कोरोना वॉरियर: मोदी ने जिन्हें 'भगवान का अवतार' कहा, उन्होंने 15 महीने से नहीं उतारी पीपीई किट
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के चिकित्सक रहे प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहसिन वली कहते हैं, अनेक डॉक्टर ऐसे हैं, जिन्हें अपने परिवार से मिले हुए कई दिन हो गए, उनके मां-बाप को कोरोना हो गया, लेकिन वे अस्पताल में दूसरे मरीजों की जान बचाने में लगे रहे। सरकारों को इनके बारे में सोचना चाहिए...
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देश में कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ, अपनी जान की बाजी लगाकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। कोविड की जंग में इन्हें फ्रंटलाइन वर्कर, कोरोना वॉरियर एवं टॉप मैनपावर जैसे शब्दों के समूह में शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हीं डॉक्टरों को 'भगवान का अवतार' कहा था। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के चिकित्सक रहे प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहसिन वली कहते हैं, ये वही मैनपावर है, जिसने 15 महीने से पीपीई किट नहीं उतारी है। दिन रात ड्यूटी दी है। कई दिनों तक ये डॉक्टर अपने घर नहीं जा सके। इनके अपने चल बसे, लेकिन ये दूसरों का जीवन बचाने में लगे रहे। आज इस मैनपावर को टूटने से बचाना होगा। इनका हौसला और हिम्मत बरकरार रखने के लिए सरकार को आगे आना चाहिए। ऑक्सीजन या वेंटीलेटर तो फैक्टरी में बन जाएगा, लेकिन ये वर्कफोर्स खत्म हुई तो इसका विकल्प खड़ा करना आसान नहीं होगा। बतौर डॉ. वली सरकार को कोविड19 की जंग में योद्धा बने डॉक्टरों को मानसिक तौर पर बल प्रदान करने की जरूरत है।
डॉ. वली के मुताबिक कोरोना का अभी कुछ नहीं पता है। कब तक रहेगा, आगे यही स्ट्रेन होगा या कोई नया आ जाएगा। इसे पूरी तरह खत्म करने वाली वैक्सीन कब तक बनेगी, अभी कुछ नहीं मालूम। वैश्विक आपदा की इस घड़ी में डॉक्टरों ने दो कदम आगे बढ़कर अपनी ड्यूटी की है। आप स्वयं यह अंदाजा लगाएं कि 15 महीने से कोई डॉक्टर या दूसरा मेडिकल स्टाफ लगातार पीपीई किट पहन रहा है, उसकी स्थिति कैसी होगी। क्या उसे पसीना नहीं आता होगा। उसकी आंखों के सामने कितनी बार धुंधलापन होता होगा। उसके शरीर में कई तरह के चर्म रोग हो सकते हैं और हुए भी हैं। अनेक डॉक्टर ऐसे हैं, जिन्हें अपने परिवार से मिले हुए कई दिन हो जाते हैं। उनके मां-बाप को कोरोना हो गया, लेकिन वे अस्पताल में दूसरे मरीजों की जान बचाने में लगे रहे। केंद्र एवं राज्य सरकारों को सोचना होगा कि यह वर्कफोर्स लगातार काम कर रही है। इन्हें कुछ राहत दे दी जाए।
देश में अगर डॉक्टर खत्म हो गए तो कहां से लाएंगे। बाकी उपकरण तो देर-सवेर मिल जाएंगे। हमारे देश में अच्छी बात यह है कि यहां पर्याप्त संख्या में डॉक्टर एवं पैरामेडिकल स्टाफ है। कई बड़े राष्ट्रों में कार्यरत डॉक्टरों में से करीब 70 फीसदी तो दूसरे देशों के हैं। इसका मतलब है कि वहां डॉक्टरों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत में ऐसा नहीं है। सरकार को यह मैनपावर संभाल कर रखनी होगी। डॉक्टरों की अपनी कई समस्याएं होती हैं। उनका अपना परिवार होता है। सरकार को उनके लिए अच्छे इंसेंटिव की घोषणा करनी चाहिए। हर विभाग में उनके काम प्राथमिकता से हों। पिछले साल एमसीडी के अस्पतालों में डॉक्टरों को अपने भत्तों के लिए हड़ताल करनी पड़ी थी। सरकार को ऐसी स्थिति से बचना चाहिए। डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ का मनोबल बनाकर रखना होगा।
बतौर डॉ. वली, मैंने अपने 49 साल के करियर में कभी इतनी भयानक त्रासदी नहीं देखी। इतने लोगों का मारा जाना, यह सब दिमाग पर असर डालता है। कोरोना में ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। मरीज चिल्ला रहे हैं, डॉक्टर साहब बचा लो। डॉक्टर, अस्पताल के मुख्य गेट की तरफ देखता है कि ऑक्सीजन का टैंकर आ रहा है या नहीं। डॉक्टरों पर इसका मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। वे सोचते हैं कि हम दिन-रात मरीजों को बचाने में लगे हैं और यहां ऑक्सीजन की कमी से मरीज दम तोड़ रहा है। बाद में पता चलता है कि ऑक्सीजन का सिलेंडर कहीं एक लाख में बिक रहा है तो कहीं पचास हजार में। ये सब बातें डॉक्टर को तोड़ने का काम करती हैं। केंद्र सरकार को इस तरह की स्थितियों से बचना होगा। डॉक्टरों का उत्साह बनाए रखना है।