बड़ा सवाल: कितने दिन रहेगा कोरोना वैक्सीन का असर, क्या हर साल लगवानी पड़ेगी बूस्टर डोज?
कोरोना वैक्सीन का कितने समय तक असर रहता है, इस पर अभी शोध जारी है। अगर इसका लंबे समय तक असर न हुआ तो हर आठ महीने के बाद एक बूस्टर डोज लगाना लोगों की मजबूरी बन सकती है...
विस्तार
कोरोना संक्रमण के खतरे से बचने के लिए हर व्यक्ति जल्द से जल्द वैक्सीन लगवा लेना चाहता है। राज्यों के पास वैक्सीन नहीं बची है और वे इसकी ज्यादा से ज्यादा डोज पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन अभी तक दुनिया के वैज्ञानिकों को यह नहीं पता है कि इस समय लोगों को दी जा रही किसी भी कोरोना वैक्सीन का असर कितने समय तक बरकरार रहेगा, या यह लोगों को कितने समय तक कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाकर रख सकेगी? इस बात पर रिसर्च चल रही है कि ये वैक्सीन पूरी जिन्दगी के लिए काम करेगी या कुछ समय बाद इसका असर समाप्त हो जाएगा और संक्रमण से बचने के लिए लोगों को बार-बार वैक्सीन की बूस्टर डोज लगवानी पड़ेगी?
ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के पूर्व निदेशक डॉक्टर एमसी मिश्रा ने अमर उजाला को बताया कि अभी तक दुनिया के वैज्ञानिकों को यह नहीं पता है कि अब तक बनी कोई भी वैक्सीन किसी व्यक्ति को कोरोना के खतरे से कितने दिन तक सुरक्षित रख सकेगी। अगर परीक्षणों में यह बात सामने आती है कि इन वैक्सीन का असर लंबे समय तक कायम नहीं रहता है तो हर आठ-दस महीने के बाद कोरोना वैक्सीन की बूस्टर डोज लगवाने के लिए लोगों को मजबूर होना पड़ सकता है।
चल रहा है अध्ययन
कोई भी वैक्सीन लगाये जाने के बाद वह संबंधित वायरस से लड़ने के लिए शरीर में एंटीबॉडी विकसित कर देती है। समय-समय पर इस एंटीबॉडी को चेक करके यह पता लगाया जा सकता है कि वैक्सीन का असर अभी भी बरकरार है, या इसका असर खत्म हो गया है।
कोरोना वैक्सीन की पहली डोज दुनिया में 16 दिसंबर 2020 से लगानी शुरू की गई थी। इसके बाद से अब तक लगभग 6 महीने का समय बीतने जा रहा है। इसी प्रकार भारत में 16 जनवरी 2021 से कोरोना वैक्सीन की पहली डोज का लगना शुरू हुआ था। इसके 6 महीने बीतने के बाद उन लोगों के शरीर में एंटीबॉडी का स्तर चेक किया जाएगा, जिन्हें इसकी पहली डोज लगाई गई थी।
भारत बायोटेक ने जिन लोगों पर अपनी वैक्सीन कोवैक्सिन की पहली डोज लगाई थी, उन्हें दो ग्रुप में बांटा है। इसमें से एक ग्रुप के लोगों को कोवैक्सिन की दूसरी खुराक दी जा रही है, जबकि दूसरे ग्रुप को प्लेसिबो (फेक वैक्सीन) दिया गया था। एक महीने के अंतर के बाद दोनों ग्रुप्स के लोगों के शरीर में एंटीबॉडी का स्तर जांच कर यह पता लगाया जायेगा कि दोनों शरीर में एंटीबॉडीज की मौजूदगी में कितना अंतर है।
थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर यह प्रक्रिया जारी रखकर शरीर में एंटीबॉडी का स्तर चेक किया जाता रहेगा। इससे यह पता चल सकेगा कि किसी व्यक्ति की शरीर में वैक्सीन लगने के कितने समय बाद तक एंटीबॉडी काम कर रहे हैं।
अगर यह लंबे समय तक बरकरार नहीं रहा तो वैक्सीन लगवाने वाले लोगों के साथ-साथ वैक्सीन निर्माता कंपनियों के सामने भी चुनौती बढ़ जायेगी, जिससे इसे लंबे समय तक के लिए योग्य बनाया जा सके। इस साल के अंत यानी अक्टूबर-नवंबर तक इसके परिणाम आने की उम्मीद है।