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चुनावी सर्वे से जुड़ी हर एक बात, कैसे करते हैं काम और कैसे आते हैं परिणाम

Mon, 17 Sep 2018 03:52 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 17 Sep 2018 03:52 PM IST
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Every thing related to the election survey
चुनावी सर्वे - फोटो : amarujala

चुनाव के कुछ समय पहले और बाद में लोग सबसे पहले यह जानना चाहते हैं कि आने वाले समय में इनके क्या परिणाम सामने आ सकते हैं। आगामी परिणामों के बारे में अनुमान लगाने का काम चुनावी सर्वे के माध्यम से किया जाता है। इन सर्वे के परिणाम निर्वाचकों और मतदाताओं से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। विभिन्न स्तरों के आधार पर ये सर्वे अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ को चुनाव के पहले और कुछ को चुनाव के बाद तैयार किया जाता है। आइए जानते हैं इन सर्वे के बारे में-

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ओपिनियन पोल
इस सर्वे का जनक जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन को माना जाता है। सबसे पहले अमेरिका में चुनावी सर्वे कराया गया था। इससे प्रभावित होकर इंग्लैंड और फ्रांस ने इसे अपनाया। इंग्लैंड में इसका प्रयोग 1937 में किया गया वहीं फ्रांस ने इसे 1938 में अपनाया। ओपियन पोल के परिणामों के लिए चुनाव के लिहाज से प्रमुख मसलों पर जनता के मन की बात जानने की कोशिश की जाती है। जनता किस बात से नाराज और किस बात से संतुष्ट है इन सभी को आधार बनाते हुए अनुमान लगाया जाता है कि किस दल और किस नेता को वो आगे चुनने वाली है। मतदाताओं से पूछा जाता है कि वो किसे अपना मत देने का मन बना रहे हैं।
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एक्जिट पोल
नीदरलैंड के एक समाजशास्त्री और पूर्व राजनेता मार्सेल वान डैम को इसका जनक माना जाता है और सबसे पहली बार इसे 15 फरवरी, 1967 में कराया गया था। यह ओपिनियन पोल से अलग होता है। जब मतदाता अपने मत का प्रयोग कर चुका होता है तो उससे यह पूछा जात है कि उसने अपना मत किसे दिया। इस आधार पर किए गए सर्वे से जो व्यापक नतीजे निकलकर सामने आते हैं उनके आधार पर इसके परिणामों को तैयार किया जाता है। 
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भारत में चुनावी सर्वे की दस्तक
भारत में चुनावी सर्वे का जनक भारतीय जनमत संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन) के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को माना जाता है। भारत में चुनाव के दौरान इस प्रकार के सर्वे से जनता के रुख को जानने का काम सबसे पहले इन्होंने ही किया था। भारत में जब इसका चलन बढ़ा तो सबसे पहले इसे पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित किया गया। टेलीविजन पर इसने अपनी दस्तक 1998 में दी जब एक राष्ट्रीय समाचार चैनल ने इस संबंध में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में चुनावी विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिकों को बुलाया गया था।


चुनावी सर्वे के नियम और इसका विरोध
चुनावी सर्वे की लोकप्रियता ने अगर किसी को सबसे ज्यादा परेशान किया है तो वो हैं राजनीतिक दल, वह इसे मतदाता को प्रभावित करने वाला मानते हैं। किसी भी चुनावी सर्वे के परिणाम अगर संबंधित दल के पक्ष में नहीं होते हैं तो वो इस पर अपना विरोध जताना शुरू कर देते हैं। चुनाव आयोग द्वारा 1999 में एक आदेश जारी कर ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद एक समाचार पत्र ने इसका विरोध किया और कोर्ट में चुनौती दे दी। इसके बाद कोर्ट ने इस पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया था। 2009 में भी इसके विरोध में आवाज उठी थी जिसके बाद कानून मंत्रालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन किया था। इसके बाद यह नियम लागू किया गया कि जब तक चुनावी प्रक्रिया का अंतिम वोट न डल जाए किसी भी चुनावी सर्वे को न तो दिखाया जा सकता है और न ही प्रकाशित किया जा सकता है।

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