वे दस साल तक प्रदेश के सीएम रहे हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से लेकर हरियाणा की खट्टर सरकार पर हमला बोल रहे हैं।
 

किसान आंदोलन से भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा, पार्टी नेता ऐसा मानकर चल रहे हैं। इसका कारण यह है कि किसान, पार्टी का परंपरागत वोट बैंक नहीं रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को किसानों के बहुत कम वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव में किसानों ने मोदी सरकार को जबरदस्त समर्थन दिया था। अब केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच समझौता हो जाता है तो उसका थोड़ा बहुत फायदा प्रदेश भाजपा को मिल सकता है।



यदि दिल्ली में टकराव की स्थिति बनती है तो खट्टर सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर जजपा पर देखने को मिलेगा। चुनाव में कांग्रेस पार्टी जजपा पर यह कहकर हमला बोलेगी कि किसान आंदोलन में यह पार्टी सत्ता से चिपकी रही। इसके नेता त्यागपत्र देकर आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हुए। हुड्डा और सुरजेवाला तो लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि जजपा को किसानों से कोई लेना-देना नहीं है। जजपा ने किसानों के साथ विश्वासघात किया है। अब देखने वाली बात यह होगी चुनाव में जजपा खुद को इन आरोपों से कैसे बाहर निकालेगी।

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