ग्राउंड रिपोर्टः गेहूं की फसल कटते ही तेज हो जाएगा किसान आंदोलन, इस रणनीति से देंगे संघ और भाजपा को मात
किसानों का खर्च किसानी से ही चलता है। इसलिए सभी किसान संगठनों ने मिलकर योजना बनाई है कि गेहूं की तैयार होती फसल की सिंचाई के लिए खेतों की तरफ जाएं और फिर लौटकर आंदोलन में शामिल हो जाएं...
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पानीपत को पार करके अमृतसर तक चले जाइए या पटियाला की तरफ रुख कीजिए, हाईवे पर किसान आंदोलन के झंडे बिकते हुए मिलेंगे। जहां एक तरफ की सड़कों पर सिंघु-टीकरी बार्डर से लौटते किसानों के ट्रैक्टर और गाड़ियां मिलेंगी तो दूसरी तरफ से सामानांतर विपरीत दिशा में दिल्ली की तरफ आती गाड़ियां। रास्ते में करनाल, पानीपत, अंबाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर हर जगह किसान आंदोलन की चर्चा करते और पक्ष में खड़े लोग मिलेंगे। पंजाब में कुछ इसी तरह से किसान आंदोलन की लहर चल रही है।
मोंगा, होशियारपुर, गुरुदासपुर के गांवों में भी लोगों का मानना है कि आंदोलन किसी नतीजे पर पहुंचने तक चलना चाहिए। किसान संगठनों की रणनीति और पंजाब के गांवों तथा हाईवे पर चल रही गतिविधियों से साफ लग रहा है कि किसानों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वह लंबे आंदोलन की रुपरेखा बनाकर काम कर रहे हैं। बजट पेश होने के बाद वह अब संसद सत्र के दूसरे चरण का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान अपनी खेती-बाड़ी और लोगों को जागरूक करने की प्रक्रिया को पूरा करने में लगे हैं।
श्री हरमंदिर साहिब के बाहर सतनाम सिंह मिले। सतनाम का कहना है कि किसानों ने केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर अपना हक मांगा है और केंद्र सरकार अपनी जिद पर अड़ी है। चरनजीत सिंह का कहना है कि केन्द्र सरकार किसानों की समस्या का समाधान करना ही नहीं चाहती। लेकिन कोई बात नहीं। किसान भी थकने वाले नहीं है। किसानों को चाहिए कि वह हक की लड़ाई जारी रखें। पंजाब का बच्चा-बच्चा उनके पीछे खड़ा है।
गेंहू की फसल कटने के बाद तेज होगा आंदोलन
पानीपत के राजेश कौशिक का कहना है कि सोनीपत, पानीपत, करनाल, अंबाला के गांवों में जगह-जगह किसानों की पंचायतें, सभाएं चल रही हैं। किसान लोगों को जागरूक कर रहे हैं। गांव-गांव में अभी किसान अपने आंदोलन के समर्थन में कैंपेन चला रहे हैं। यह जन समर्थन का प्रयास मार्च तक चलेगा। किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी, हरमीत सिंह कादियान, बलवीर सिंह राजेवाल समेत तमाम नेताओं ने जमीनी तैयारी तेज कर दी है।
भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत जहां किसान पंचायतें कर रहे हैं, वहीं भाकियू (असली, अराजनैतिक) के प्रमुख चौधरी हरपाल सिंह कहते हैं कि संघ और भाजपा नेताओं की काट के लिए यह जरूरी है। किसान नेता 26 जनवरी के बाद से ही किसानों के जनजागरण में लगे हैं। चौधरी हरपाल सिंह कहते हैं कि किसान अब पीछे हटने वाले नहीं हैं। गेंहू की फसल कटने के बाद किसान एक बार फिर दो महीने के लिए आंदोलन में अपनी ताकत झोंक देगा।
क्यों घरों को लौट रहे हैं किसान
चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि सब कुछ रणनीति के तहत हो रहा है। किसानों का खर्च किसानी से ही चलता है। इसलिए सभी किसान संगठनों ने मिलकर योजना बनाई है। संयुक्त किसान मोर्चा ने यह रणनीति तैयार की है कि किसान गेहूं की तैयार होती फसल को आखिरी पानी देने (सिंचाई) तथा उनका रख-रखाव करने के लिए खेतों की तरफ जाएं। गांवों और पंचायतों में लोगों को जागरूक करें। घर-बार देखने, फसल काटने के बाद फिर आंदोलन को तेज करने के लिए लौट आएं।
हरमीत सिंह कादियान भी कहते हैं कि धरना-प्रदर्शन चल रहा है। अब यह निर्णायक मोड़ पर ही खत्म होगा। इसलिए लंबे आंदोलन को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई गई है। ताकि खेती-खलिहानी और किसान आंदोलन सब साथ-साथ चलता रहे। यही कारण है कि हर रोज कुछ शिविर हट रहे हैं और कुछ नए लग रहे हैं। किसानों के ट्रैक्टर घर की तरफ लौट रहे हैं और कामकाज की जिम्मेदारी निभाने के बाद फिर आंदोलन स्थलों पर आ रहे हैं।
...और चल रहा है गुरुजी का लंगर
दिल्ली से पंजाब जाने वाले हर हाईवे पर आपको गुरुजी का लंगर मिल जाएगा। यह लंगर आंदोलन से लौटते और आंदोलन में शामिल होने वाले किसानों के लिए लगातार चल रहा है। ताकि किसानों को आने-जाने में खाने-पीने की तकलीफ न होने पाए। इसके अलावा यह लंगर राहगीरों के लिए भी है। वह भी लुत्फ उठा सकते हैं। सेवादार इसे प्रबंधन कौशल के सहारे चला रहे हैं। अंबाला से कोई 10 किमी पहले लंगर के सेवादार तेजा सिंह का कहना है कि हर रोज हजारों लोग प्रसाद चखते हैं। यह सब कुछ स्थानीय मदद से चल रहा है।